‘कल्चर ऑफ साइलेंस’: संपादकीय (मज्कूर आलम)

अपनी बात अपनी बात

मज्कूर आलम 323 2018-11-17

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’: संपादकीय (मज्कूर आलम)

‘कल्चर ऑफ साइलेंस’ 

मज्कूर आलम

मज्कूर आलम

तमाम हंगामों और तमाशों के बीच साल 2015 समाप्त हो गया। इस बीच साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक सारोकार की पैरोकारी के लिए बना वेबपोर्टल ‘हमरंग डॉट कॉम’ ने भी पिछले ही महीने अपना एक साल पूरा कर लिया। यह हमारे लिए भी चुनौती थी और है कि इसकी दिशा और दशा सही रखने के साथ-साथ इसकी निरंतरता भी हम बनाए रखें। जिस मकसद से यह शुरू हुआ था, वह बना रहे। साहित्यिक-सामाजिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में दखल रखने वाले, युवा प्रतिभाओं को, अपनी बात रखने के लिए एक प्लेटफॉर्म मिले, इस साल भी हमारी प्राथमिकता में यही होगा। हम इसमें कितने सफल हुए या होंगे यह कहना तो अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन इतना जरूर कह सकते हैं कि यह प्रयास जारी निरंतर रहेगा और साहित्यिक हस्तक्षेप की दिशा में हमरंग कभी चुप नहीं रहेगा।

चुप ! चुप्पी ! हां, यह एक चीज ऐसी जरूर रही, जिसे साल 2015 में पूरे साल होने वाले हंगामे और चलने वाले तमाशों के बीच हम सबने महसूस किया। हम सबने बेहद तकलीफदेह और चुभने वाली खतरनाक-सी चुप्पी इस साल महसूस की । यह चुप्पी अट्ठहास से भी ज्यादा खतरनाक इसलिए लगी, क्योंकि हमने देखा कि हर मुद्दे पर अपनी राय रखने वाले व्यक्ति ने भी कुछ खास किस्म के मुद्दों पर खामोशी ओढ़ और पहन ली।
अमूमन माना यह जाता है कि चुप्पी तटस्थ होती है। हम ऐसी स्थिति में ही खामोशी अख्तियार करते हैं, जब दोनों पक्षों की ओर से बोलना नहीं चाहते। ऐसे ही लोगों को लक्षित कर रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपनी कविता की यह पंक्तियां लिखी थी-

‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनके भी अपराध’

दिनकर जी ने ऐसा इसलिए लिखा था, क्योंकि वह जानते थे कि तटस्थता जैसी कोई चीज नहीं होती। वह हमेशा सशक्त के पक्ष में चली जाती है। इसी बात से वह हमें सचेत करना चाहते थे, लेकिन इस साल तो विश्व भर में इस चुप्पी का खुल्लम-खुल्ला इस्तेमाल रणनीतिक हथियार के रूप में किया गया। एक-एक चुप्पी के हजार-हजार मुंह बनते भी हमने देखे । सत्ता और शक्ति का संतुलन साधने में भी इसका इस्तेमाल होते देखा।

हालांकि यह भी सच है कि हंगामों के बीच के सूक्ष्मतम अंतरालों में खामोशियां छिपी ही होती हैं और यह भी तय है कि ये खामोशियां एक नये ‘तमाशे’ की पृष्ठभूमि तैयार करती हैं । लेकिन, अगर यह खामोशी ‘फैब्रिकेटेड’ हो और यह चुभने की हद तक चली जाए तो यह बेहद खतरनाक हो जाती हैं। अगर इन खामोशियों का समाज द्वारा प्रतिकार न किया जाए तो निश्चित रूप से यह खामोशी भी उन फैब्रिकेटेड निर्दयी खामोशियों की पक्ष में ही खड़ी नजर आती हैं और यह तब होता है, जब हम कल्चर ऑफ साइलेंस (मौन संस्कृति) को स्वीकार लेते हैं, और हमारी सहभागिता, संघर्षों, आंदोलनों और प्रतिरोधों में कम या खत्म होने लगती है। हालांकि ऐसी स्थिति में हमें चारों तरफ से शोर ही शोर सुनाई देता है। हर मुद्दे पर राय रखी जाती है, ताकि ‘चुप्पी’ का उत्स जहां है, वहां तक लोगों को पहुंचने न दिया जाए या फिर चुप्पी के ईर्द-गिर्द बुने गए इन अट्ठाहासों में बाकी की आवाज़ चुप्पी की स्थिति में पहुंच जाए यानी किसी को सुनाई न पड़े। आपने भी जरूर देखे-सुने होंगे इस साल ऐसे अट्ठाहास और चुप्पियां । इसी खतरे से आगाह कराते हुए ‘ग्राम्शी’ ने अपने समय की स्थितियों पर एक बार यह टिप्पणी की थी, ‘समाज में सभी मनुष्य बुद्धिजीवी हैं, परंतु सभी बुद्धिजीवी की भूमिका का निर्वहन नहीं करते।’

हम वैश्विक स्तर पर इसे साफ देख सकते हैं कि ‘ग्राम्शी’ की यह उक्ति कितनी सही थी। कल्चर ऑफ साइलेंस के कितने भयावह परिणाम हो सकते हैं, यह आज हमारे सामने है। रूस ने जब इस साल आईएस के खिलाफ मोर्चा खोला तो अमेरिका समेत कई शक्तिशाली राष्ट्रों ने इस पर ऐसी चुप्पी साध ली, जैसे कुछ हुआ ही न हो। अमेरिका और उसके गुट के राष्ट्रों का सीधा-सा अर्थ था, शक्ति संतुलन अपने पक्ष में रखना। इनके चुप होने की वजह से सशक्त अंतरराष्ट्रीय मीडिया जगत भी इस मुद्दे पर पूरे साल लगभग खामोश-सी ही रही । हाशिये की खबर की तरह आईएस पर रूस के हमले की खबरें हम तक जरूर आती रहीं।
अगर इस चुप्पी को बेहतर तरीके से समझना है तो इराक युद्ध के समय की स्थिति या अमेरिका के ट्विन टॉवर गिरने के बाद ओसामा बिन लादेन के खिलाफ चलाया गया अभियान अथवा अफगानिस्तान में जब अमेरिकी सेना के नेतृत्व में कई देशों की सेनाएं लगी थीं, उस समय को याद कीजिए- फर्क खुद-ब-खुद समझ में आ जाएगा। हालांकि फ्रांस में हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका भी इस युद्ध में कूदा, लेकिन रूस के साथ नहीं, उसने अपना अलग मोर्चा खोल रखा है।
इस प्रकार जहाँ एक खास तरह की कट्टरता को लेकर पूरी दुनिया में माहौल बनाया गया तो वहीं दुनिया भर में एक दूसरी तरह की कट्टरता, जो इस ‘चुप्पी’ के साथ-साथ हमारे-आपके जीवन में प्रवेश करती जा रही है, उसके खिलाफ आपको शायद ही कुछ सुनने को मिले। इसे साजिशन न भी कहें तो यह तो कह ही सकते हैं कि इस मसले पर जान-बूझ कर (फैब्रिकेटेड) चुप्पी साधे रखी गई । यह मौन प्रश्रय इस कट्टरता को बहुत तेजी से पूरी दुनिया में फैला रहा है, जिसे लेकर दुनिया भर के समाज में बेचैनी महसूस की जा रही है । इस चुप्पी ने नफरत की जमीन तैयार की, जिसकी फसलें अब लहलहाने लगी हैं ।

इस खामोशी ने पूरे साल देश-दुनिया को परेशान रखा, लेकिन तटस्थता की पहचान के रूप में जानी जाने वाली इस चुप्पी को क्या सच में तटस्थता की श्रेणी में रखा जा सकता है। या फिर कवि अवतार सिंह ‘पाश’ की भाषा में कहूं तो यह चुप्पी, सहमी-सी चुप्पी है। नहीं यह वह भी नहीं। यह पूरी मुखरता के साथ ‘पक्षधर चुप्पी’ है।
जब मैंने इस चुप्पी पर संपादकीय लिखना चाहा तो पहली बार में अनायास कुछ ऐसे अस्फुट से ख्याल मेरे दिमाग में आए, जिसे लिखते वक्त मैंने बहुत बेचैनी भी महसूस की-

यह चुप्पी
अब तक हमने यही सुना है
चुप्पी हामी है
चुप्पी समर्थन है
चुप्पी सोना है

एक और चुप्पी है

आंखों की भाषा में है
दिलों की धड़कन में है
प्रेम के स्रोत में है

पर यह चुप्पी वह चुप्पी तो नहीं
न ही सहमी-सी चुप्पी में जकड़े जाना है

तो फिर कैसी है यह चुप्पी
जिसने सी दिए हैं औरों के लब

यह चुप्पी ‘पाश’ का वह चांद है
जो अपनी नर्म रोशनी में पिघला देता है हर सख्ती को
कि ‘सबसे ख़तरनाक वो चांद होता है
जो हर हत्याकांड के बाद
वीरान हुए आंगन में चढ़ता है
लेकिन आपकी आंखों में मिर्चों की तरह नहीं गड़ता’
क्योंकि वह चुप रहता है
नजरें फेर लेता है
और उसकी चुप्पी पैदा करती हैं, हिंसक खामोशी की प्रतिध्वनियां
गली-गली, शहर-शहर
फिर वीरान पड़ जाती हैं बस्तियां
हमेशा के लिए सन्नाटे में तब्दील होकर
तमाम किंतु-परन्तु, अगर-मगर के बाद भी
यह चुप्पी इतिहास में दर्ज नहीं होती
नहीं, कभी नहीं
क्योंकि यह चुप्पी तटस्थता में नहीं आती

अर्थात यह चुप्पी इतनी निर्दयी चुप्पी है कि अपनी खामोशी के भीतर सबको समेट लेती है। इसके बाद आप सिसक तो सकते हैं, लेकिन वह सिसकी भी बेआवाज हो जाती है, क्योंकि इन सिसकियों के चारों ओर अट्ठाहास गूंज रहे होते हैं । इस हिंसक चुप्पी के सामने डर से आम आदमी की बोलती बंद है | अगर कोई हिम्मत करता भी है तो वह खामोश कर दिया जाता है । उदाहरण में लिखने के लिए सिर्फ यूनान, सुधींद्र कुलकर्णी, दाभोलकर, कलबुर्गी और पंसारे ही नहीं हैं, विश्व-पटल की तरफ नजर उठा कर देखिए तो ऐसे लोगों, समाजों, देशों को आर्थिक, मानसिक या शारीरिक प्रताड़ना के द्वारा चुप कराए जाने के ढेरों उदाहरण आपको मिल जाएंगे। अगर एक साल और पीछे की बात करें तो 2014 में नोबेल पुरस्कार पाने वाली मलाला युसुफजई पर हुआ हमला और एक पाकिस्तानी स्कूल पर हमला कर सैकड़ों मासूमों को मारना भी तो चुप कराने का ही एक तरीका था।

अब चूंकि ‘उम्मीद’ अब भी एक जिंदा शब्द है, इसलिए इस नये साल में हमरंग आप सबको शुभकामना देते हुए यह उम्मीद करता है कि ‘कल्चर ऑफ साइलेंस’ को बुद्धिजीवी या आम समाज में रत्तीभर भी जगह नहीं मिलेगी। हम मुखर होंगे… हर चुप्पी के खिलाफ!

साहित्यिक, सांस्कृतिक अपूर्णीय क्षिति या कहूं साहित्य और कला जगत के लिए किसी ह्रदय आघात से कम नहीं था, बीते वर्ष में एक के बाद एक हमसफरों का दिवंगत होना | हम उन्हें श्रृद्धांजलि अर्पित करते हुए यह यकीन रखते हैं कि वे सभी ज़िंदा रहेंगे हमारे शब्दों, एहसासों और ज़ज्बातों में |

पुनः आप सभी को नए साल की अनेक अनेक बधाइयां ……|

मज्कूर आलम द्वारा लिखित

मज्कूर आलम बायोग्राफी !

नाम : मज्कूर आलम
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 240 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 159 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 244 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 245 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.