जीवन के तमाम रंगों की ग़ज़ल : समीक्षा (प्रदीप कान्त)

हिन्दी ग़ज़ल की वर्तमान पीढ़ी में जिन लोगों ने तेज़ी से अपनी अलग पहचान बनाई है उनमे एक ज़रूरी नाम प्रताप सोमवंशी का भी है| इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी यदि यह कहा जाए कि समकालीन कविता की तरह प्रताप की ग़ज़ल ... Read More...

जब ग़ज़ल मेहराबान होती है: समीक्षालेख (प्रदीप कांत)

कभी कतील शिफाई ने कहा था- लाख परदों में रहूँ, भेद मेरे खोलती है, शायरी सच बोलती है| अशोक भी इस तरह के सच का सामना करने की हिम्मत रखते हैं तभी कह पाते हैं-  "मुझे ज़रूर कोई जानता है अन्दर तक मेरे खिलाफ़ ये सच्चा... Read More...

उपेन्द्र परवाज़: की ग़ज़ल….

उपेन्द्र परवाज़: की ग़ज़ल.... १-   उपेन्द्र परवाज़ आँख के मौसम जो बरसे, ज़िस्म पत्थर हो गये अब के सावन बारिशों से, बादल ही तर हो गये | इस कदर थे मोजज़े, अपने जुनूने इश्क के क़त्ल करने के बाद, खुद घायल ... Read More...

ख़तरे में इस्लाम नहीं: एवं अन्य, ‘हबीब ज़ालिब’ की ग़ज़लें

सदियों के रूप में गुजरते समय और देशों के रूप में धरती के हर हिस्से याने दुनिया भर में लेखकों कलाकारों ने सच बयानी की कीमत न केवल शारीरिक, मानसिक संत्रास झेलकर बल्कि अपनी जान देकर भी चुकाई है .... इनकी गवाहियों ... Read More...

‘अश्विनी आश्विन’ की तीन ग़ज़लें

'अश्विनी आश्विन' की तीन ग़ज़लें  अश्विनी आश्विन 1-  जो भरे-बाज़ार, सब के बीच, नंगा हो गया। वो सियासतदां, शहर का फिर मसीहा हो गया।। फिर चले चाकू-छुरे कल, फिर जलीं कुछ बस्तियां, हो गई काशी खफा, नाराज़ कावा ह... Read More...
क्या मैं आदमी हूँ….? (अश्विनी ‘आश्विन’ की दो ग़ज़लें)

क्या मैं आदमी हूँ….? (अश्विनी ‘आश्विन’ की दो ग़ज़लें)

अश्विनी ‘आश्विन’ अश्विनी ‘आश्विन’ उन रचनाकारों में से है जिन्हें रचनाओं के रूप में खुद के प्रकाशित होने से कहीं ज्यादा रचनाधर्मिता का नशा रहता है | चुपके से कहीं कोने में बैठ कर समाज का जरूरी व... Read More...

सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? ग़ज़ल (अश्विनी आश्विन)

फोटो गूगल से साभार सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? सोच रहा हूँ!! नया वर्ष यह, कैसा होगा ? चिंतित हूँ!! क्या विगत वर्ष के जैसा होगा ?? विगत वर्ष का भी यूं ही सत्कार किया था । नूतन विध... Read More...

ऐसा क्यों है ?: ग़ज़ल (अश्विनी आश्विन)

अश्विनी आश्विन 1- ऐसा क्यों है ? इस दुनिया में ऐसा क्यों है ? जीवन इतना सस्ता क्यों है?? सब अपनी दुनिया में ग़ुम हैं, सब की हसरत, पैसा क्यों है?? बेशक, भीड़ भरी है दुनिया, इन्सां मगर अकेला ... Read More...