‘हिंदी हैं हम वतन हैं हिन्दोस्ताँ हमारा’: व्यंग्य (आरिफा एविस)

"हिंदी दिवस" पर विशेष..... 'आरिफा एविस' की हिंदी व्यंग्य रचना..... और क्या बताऊँ  अम्मा!  कालेज पूरा किया तो नौकरी की तलाश शुरू की. नौकरी मिलती कहाँ आजकल, जॉब मिलती है .पर चाहिए वहां भी अंग्रेजी ही. एक रिशेप्श... Read More...

समकालीन हिन्दी आलोचना और कबीर: आलेख (संजय कुमार पटेल)

कबीर पर आज तक जितने भी आलोचक अपनी आलोचना से दृष्टिपात किए हैं वह आज भी सबको स्वीकार्य नहीं है । सभी लोग अपने-अपने अनुसार कबीर को व्याख्यायित करने का प्रयास किए हैं लेकिन उन्हीं में से कबीर के प्रति कुछ ऐसे भी श... Read More...

अनुप्राणित: कहानी (हनीफ मदार)

प्रेम एक खूबसूरत इंसानीय व मानवीय जीवन्तता का एहसास है  जो किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय से बढ़कर होता है जिस पर किसी भी तरह की बंदिशे नहीं लगाई जा सकती क्योंकि  बिना प्रेम के मानव जीवन संभव नहीं होता | प्रेम से... Read More...
मैं पीछे क्यों रहूँ

महावारी या महामारी: संपादकीय (अनीता चौधरी)

एक बात जो मुझे बचपन से लेकर आज तक मेरे ही घर में चुभती रही है, जब भी मुझे मासिक धर्म शुरू होता है मेरी माँ मुझे अपने पूजा वाले कमरे में नहीं जाने देती हैं। मुझे बहुत खराब लगता है । मैंने उन्हें बहुत समझाने की क... Read More...

शिकार करने का जन्मसिद्ध अधिकार: व्यंग्य (आरिफा एविस)

यह जंगलराज के गर्व की बात है कि जन्मजात राजा ही जंगल पर राज करे. राजा ने ये एलान कर दिया कि वह जन्मजात अधिकारों को कभी भी जंगल से हटने नहीं देगा. जो भी जंगलराज के जन्मजात कानूनों को तोड़ने की कोशिश करेगा दंड का ... Read More...

पानी नहीं है तो क्या हुआ कोक पियो, खेल देखो: व्यंग्य (आरिफा एविस)

"करीब दस राज्यों के साथ महाराष्ट्र के कई जिले सूखा ग्रस्त घोषित कर दिये गए. लेकिन अब लोगों को चिंता करने की जरूरत नहीं, अगर कोई किसान पानी के नाम पर देशभक्ति में बाधा डालने की कोशिश करेगा तो देशभक्ति को बनाये र... Read More...
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‘विभीषण’ केवल ‘घर का भेदिया’…? आलेख (अभिषेक प्रकाश)

आज हम देख सकते हैं कि लोकतंत्र के तीनों स्तंभ किस तरह  चाटुकारिता, स्वार्थलोलुपता व परिवारवाद  के शिकार है।बहुत कम लोग ऐसे हैं जो सच बोलने का साहस रखते है।हर युग मे ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने अपने हितों से ऊपर उ... Read More...
रसप्रिया: एकल नाटक (राजेश कुमार)

रसप्रिया, एकल नाटक: (राजेश कुमार)

रसप्रिया, एकल नाटक  राजेश कुमार (कहानी- फणीश्वरनाथ रेणु ) (दूर कहीं से रसप्रिया की दिल छू लेने वाली मद्धिम-मद्धिम सुरीली तान आ रही है ... धीरे-धीरे प्रकाश भी ... जब प्रकाश की तीव्रता महत्तम पर आती है तो एक ... Read More...

चौधरी ‘अमरीका’: कहानी (संदीप मील)

जबतक लेखन जैसी विधा या पद्धिति से हमारा साक्षात्कार भी नहीं हुआ था तब समाज को सांस्कृतिक रूप से बांधे रखने और रचनात्मक चेतना की संवाहक रही लोक-कथाओं को,  इस आधुनिक चकाचौंध में विलीन होते महसूस कर रहे हैं किन्तु... Read More...

तेरे कप की चाय नहीं: कहानी (पंवार कौशल)

आधुनिक समाज में भी सदियों  से चली आ रहे  जातीय पुरुषवादी वर्चस्व को नकारते हुए, अपना अस्तित्व बनाए रखना किसी भी महिला के लिए आज भी उतना ही  मुश्किल हैं  जितना कि वर्षों पहले था | बेशक महिलाओं ने हर क्षेत्र में ... Read More...