स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात, एक दिन की नहीं होती: (डॉ० नमिता सिंह)

बहुरंग साक्षात्कार

अनीता 43 2018-11-17

‘आज हम अपने देश की बात करें तो स्त्री आन्दोलन एकांगी चल रहा है | आज पूरे देश में रेप की घटनाएँ हो रही है| इस रूप में स्त्रियों के साथ जो व्यवहार पूरा समाज कर रहा है | अगर स्त्री आन्दोलन ऐसा ही चलता है तो वह जस्टिफाइड है क्योंकि समाज, स्त्रियों की एक सम्मानजनक स्थिति के लिए तैयार नहीं हो पा रहा है | इसके लिए बहुत बातचीत भी हो रही है | जब कभी कोई रेप की घटना प्रकाश में आ जाती है तो मोलीस्ट्रेशन की बात होती है, बड़ा हल्ला-गुल्ला भी होता है | कैंडिल मार्च भी निकाले जाते है | लेकिन जब हम स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात करते तो वह एक दिन की बात नहीं होती | एक सुनियोजित रूप में वातावरण तैयार करने की बात होती है इसके लिए लम्बे प्रयास करने होते है |

स्त्री विमर्श का मतलब है कि स्त्रियों की स्थितियों पर और उनके लिए एक न्यायोचित माहौल बनाने की बातचीत |  खासतौर से उन्नीसवी शताब्दी में जब सुधारवादी आन्दोलन शुरू हुए, उस वक्त जो सबसे पहला कार्यक्रम बना, समाज सुधार में स्त्रियों की स्थिति | स्त्रियों के बंदी जीवन में समानता का कहीं कोई अवसर नहीं था | शिक्षा उनके लिए निषेध थी | उनकी कोई आवाज ही नहीं थी | आज  स्त्रियों को संविधान में बराबर के अधिकार तो हैं | लड़कियों के लिए राज्य की ओर से शिक्षा के लिए प्रबंध भी किये गए हैं, और एक बड़ा मध्य वर्ग भी बना है  जिसमें सामान्यत: स्त्री और पुरुष की समानता की बात होती है | लेकिन पूरे समाज में, स्त्री को अपने बराबर समझने की बात करें, तो वह आज भी नहीं है |  आज भी स्त्रियां सम्मानजनक स्थितियों में नहीं जी रही है | स्त्रियों के लिए समाज में एक सामान वातावरण बनाने के लिए जमीनी कोशिशें करनी पड़ेंगी ।’ 

समय के सानिध्य में अपनी मज़बूत प्रासंगिकता के साथ आज भी खड़े ‘स्त्री आंदोलन के विभिन्न पहलुओं पर, वर्तमान साहित्य की पूर्व सम्पादक, साहित्यकार ‘डॉ० नमिता सिंह’ से बात की ‘हमरंग’ की सहयोगी सम्पादक ‘अनिता चौधरी’ ने  । 

हाँ ! मैंने कहा था॰॰॰॰॰॰ 

           १- आज स्त्री आन्दोलन किस दिशा में चल रहा है ? या इसकी गति क्या है ?

  1.  आज हम अपने देश की बात करें तो स्त्री आन्दोलन एकांगी चल रहा है | उसके अपने कारण है | आज पूरे देश में रेप की घटनाएँ हो रही है| इस रूप में स्त्रियों के साथ जो व्यवहार पूरा समाज कर रहा है | अगर स्त्री आन्दोलन ऐसा ही चलता है तो वह जस्टिफाइड है क्योंकि समाज, स्त्रियों की एक सम्मानजनक स्थिति के लिए तैयार नहीं हो पा रहा है | इसके लिए बहुत बातचीत भी हो रही है | जब कभी कोई रेप की बड़ी घटना होती है | मोलीस्ट्रेशन की बात होती है, बड़ा  हल्ला-गुल्ला भी होता है | कैंडिल मार्च भी निकाले जाते है | लेकिन जब हम स्त्रियों के प्रति माइंड सैट करने की बात करते है तो वह एक दिन की बात नहीं होती | एक सुनियोजित रूप में वातावरण तैयार करने की बात होती है इसके लिए लम्बे प्रयास करने होते है | इसलिए हम स्त्री आन्दोलन की बात करें तो आज जो स्त्रियों के प्रति हिंसा की घटना है | उससे जुडा हुआ लग रहा है |२. अक्सर यह सुनने में आता है कि दशकोंसे स्त्रीविमर्श हो रहा है क्या अब भी इसकी आवश्यकता है ? 

    अनिता चौधरी

      स्त्री विमर्श का मतलब है कि स्त्रियों की स्थितियों पर बातचीत और उनके लिए एक न्यायोचित माहौल बनाने की बातचीत | यह बातचीत भी पिछले ढेड़ सौ या पौने दो सौ सालों से शुरू हुई है | उससे पहले इस तरह की कोई बात नहीं होती थी | खासतौर से उन्नीसवी शताब्दी में जब सुधारवादी आन्दोलन शुरू हुए, उस वक्त जो सबसे पहला कार्यक्रम बना, समाज सुधार में स्त्रियों की स्थिति | स्त्रियों के बंदी जीवन में समानता का कहीं कोई अवसर नहीं था | शिक्षा उनके लिए निषेध थी | उनकी कोई आवाज ही नहीं थी | तब से तो बात शुरू हुई | धीरे-धीरे आज हम इस स्थिति पर पहुँचे है कि स्त्रियों को संविधान में बराबर के अधिकार है | स्त्रियों के लिए राज्य की ओर से भी शिक्षा के लिए प्रबंध किये गए है और एक बड़ा मध्य वर्ग बना है | जिसमें सामान्यत: स्त्री और पुरुष की समानता की बात होती है | यह समानता की बात शिक्षा के स्तर पर भी होती है | लेकिन पूरे समाज का एक रवैया जो एक स्त्री को भी अपने बराबर समझने की बात करे, वह तो आज भी नहीं है |  आज भी स्त्रियां असम्मानजनक स्थितियों में जी रही है | स्त्रियों के लिए समाज में एक सामान वातावरण बनाने के लिए जमीनी कोशिशें करनी पड़ेंगी, इसके बाद भी कितना लंबा वक्त लगेगा | जिससे हम कुछ अचीव कर पाये | इसलिए स्त्री विमर्श को कम करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता है |

    ३. स्त्री सुरक्षा को लेकर जो कानून बनाए गए है | उनका असर आप समाज में कितना देखतीहै ?

    स्त्रियों के लिए क़ानून तो बहुत पहले से ही बनाए जा रहे थे | लेकिन उनमें बहुत लू पोल्स थे | धीरे-धीरे बात होती गई | महिला संगठनों ने भी इस पर बात की | दिसंबर २०१२ में निर्भया कांड से लोगों में ज्यादा जागरूकता आई | तब जस्टिस वर्मा कमेटी के सभी बिन्दुओं पर व्यापक रूप से चर्चा की गई और क़ानूनों में भी बदलाब किये गए | लेकिन क़ानून बना देने से भी तो कुछ नहीं होता | उसमें जो कठोर प्रावधान बने तो उसका नतीजा यह हुआ कि अब गैंगरेप करने के बाद लड़की की ह्त्या कर दी जाती है | जिससे सबूत भी मिट जाते है और जुर्म साबित भी नहीं होता है | कहने का मतलब यह कि समाज की स्थिति भी ज्यों की त्यों है | उसकी सोच में  एक रत्ती भर का परिवर्तन नहीं आया है | अंतर सिर्फ यह है कि अगर सबूत है और जुर्म  साबित हो जाता है तो उसको सजा मिल जायेगी | वरना आज से दस या बारह साल पहले जो आंकड़े लिए जाते थे तो उसमें कन्वेंशन रेट बढ़ा है | आज वह न्याय माँगते-माँगते तंग आ जाती है | जिसका अंत फिर सुसाइड में होता है | कितने ऐसे केस हुए है जहाँ बलात्कार की पीडिता ने अंत में आत्महत्या ही कर ली | इसलिए बदलाव तो यह आया है कि अब रेप होते है और सुबह ह्त्या हो जाती है | जिससे सबूत ही न रहे |

    4. ऑनर किलिंग या साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर कितनी महिला लेखक है जो इन्हें अपनी लेखनी में शामिल नहीं कर रही है | आपकोइसके क्या कारण नजर आते है ?

    अगर मैं साम्प्रदायिकता की बात करू तो यह जरुर है कि बहुत महिलायें इन मुद्दों पर नहीं लिख रही है | उसका एक कारण यह है कि सांप्रदायिकता के प्रति लोगों का दृष्टिकोण बहुत साफ़ नहीं है | लोगों ने साम्प्रदायिकता को खाली एक दंगा या लड़ाई-झगडे के रूप में देखा है | दूसरा कारण राजनैतिक है जो विशेष रूप से सत्ता या व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है | हमारे यहाँ पर लोग राजनीति से बहुत दूर रहते है और इसे बहुत बुरी चीज समझते और अक्सर कहते है कि    हमें राजनैतिक नहीं होना है | जब आप राजनैतिक ही नहीं होगें तभी तो आपको सम्मान और पुरूस्कार मिलेंगें | जब आप व्यवस्था पर चोट करोगे और उसे साम्प्रदायिकता का भागीदार बनाओगे तो वो आपको सम्मान देगा ?

    दूसरा यह है कि इस रूप में हमारी महिला लेखिकाएं सामाजिक आन्दोलनों से नहीं जुडी हैं | मैं अपने को बहुत सौभाग्यशाली समझती हूँ कि लेखन के साथ साथ मैं आन्दोलनों से भी जुड़ी रही  | खासतौर यहाँ कुंवरपाल का भी योगदान रहा था | हमने साथ मिलकर साम्प्रदायिकता के माहौल में सद्भावना और एकता के लिए राजनैतिक स्तर पर काम करने और इन चीजों से रूबरू होने की वजह से हम पुरुस्कारों और सम्मानों से दूर रहे | इसलिए हमारी महिला लेखिकायें और बहुत से पुरुष भी इन मुद्दों पर नहीं आते है कि यह खतरे की चीज है |

    जहाँ तक ऑनर किलिंग की बात है | इसे समझाने की जरुरत है कि खुद लेखक भी इसी समाज का प्राणी है | उसने अपने आप को सामाजिक और राजनैतिक रूप से इतना शिक्षित नहीं किया है  कि वह इन सवालों पर आपके साथ आ सके | अभी हमारे समाज में बहुत से लेखक व लेखिकाएं हैं | जहाँ जातियों से अलग या इंटररिलिजन शादियाँ हो जाए तो उसे खुद भी अच्छा नहीं समझते हैं | इसके लिए बहुत ही उदारवादी सोच व विचारधारा की जरुरत होती है | तब आप इस पर उतनी ही प्रखरता से बात कर पाओगे और उसे संवेदना के स्तर पर महसूस करोगे | इस विषय पर कुछ एक कहानियाँ है, बहुत ज्यादा तो नहीं है | हाँलाकि यह एक व्यापक रूप से विषय नहीं बना है | लेखक अपने आस-पास जो देखता है उसी पर लिख देता है | लेकिन जब तक लेखक के पास पूरा वैचारिकता का आधार न हो तो वह मुश्किल होता है इन मुदद्दों पर अड़े रहना |

    5. ऑनर किलिंग या साम्प्रदायिकता जैसी घटनाओं के पीछे आप धर्म या धार्मिक मान्यताओं कोकितना जिम्मेदार मानती है ?

    पहले धार्मिक मान्यतायें ऐसी थी जो आप को एक अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करती थी | आज धार्मिकता का स्वरुप वह नहीं रह गया है | आज यह सीधे-सीधे सत्ता और राजनीति के मंतव्यों से जुडी हुई है क्योंकि राजनीति ही धार्मिकता का माहौल बना रही है जिसका निश्चित ही अपना मकसद होता है | इसलिए ये जो धार्मिक मान्यताएं है, साम्प्रदायिकता में बदल गयी है क्योंकि वह व्यवस्था से जुड़ जाती है | जहाँ तक आपने ऑनर किलिंग की बात कही है | ये कमन्युनीटी खाप पंचायते हैं | जो जाटों की पंचायते है और मुस्लिम समुदाय की भी अपनी पंचायतें हैं जहाँ पर वे फतवे देते हैं | ये पंचायतें बहुत ही सामाजिक संकीर्णता की बात करती है | ये खाप पंचायतें वहां स्त्री विरोधी निर्णय लेकर जो पूरा माहौल बनाती हैं तो उसका विरोध कोई क्यों नहीं करता है | वे विरोध इसलिए नहीं करते हैं कि हमारे जो राजनेता हैं वे खाप पंचायतों के बीच में जाकर कहते हैं कि वे उनके बहुत बड़े हिमायती है | जबकि वे स्त्री विरोधी बातें कर रहे हैं | चूकिं राजनेताओं का खाप पंचायतों के रूप में एक बहुत बड़ा वोट बैंक हैं | ठीक यही स्थिति मुस्लिम समुदाय की भी है | उनके धार्मिक नेता भी फतवे जारी करते हैं | अगर विरोध किया तो उनके वोट चले जायेंगे इसलिए ये संस्थाएं वोट बैंक की राजनीति से जुड़ जाती हैं | एक प्रभावी रूप से उसका प्रतिवाद नहीं हो पाता |

    6. वर्तमान समय में युवा पीढ़ी या ख़ास तौर से युवातियाँशादी जैसी संस्थाओं से विमुख हो रही है | आप इसके क्या कारण मानती है ?

    खासतौर पर जब युवतियां शादी जैसी संस्था से दूरी बना रही है | उसका कारण है कि भारतीय पारम्परिक संस्कार में शादी के बाद, उस रुढीवादी पुरुष को पत्नी रूपी महिला पर डोमिनेंट होने का जो पारिवारिक वातावरण मिल जाता है | आज लड़की उस वातावरण से वैचारिक रूप से मुक्त होना चाहती है | उसने एजूकेशन के साथ जो विचारधारा पढी है उसी के अनुसार जीवन जीना चाहती है | लेकिन हमारे भारतीय परिवार और परम्परा की अवधारणा के अंतर्गत शादी के बाद पति को पत्नी पर कई सारे अधिकार मिल जाते है जो हर स्तर के होते है | चाहे वह सेक्स के रूप में हो या परिवार में डोमिनेंस के रूप में | आज की कोई भी पढी-लिखी लड़की किसी भी वर्ग की हो, उसकी भी अपनी मर्जी और इच्छा है | कोई जरुरी है, पति के चाहने पर बच्चे पैदा हो | वह नहीं चाहती तो यहीं पर क्लैश हो जाता है | यहाँ पर पति में अपने अधिकार की भावना जागृत हो जाती है | लड़कियों के पढ़ने-लिखने से उनमें एक स्वाभिमान, अपनेपन, अस्मिता और अपने व्यक्तित्व के प्रति सजगता की जो स्थिति आई है | वहां पर इस तरह के क्लैशेज होना बहुत स्वाभिक है | इसलिए कई बार ठोस स्थूल कारण नहीं होने पर भी तलाक हो जाता है | इसीलिए वे कहती है कि हम इस तरह से बंधन में नहीं रह सकती | हम स्त्री सशक्तिकरण और  स्त्रियों के प्रति हिंसा बात करते है लेकिन जब तक हमारे पुरूष समाज की एजूकेशन नहीं होगी तब तक ये चीजें सही नहीं हो सकती है |इसीलिए तलाक हो रहे है, अलग-अलग रहने की बात हो रही है, लिव इन रिलेशनशिप हो रही है या फिर शादी ही न करो | इन जड़ परम्पराओं या संस्कारों की वजह से भी इस युवा पर दूसरा समाधान तो है नहीं और न ही कोई आइडियोलोजी है इसीलिए उसे लगा कि सात फेरे लेना जिन्दगी का इतना बड़ा जहर बन जाए, इससे अच्छा है हम इससे दूर हो जाए | यह केवल ग्लोबल इफेक्ट ही नहीं है इसमें लड़कियां पढ़-लिखकर एक चेतना संपन्न हो गयी है | यह भी एक कारण है | यह बदलाव सिर्फ हाई क्लास की लड़कियों में ही नहीं हैं | पहले की अनपढ़ और पढी-लिखी लड़कियां भी इस तरह के निर्णय ले रही है | क्योंकि वह इस तरह के वातावरण को देख रही है तो उनकी मानसिकता में बदलाव है | लेकिन यह बदलाव लड़कियों के स्तर पर तो हो रहा है | पूरे समाज के स्तर पर नहीं हो रहा है | इसीलिए कॉण्ट्राडिक्शन्स पैदा हो रहे है | मैं हमेशा कहती रही हूँ कि जब भी हम स्त्री सशक्तिकरण और स्त्री विमर्श की बात करें तो यह केवल स्त्री समूहों के लिए नहीं है | पूरे समाज को एडजस्ट करने वाली बात कहें |

    7. धार्मिक संवाहक महिलायें ही मानी जाती है | अगर आप इस बात सेसहमत है | तो क्यों ? अगर नहीं तो क्यों ?   

    हाँ मैं इस बात से पूरी तरह से सहमत हूँ कि हमारे समाज में महिलायें ही संवाहक हैं | हमारे यहाँ जब से मानव समाज बना है | समाज में वर्ण आश्रम हुआ है | यह परम्परा तब से चली आ रही है | जब हमारा पुरुषवादी समाज बना और इसकी सामन्ती स्तिथियाँ आई | ब्राह्मणों और राजसत्ता में एक संघर्ष हुआ | उसके बाद क्षत्रीयों ने कहा कि यह राजसत्ता हमारी है, इसे  हम चलाएंगे, तुम समाज को चलाओ | अब समाज को चलाने में जो सबसे कमजोर तबका था वे स्त्रियों थी, जिन्हें आसानी से हेंडिल किया सकता था इसलिए ब्राह्मणों का वर्चस्व परिवारों की स्त्रियों के बीच रहा है | अगर हम एक दो पीढ़ी पीछे पास्ट में देखें तो कुछ लोग बहुत पढ़े-लिखे होने के साथ-साथ, बड़े उच्च पदों में हुआ करते थे लेकिन घर की औरतें बहुत ही पारम्परिक तरीके से परदे के पीछे रहा करती थीं | जो बिलकुल साक्षर नहीं होती थीं और बहुत ही धार्मिक कर्मकांडों को करने वाली थीं क्योंकि हमारे समाज में इसी प्रकार का डिवीजन हुआ कि पुरुष बाहर का ही देखेंगे, चाहे वह किसी भी क्षेत्र में कितना भी आगे बढे या उन्नति करे और स्त्रियाँ बिलकुल उन धार्मिक परम्पराओं को ही मानेंगी, जिन्हें हम भारतीय परम्परा कहते है | इन परम्पराएं को स्त्रियों ही शेप दे रही हैं | आज लड़कियां पढ़-लिखकर थोड़ा नौकरी कर रही है इस रूप में स्वतंत्र है लेकिन उनकी मानसिक स्थिति को बदलने की कोशिश नहीं की गई है | वे सारा कुछ उन्हीं परम्पराओं से ले रही हैं जो उनके तत्व कहे जा सकते हैं | आज, इन्हीं औरतों के बल पर धर्म आधारित आन्दोलन संचालित हो रहे हैं जो पूरी राजनैतिक व्यवस्था से जुड़े है | इस पर कभी किसी ने विचार करने की भी कोशिश नहीं की है और साथ ही इस बात पर भी महत्व नहीं दिया कि घर की औरतें की एजूकेशन और उनके लिए सही परिप्रेक्ष्य में देखना होना चाहिए|

    8. आपको नहीं लगता है कि सम्पूर्ण स्त्री आन्दोलनों को इस दिशा में कोई सशक्त कदम उठाने चाहिए | और वो क्या कदम हो सकते है  

    आज से दस या बारह साल पहले स्त्री विमर्श पर बात करते थे (हांलाकि आज भी करते हैं) | तो हम कहते थे कि स्त्रियों की आपस में एकता होनी चाहिए | पूरी दुनिया की औरतों की एक सी कठिनाईयां, कष्ट और समस्याएं है | हमने देखा कि समाज में आज भी वर्णवादी व्यवस्था बहुत निर्मम है | दलितों की स्थितियां देखी या २००२ में गुजरात देखा उससे पहले भिमंडी देखा | यह सब देखकर हमारी स्त्री विमर्श की अवधारणा बिलकुल समाप्त हो गयी इसलिए स्त्रियों पर बात करते वक्त हमारा बयान वर्ग आधारित होना चाहिए | बिना वर्ग आधारित स्त्री विमर्श किये, हम सही नतीजों पर नहीं पहुंच सकते है | हमें दलित स्त्रियों की अलग तरह से बात करनी पड़ेगी और वहीँ हमें ग्रामीण स्त्रियों की बात दूसरी तरीके से करनी होगी जहाँ ईसूज भी दूसरे हो जायेंगे | शायद जो पहले महत्वपूर्ण नहीं थे लेकिन दूसरी जगह महत्वपूर्ण हो जायेंगे | इस तरह से जब हम धार्मिक पहलू पर बात करेंगे तो हमारी एप्रोच मिडिल क्लास औरतों के लिए दूसरी हो जायेगी जहाँ पर कि हमें कहना पड़ेगा कि धर्म के आधार पर एक समूह की औरतों पर अत्याचार होता है | उसके लिए कौन जिम्मेदार है ? कैसे हम उसका निराकरण कर सकते है ? यह हमारी क्लास बेस्ड एप्रोच होनी चाहिए | उसके बिना हम सही नतीजों पर नहीं पहुँच सकते और न ही सही तरीके से बात कर सकते है |

    9. अधिकतर कहानियों में कहानी के बिंदु घरेलू होते हैराजनैतिक नहीं होतेहै | इसके क्या कारण है कि स्त्रियां राजनैतिक मुद्दों पर नहीं लिखती है जोलिखती है उनका प्रतिशत  के बराबर रहता है ? 

    आज कुछ लेखिकाएं इन मुद्दों को ले रही है | लेकिन अभी भी बहुत बड़ी संख्या में महिला लेखिकाएं ऐसी है जो घरेलू और आपसी मुद्दों को ही लेती हैं | उसका कारण यह कि औरतें अपने दुखों से ही इतनी परेशान होती है लेकिन कुछ लेखिकाएं है जिनकी नजर सभी जगहों पर नजर जा रही है | उन्होंने आदिवासियों पर, विस्थापन पर और जाति व्यवस्था की विद्रूपताओं पर लिखा है और उनमें राजनैतिक विषय भी है | लेकिन मैं इस बात को मानती हूँ कि राजनीति में लिखना जो है अपने आप को अग्निपथ से निकलना है और जितनी बड़ी लेखिकाएं हैं वो सब महिलायें बड़े-बड़े सम्मानों और पुरुस्कारों से विभूषित हो चुकी है | वे नहीं लिख सकती क्योंकि इन्हें व्यवस्था और पूरी सत्ता पर चोट करनी पड़ेगी | अगर आज हम गंभीर लेखन के जरिये  सांप्रदायिकता पर चोट कर रहे है तो कैसे सत्ता व्यवस्था को छोड़ देंगे | मेरा उपन्यास ‘लेडीज क्लब’ और बहुत सारी कहानियाँ है जैसे- राजा का चौक है उसमें हम कैसे इन मुद्दों को छोड़ सकते है | अगर इन सब बातों पर लिखते है तो सत्ता व्यवस्था से अलग नहीं हो सकते है | मेरा मतलब है कि जब आप इन सब मुद्दों पर लिखेंगे तो आपको रायपुर कैसे बुलाया जाएगा (हंसते हुए) ? दूसरी एक बात और है| जैसे मैत्रेयी है, उन्होंने अपनी इमेज एक नारीवादी लेखिका के तौर पर बनाई है | अब सवाल उस इमेज को बनाए रखने का भी है | अगर आप स्त्रीवादी है और आपके लेखन में इससे इतर कोई बात आ रही है जैसे हम यह दिखा रहे है कि स्त्रियों पर भी आजकल के माहौल, ग्लोबलाइजेशन या बाजारवादी संस्कृति का असर है | उससे भी कभी-कभी औरतें भी शोषक के रूप में व्यवहार करने लगती है | इससे उनकी जो इमेज बनी हुई है वह खराब होगी | कई बार ऐसा होता है कि आपको अपनी इमेज को बनाये रखने के लिए एक ख़ास तरह का लेखन करना पड़ता है | तो यह भी एक मजबूरी हो जाती है कि जो इमेज बन गयी है उसको भी सुरक्षित रखने की जरूरत होती है | इसीलिए एक लेखक के तौर पर हमारा दृष्टिकोण सारभौमिक हो | जिससे हम राजनीति और साम्प्रदायिकता जैसे मुद्दों पर भी बात कर सके

अनीता द्वारा लिखित

अनीता बायोग्राफी !

नाम : अनीता
निक नाम : अनीता
ईमेल आईडी : anitachy04@gmail.com
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अनीता चौधरी 
जन्म - 10 दिसंबर 1981, मथुरा (उत्तर प्रदेश) 
प्रकाशन - कविता, कहानी, नाटक आलेख व समीक्षा विभिन्न पत्र-पत्रकाओं में प्रकाशित| 
सक्रियता - मंचीय नाटकों सहित एक शार्ट व एक फीचर फ़िल्म में अभिनय । 
विभिन्न नाटकों में सह निर्देशन व संयोजन व पार्श्व पक्ष में सक्रियता | 
लगभग दस वर्षों से संकेत रंग टोली में निरंतर सक्रिय | 
हमरंग.कॉम में सह सम्पादन। 
संप्रति - शिक्षिका व स्वतंत्र लेखन | 
सम्पर्क - हाइब्रिड पब्लिक  स्कूल, दहरुआ रेलवे क्रासिंग,  राया रोड ,यमुना पार मथुरा 
(उत्तर प्रदेश) 281001 
फोन - 08791761875 

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 117 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 78 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 137 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 157 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 260 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.