ग्लोबल गांव में रंगकर्म पर संकट: आलेख (राजेश कुमार)

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राजेश कुमार 20 2018-11-18

मौजूदा जो हालात है उसमें रंगमंच को विकेन्द्रित करना ही होगा। रंगमंच की स्थानीयता को पहचान देनी होगी। इसके कथ्य और रंगकर्म को सम्मान देना होगा क्योंकि इन्होंने कारपोरेट के सम्मुख घुटने नहीं टेके हैं बल्कि जो व्यूह फैला हुआ है उसे निरन्तर तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं । ॰॰॰॰॰॰॰॰

ग्लोबल गांव में रंगकर्म पर संकट 

राजेश कुमार, google से साभार

जैसा कि लोग कहते हैं पूरा विश्व एक गांव होने जा रहा है। विकास की जो रफ्तार है, बाजार का जो विस्तार है, वह मुल्क की सीमाओं को तोड़ देगा। जात.पात, रंगभेद व संस्कृति में कोई विभेद नहीं रहेगा। इस अवधारणा को अब धीरे.धीरे देखा ही जा रहा है ॰ विशेषकर महानगरों में। लोगों की चिन्ता ही रही है कि पूरा विश्व जब एक गांव में ढल जाएगा तो उसकी संस्कृति, परम्परा का क्या रूप रहेगा ॰ ऐसी ही चिन्ता रंगकर्म से जुड़े लोगों की है और रंगकर्म खासकर हिन्दी रंगकर्म की ॰ वर्तमान में जो स्थिति है उसे लेकर ऐसा सोचना वाजिब है। महानगरों की तो बात ही छोड़िए जिस तरह छोटे.छोटे शहरों में वैश्विकता का असर दिख रहा है जिस तरह का बाजार नए रूप में पदार्पण कर गया है उससे रंगकर्म पर गहरा संकट उतर आया है। मॉल, मार्ट और मल्टीप्लेक्सेज के निर्माण में जिस तादाद में पूंजी निवेश हुआ है ॰ एक नए बाजार के निर्माण में जिस तरह राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय व्यापार वर्ग संलिप्त है, उसकी तुलना में रंगमंच पर कितना व्यय हुआ है ? नेहरू युग में जो हुआ क्या उसके बाद किसी सरकार ने इस क्षेत्र में नीतिगत स्तर पर गम्भीरता से कोई कार्य किया है ? विश्लेषण करने पर सिवाय निराशा के कुछ हाथ नहीं आने वाला। और सत्ता से जुड़े लोग इस बिन्दु पर स्पष्ट हैं कि रंगकर्म किसी भी तरह से उनकी राजनीतिक फसल के लिए उपयोगी नहीं है। कुछ करने के बाद वोट की प्राप्ति की कोई सम्भावना नहीं है ॰ इसलिए कभी  कभार संस्कृति के नाम पर कुछ कहने को कर दिया जाता है लेकिन कदापि इनकी मूल सम्भावना विकास के सम्बन्ध में नहीं होती है। और पूंजी से पूंजी बनाने वाले भला इस क्षेत्र में क्यों निवेश करे जो सिवाय घाटे के कुछ नहीं है। विदेशी पूंजी वाले वहीं पूंजी लगाते हैं जहां उन्हें मुनाफा नजर आता है और देशी पूंजी वालों को धर्म.संस्कृति के नाम पर कुछ पुण्य कमाना होता है तो उनकी पहली प्राथमिकता मन्दिर, धर्मशाला, गौशाला जैसे कार्यों में होती है। आज भी मन्दिरों की व्यवस्था को खंगाले तो पाएंगे कि उन्हें कई माध्यमों से अर्थ सहयोग मिलता रहता है। इसलिए थिएटर की अपेक्षा इस मुल्क में मन्दिर व अन्य धर्म के संस्थान अधिक मात्रा में फल.फूल रहे हैं। रंगमंच जैसा पहले था आज भी है बल्कि जर्जर अवस्था में है।

गांव की तो बात ही छोड़िए कुछेक महानगरों को छोड़ दीजिए तो कितने शहरों में रंगकर्म करने के लिए प्रेक्षागृह हैं ? वह माहौल है जहां नाटक किया जा सके। अपवाद को छोड़ दें तो अधिकतर की ये हालत है कि प्रेक्षागृह के नाम पर वह सभागार खाली गोदाम सा होता है। मंच बना है तो कुर्सियां नहीं हैं। विंग्स नहीं है कोई मेकअपरूम नहीं है। साउण्ड और लाइट सिस्टम का तो नाम ही न लीजिए। पंखें हो तो गनीमत है, वातानुकूलित तो उनके शब्दकोश में ही नहीं होगा। बताइए देश के अधिकतर शहरों में जहां इस तरह के प्रेक्षागृह हो वहां कोई कैसे थिएटर करेगा ? भयानक अभावों में जीने वाले रंगकर्मी भला अपनी परिकल्पना को उस जड़ रंगमंच में कैसे जीवन्त कर सकेंगे ? कोई रंग प्रयोग करना चाहे तो दूर.दूर तक इसे पूर्ण करने की कोई सम्भावना नजर नहीं आती। लाचारी का नाम खेसारी वाली कहावत के अनुसार थक.हार कर रंगकर्मियों को अपनी रंग प्रस्तुतियों को लेकर कई समझौते करने पड़ते हैं। छोटे शहरों में तो प्रेक्षागृह न होने की स्थिति में प्रायर धर्मशाला किसी बारातघर या किसी खुले मैदान में टेम्पररी स्टेज-शामियाना लगा कर नाटक करते हैं। ऐसे में उन्हें जहां एक तरफ प्रस्तुति की स्तरीयता को बरकरार रखने के लिए जूझना पड़ता है तो दूसरी तरफ आर्थिक चुनौतियों से भी कदम कदम पर टकराना पड़ता है। महानगरों की तरह वहां उन्हें सरकारी अनुदान तो मिलता नहीं है न कोई कारपोरेट सहारा देने के लिए आगे आता है। जो भी करना होता है जनता के भरोसे करना होता है। रसीद काट कर घर-घर जाकर चंदा लेकर या व्यक्तिगत स्तर पर सहयोग कर।

महानगरों की तो और ही व्यथा है। वहां अगर कोई नाटक से ही गुजारा करना चाहे या उस माध्यम से सरोकार रखना चाहे तो आसान नहीं है। प्रेक्षागृह ही इतने महंगे हैं कि सामान्य रंगकर्मी उसे किराए पर लेने के पहले दस बार सोचेगा। ले भी लिया तो टिकट प्रबन्धन इतना आसान नहीं है। उस पर जो सरकारी प्रक्रियाएं होती हैंए वह भी रहा सहा उत्साह ठण्डा कर देता है।

लेकिन ऐसा भी नहीं होता है कि महानगरों में नाटक होते ही नहीं हैं। होते हैं और खूब होते हैं लेकिन उसी तरह के होते हैं जो या तो सरकारी अनुदान वाले होते हैं या किसी न किसी राष्ट्रीय.अन्तरराष्ट्रीय संस्थानों के प्रायोजकों द्वारा प्रायोजित लेकिन इस तरह के जो नाटक होते हैं वे किसी न किसी रूप में उन प्रायोजकों के हित को ध्यान में रखने वाले होते हैं। ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि सरकारी संस्थान या किसी बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा आयोजित नाट्य समारोह हो और नाटक किसानों की आत्महत्या आदिवासी के जल-जंगल-जमीन को लेकर लड़ने वाली लड़ाई और साम्प्रदायिक दंगे में राजनीतिक दलों की भूमिका पर केन्द्रित हो। और ऐसे महोत्सवों में दर्शक भी सामान्य नहीं होते। वे अभिजात्य-अभिजन वर्ग के होते हैं जिनके लिए नाटक महज मन बहलाने वाली चीज होती है। मूड फ्रेश करने जैसी।

इन दिनों महानगरों में कई संस्थाएं रंगमंच के क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की तरह उग आई हैं जिनका उद्देश्य कोई रंग आन्दोलन नहीं होता न किसी सरोकार के तहत नाटक करना होता हैए बल्कि उन्हें भान हो गया है कि अन्य व्यवसायों की तरह नाटक भी एक लाभकारी व्यवसाय साबित हो सकता है। इस मुहिम में कारपोरेट घरानों का भी पूरा सहयोग रहता है। चूंकि कारपोरेट को एक ऐसा मंच चाहिए जहां से उसके उत्पादों का एक बाजार प्राप्त हो सके इसके लिए वे नाट्य आयोजक ऐसे नाट्य आयोजन करते हैं जहां उन उत्पादों के उपभोक्ता आ सकें। जाहिर है ऐसे उपभोक्ताओं के लिए जनसरोकार वाले नाटक आकर्षण का केन्द्र तो बन नहीं सकते इसलिए उनका प्रयास होता है फिल्म व टीवी के कलाकारों द्वारा मंचित नाटकों को कार्यक्रम का हिस्सा बनाना और विषय का चुनाव ऐसा होता है जिससे खाते.पीते इन दर्शकों का मन बहलाव हो सके ॰ हल्के फुल्के सेक्स कॉमेडी से इन्हें गुदगुदा सके। ऐसे कार्यक्रमों में प्रायोजकों का विज्ञापन बराबर फिल्म की तर्ज पर किया जाता है। प्रस्तुति के पूर्व बड़े स्क्रीन पर कई बार उन उत्पादों का प्रचार दिखाया जाता है। जाहिर है ऐसे कार्यक्रमों में भीड़ भी खूब जुटती है। कुछ लोगों को इससे ऐसे रंग आन्दोलनों में क्रान्ति आने का भी भरम हो जाता है लेकिन हकीकत में ये होता नहीं है। ये प्रायोजित दर्शक होते हैं। इन्हें बुलाया जाता है तो आते हैं। वैसे रंगमंच के प्रति इनकी कोई प्रतिबद्धता नहीं होती है।

एक और प्रवृत्ति आजकल खूब चली है। देश के कई शहरों में रंग महोत्सव भी खूब होते हैं। इन्वेण्ट की तरह ही कुछ न कुछ रूप इसका भी होता है। वे करते क्या हैं कि केन्द्र या राज्य से रंग महोत्सव के नाम पर जोड़ तोड़ कर बड़े पैमाने पर फण्ड लेकर आते हैं और इसमें देश भर के स्थापित रंग संस्थाओं को बुलाते हैं। हफ्ते.दस दिन तो खूब चहल.पहल रहती है लेकिन महोत्सव के खत्म होते वहां का माहौल फिर वहीं का रह जाता है। रंगमंच से जुड़े जो सवाल होते है वह अब भी बने हुए रह जाते हैं रंगमंच के बुनियादी सवाल सुलझते नहीं हैं। ऐसा क्यों होता है ? ऐसा इसलिए कि वहां के रंगमंच के आधारभूत ढांचे को दुरुस्त करने की जो जरूरत है उस पर कुछ कार्य नहीं होता है। केवल सुपर स्कल्पचर पर काम करने से जर्जर दीवारों को ऊपर से टीपकारी कर लीपापोती कर ऊपर से रंगाई.पुताई से यथार्थ छिप नहीं सकता, न इस प्रक्रिया से बुनियाद पर फर्क पड़ने वाला। अन्तर आएगा जब स्थानीय रंगमंच को समृद्ध करेंगे वहां के लोक रंगमंच को अस्पृश्य भाव से नहीं देखेंगे। अपने को मजबूत किए बिना वाह्य सहारों से अगर सोचते हैं वहां का रंग आन्दोलन प्रबल हो जाएगा सिवाय भरम के कुछ नहीं है। बाहर की प्रस्तुतियों से कोई विरोध नहीं है लेकिन अगर स्थानीयता को कमतर आंक कर दरकिनार करने का प्रयास होगा तो ऐसे प्रयास पर प्रश्नचिह्न निश्चय ही खड़ा होगा।

मौजूदा जो हालात है उसमें रंगमंच को विकेन्द्रित करना ही होगा। रंगमंच की स्थानीयता को पहचान देनी होगी। इसके कथ्य और रंगकर्म को सम्मान देना होगा क्योंकि इन्होंने कारपोरेट के सम्मुख घुटने नहीं टेके हैं बल्कि जो व्यूह फैला हुआ है उसे निरन्तर तोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।

राजेश कुमार द्वारा लिखित

राजेश कुमार बायोग्राफी !

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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- पंकज तिवारी का आलेख 

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