एक अकेली स्त्री से मिलकर, एवं अन्य कविताएँ (डॉ० रंजना जयसवाल)

कविता कविता

डॉ० रंजना जयसवाल 122 2018-11-18

विवशता, कोमलता, आक्रान्त एवं संवेदनात्मक स्पंदन जैसे सूक्ष्म प्राकृतिक रूपों में प्रत्यक्ष स्त्री के मानसिक, दैहिक और वैचारिक मनोभावों को खोजने और समझने का प्रयास करतीं डॉ० रंजना जयसवाल की कवितायें…….

एक अकेली स्त्री से मिलकर  

डॉ० रंजना जयसवाल

पुरूष

उसकी चाल-चलन में बदचलनी

हाव-भाव में छाव

हँसी में फंसाव

मुस्कुराहट में आमंत्रण देखते हैं

उसकी देह और सम्पत्ति ऐसी लावारिस

कीमती वस्तु होती है

जिसे लपकने को सब झपटते हैं

हाँ,उसका मन बेजान वस्तु की तरह

उपेक्षित होता है सबके लिए

वह स्त्रियों के लिए खतरा होती है

पुरूषों के लिए प्रलोभन

उसकी उपलब्धियां दूसरों की कृपा

असफलता उसका अपना दोष

कोई उसकी कमी को नहीं पुरता

जो लबालब है उसे पाने को ललकता है

अपने-पराये सभी करते हैं उससे

बुढ़ापे और मृत्यु की बातें

ताकि उसका यौवन और जीवन

उनके इशारों का मुहताज बनकर रह जाए

कोई नहीं समझना चाहता

सामजिक प्राणी अकेली स्त्री के

असामाजिक हो जाने की व्यथा-कथा

यहाँ तक की स्त्रियाँ भी

मुझे लगता है

शायद स्त्रियाँ उससे नहीं

अपने-आप से नाराज रहती  हैं

कि नहीं कर सकतीं वे सब

जो कर गुजरती है अकेली स्त्री

वे सब असहय सहती हैं

पाले रहतीं हैं जीवन में कई-कई रोग

क्योंकि अकेली होने से डरती हैं

असुविधाओं और बुढापे से डरती हैं

डरती हैं उन उपाधियों के छीन लिए जाने से

जो उन्हें अच्छी और अकेली स्त्री को

बुरी के कटघरे में ला खड़ा करता है

वे अपनी असामयिक मृत्यु से भी

गौरवान्वित होती हैं

कि सतीत्व की बेदी पर दिए गए

उनकी बलि को सराहेगी

आने वाली नस्लें

अकेली स्त्री उन्हें इसलिए भयभीत करती है

कि बेदर्दी से काटकर फेंक देती है

असाध्य रोग से ग्रस्त अंग को

बुरी स्त्री कहलाने से नहीं डरती

अकेली होने से नहीं डरती |

सेमल

google से साभार

साँवली देह पर
लाल फूलों वाला
हरा कुरता पहने
रंगीला लग रहा है सेमल
छेड़ रही है भाभी हवा
चूम रही है प्रिया धूप
चिड़ियाँ बहनें गीत गा रही हैं
बहनोई कौओं को
मकरंद पीने से ही फुरसत नहीं
खिलखिला रहा है सेमल
बसंत के आते ही
अभी कल तक नंग-धडंग खड़ा था
तानाशाह शिशिर ने छीन लिए थे
हरे वस्त्र
ठंड से काला पड़ गया था साँवला शरीर
आज कितना सलोना लग रहा हँ
वही काला रंग
हरे और लाल के बीच
भूला नहीं है सेमल
शिशिर की ज्यादती
लाल फूलों में क्रोध की ऊष्मा है
ऊष्मा जो ढल रही है धीरे-धीरे
फलों के भीतर रूई की शक्ल में
शिशिर के विरोध का
गांधीवादी तरीका है यह
सेमल का |

फागुन 

कत्थई देह पर
गुलाबी…धानी हरे और पीले शेड्स वाले
फागुनी कपड़े पहने
साँवली बाहों में लाल फूलों की पिचकारी उठाए
आकाश को रंग रहा है सेमल
खुश है
कि इस फागुन में
पूरा कुनबा है साथ
बाल-युवा-वृद्ध पत्ते
कलियाँ-फूल सब
चींटे..भ्रमर ..कौओं जैसे
अतिथियों की भी आगत है
फागुन तुम्हारा स्वागत है |

नीम के फूल 

गूगल से साभार

नीम के दिन भी बहुरे हैं
उसकी नाजुक छरहरी टहनियों में
नए सुकुमार गुलाबी-धानी-हरे पत्ते ही नहीं
भुने रामदानों से खिले,नन्हें,नाजुक
भारहीन फूल भी आए हैं
जो गुच्छों में पतली सींकों के सहारे
हवा के झूले पर झूल रहे हैं
जाने कहाँ-कहाँ से आईं
एकरंग और बहुरंगी तितलियाँ
आहिस्ते से बैठकर उन फूलों पर
चूस रही हैं मकरंद
अपने पंखों को इतनी कोमलता से वे
फैलाती-सिकोड़ती हैं
कि उनके भार से टूटते नहीं
नीम के कोमलतम फूल
थोड़ा लरज जरूर जाते हैं
कल तक बदनाम था नीम अपनी कड़वाहट से
आज मिठास की गंध से
खींच रहा है तितलियों,चींटों और मधुमक्खियों को
कल उसके फूल बदल जायेंगे फल में
तब आयेंगे कई तरह के पक्षी भी
निम्बोरी का कषाय-मीठा स्वाद चखने
सिखाता है नीम कि कड़वे लोगों से भी
पा सकते हैं मनचाहा प्यार
बस तितलियों-सी समझ चाहिए |

प्रेम का दुख

वह पहला प्रेम नहीं था
जाने कैसे आखिरी बन गया
पाप कहो पुण्य कहो
गलत या सही जो भी नाम दो
किया तो किया प्रेम ही
अपने ख्यालों के एकांत में
खींच लाई उसे भी
जैसे दुख से बचने का इससे बेहतर
कोई उपाय ही न हो
दुख जो जन्मा था मेरे साथ ही
प्रतिद्वंदी रहा हर मोड पर
हारती रही थी उससे
प्रेम से हार गया दुख
पर बदले में दे गया
जीवन भर का दुख |

जबकि तुम 

google से साभार

जबकि तुम
चले गए हो कब के बिखेर कर
जिंदगी के कैनवस पर ताजा रंग
शहर में तुम्हारी गंध
फैली है अभी भी
हर आयोजन में
अखबार के पन्नों में
ढूँढती हूँ तुम्हें
नींद में मिलती हूँ
लगभग रोज
आज भी उसी आवेग से

जबकि चले गए हो तुम
कब के
अब जब कि तुम चले गए हो
नहीं टपकती तुम्हारी बातें
पके फल की तरह
नहीं गूँजता मन में
मादक संगीत
झुक गए हैं फूलों के चेहरे
झर गया है पत्तियों से संगीत
नहीं उतरती
अब कोई साँवली साँझ
मन की मुंडेर पर.

डॉ० रंजना जयसवाल द्वारा लिखित

डॉ० रंजना जयसवाल बायोग्राफी !

नाम : डॉ० रंजना जयसवाल
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

ज्योति कुमारी 228 2019-12-11

हैदराबाद, उन्नाव, बक्सर, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में बेटियों को जिंदा जलाने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि पश्चिम चंपारण के शिकारपुर थाना क्षेत्र के एक गांव में ऐसा ही मामला सामने आया है । निश्चित ही यह भारतीय न्याय व्यवस्था, सामाजिकता और लोकतंत्र के लिए अत्यंत शर्मनाक है। किंतु इसके बरअक्स त्वरित न्याय प्रक्रिया में हैदराबाद का पुलिसिया कृत्य भी ऐसी घटनाओं के ख़िलाफ़ कोई आदर्श नहीं माना जा सकता। बल्कि बिना किसी अपराध के साबित होने से पूर्व ही महज़ आरोपित व्यक्ति या व्यक्तियों की भीड़ द्वारा हत्या कर देना या हैदराबाद में पुलिस का ख़ुद मुंसिफ़ बन जाना यक़ीनी तौर पर माननीय भारतीय न्यायालयों और न्याय प्रक्रिया को मुँह चिढ़ाने जैसा है, जो अपराधी और आपराधिक घटना की जाँच, विश्लेषण और अन्वेषण के रास्ते भी एक झटके से बंद कर देता है, फलस्वरूप न्याय व्यवस्था के प्रति सामाजिक भरोसे की जगह सहमा सा संदेह खड़ा होने लगता है । इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को सामाजिक और क़ानूनी रोशनी में देखने का प्रयास है, कथाकार और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता ‘ज्योति कुमारी शर्मा’ का यह आलेख॰॰॰॰॰

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

हुश्न तवस्सुम निहाँ 167 2019-12-06

शैफाली का ओहदा क्या बढ़ा उसके कद में खुद ब खुद इजाफा हो गया। प्रेस की ओर से उसे एक स्कूटर भी मिल गई। वेतन भी बढ़ां संपादक संजय वर्मा की नजरें उस पर कुछ ज्यादा मेहरबान रहने लगीं। उसके खाने पीने और प्रेस के कामों का भी काफी ध्याान रखते। जितनी बार काॅफी चाय खुद के लिए मंगवाते उसे भी भिजवाते। खाली समय में उसके केबिन में जा कर गप्पें लड़ाया करते। और ऐसे ही वह नजदीकियों की पराकाष्ठा पार करने का प्रयत्न करने लगे। इस दरम्यान उसका बादल से मिलना जारी रहा। किन्तु बादल, बादल जेसा ही ठण्डा और बेगाना बंजारा सा बना रहा। एक दिन शैफाली संपादक की कुटिल हरकतों से उक्ता कर बड़े आवेश में बादल के पास गई और.................

बंद कमरे की रोशनी  : कहानी (हनीफ़ मदार)

बंद कमरे की रोशनी : कहानी (हनीफ़ मदार)

हनीफ मदार 519 2019-11-21

फ़िरोज़ खान के संस्कृत पढ़ाने को लेकर उठे विवाद के वक़्त में लगभग डेढ़ दशक पहले लिखी इस कहानी को पढ़ते हुए एक ख़ास बात जो स्पष्ट रूप से सामने आती है कि बीते इन वर्षों में भले ही हम आधुनिकता और तकनीकी दृष्टि से बहुत तरक़्क़ी कर गए हैं किंतु यह बिडंबना ही है कि सामाजिक रूप से हमारी मानसिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं  आ पाया । जहाँ इधर फ़िरोज़ खान का संस्कृत पढ़ाना राजनैतिक हित-लाभ का अस्त्र बनता जा रहा है वहीं डेढ़ दशक पहले लिखी कहानी का पात्र मास्टर अल्लादीन का संस्कृत पढ़ाना भी वोट की राजनीति को इस्तेमाल होता है॰॰॰॰॰॰एक समुदाय विशेष के द्वारा किसी भी भाषा पर अपनी बपौती समझ, समाज में साम्प्रदायिक लड़ाई- झगड़े करवाकर लोगों के अन्दर अनचाहा भय पैदाकर समाज की शान्ति भंग करके अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने वाले वर्ग की नंगी दास्ताँ है "हनीफ़ मदार" की यह कहानी - अनिता चौधरी

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.