जलतरंग : कहानी (प्रतिभा)

उसके तिलिस्म को बिखरते हुए देखने का मेरा इन्तज़ार जितना लम्बा हो रहा था उसका तिलिस्म उतना ही ताकतवर हो रहा था..... उस कल्पनाजीवी औरत के विश्वास के महलों के आगे मेरे यथार्थ के महल काँपते नज़र आ रहे थे ..... कुछ ... Read More...

सुबह होने तक: कहानी (हनीफ़ मदार)

"गुड़िया खेलने की उम्र में ब्याह दिया था मुझे । मैं रानी ही तो थी उस घर की । दिन में कई-कई बार सजती-सँवरती, घर भर में किसी ऐसे फूल की तरह थी जिसके मुरझाने पर सब चिंतित हो जाते । मोटी-मोटी कच्ची मिट्टी की बनी दी... Read More...

इन्स्पेक्टर मातादीन चाँद पर: व्यंग्य (हरिशंकर परसाई)

पूछा जाएगा, इंस्पेक्टर मातादीन चाँद पर क्यों गए थे? टूरिस्ट की हैसियत से या किसी फरार अपराधी को पकड़ने? नहीं, वे भारत की तरफ़ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान के अंतर्गत गए थे. चाँद सरकार ने भारत सरकार को लिखा था- यों ह... Read More...

अन्नाभाई का सलाम: कहानी (सुभाष पंत)

भाषा और ऐतिहासिक नायक सुरक्षा की मजबूत दीवारें हैं। इसके अलावा हमें अपनी कमजोर पड़ गई खिड़की तो बदलनी ही है...’’  बहुत भोला विश्वास है सावित्री तुम्हारा। लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। घर-बाहर, स्कूल, देव... Read More...

पागलों ने दुनिया बदल दी: कहानी (रमेश उपाध्याय)

घोर अँधेरे वक़्त की हताशाओं के बीच, संवेदनशील इंसानी धरती की आशाओं के सपने संजोने को, आसान है कि दिवास्वप्न देखना कह दिया जाय किन्तु उजाले की उम्मीदों के यही सपने ही तो हैं जो इंसान को अँधेरे के खिलाफ खड़े रहने औ... Read More...

आवाज दे कहां है…!: कहानी (गीताश्री)

वह अपने डर को काबू में रखने की कोशिश करती पर किशोर मन में जो डर की नींव पड़ी थी, उस पर इतनी बड़ी इमारत बन चुकी थी कि वह चाह कर भी उसे गिरा नहीं सकती थी. उसे गिराने के लिए साहस की सुनामी चाहिए थी, जो हो नहीं सकती ... Read More...

मर्द नहीं रोते: कहानी (सूरज प्रकाश)

उन्‍होंने क्‍लर्क के हाथ से फार्म ले लिया है और बड़े बेमन से भर कर वापिस क्‍लर्क की डेस्‍क पर रख दिया है। तब तक क्‍लर्क वापिस आ गया है और फार्म देख रहा है। फार्म देख कर क्‍लर्क बेचैन हो गया है - ये क्‍या? यहा... Read More...

तीसमार खाँ: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

विभिन्न कलाओं का उदगम श्रोत 'साहित्य' कभी मानव सभ्यता का इतिहास बनता प्रस्तुत हुआ तो कभी सामाजिक यथार्थ के सरल किस्सा गो के रूप नज़र आया तो गंभीर चुहल के लिए सामाजिक, राजनैतिक विषमताओं पर व्यंग्य बाण छोड़ने में भ... Read More...

चाँद के पार एक चाभी: कहानी (अवधेश प्रीत)

'अवधेश प्रीत' अपनी कहानियों में सामाजिक समस्याओं को बहुत ही मार्मिक रूप में प्रस्तुत करते हैं. उनकी कहानियों में सिर्फ विमर्श ही नहीं होता है बल्कि भूत, भविष्य के साथ-साथ वर्तमान का भी एक प्रतिरूप नज़र आता है. उ... Read More...

विकासोन्मुख गांव की जातिगत समस्या है : ‘चाँद के पार एक चाभी’ “समीक्षा”

'हमरंग' पर प्रकाशित हुई 'अवधेश प्रीत की कहानी 'चाँद के पार एक चाभी' को पढने के बाद कहानी के वर्तमान सामाजिक निहितार्थों पर एक विवेचनात्मक आलेख 'सुशील कुमार भारद्वाज' की कलम से .....| विकासोन्मुख गांव की जाति... Read More...