‘कान्दू – कटुए’ : लघुकथा कोलाज़ “भाग दो” (शक्ति प्रकाश)

कथा-कहानी लघुकथा

शक्ति प्रकाश 83 2018-11-18

आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक

‘कान्दू – कटुए’ 

शक्ति प्रकाश

दृश्य – 5

वह लड़का क्रिकेट मैच खेल कर आया है, थककर सो गया है, बाहर गली से आवाज़ आती है –

‘ संटी भाई, ओ संटी भाई’

फिर माँ का स्वर सुनाई देता है –

‘ सो रहा है वो, खेल कर आया है, उसे मत जगाओ ’

‘ मम्मी जी भौत जरुरी काम ऐ’

‘ पता है तुम्हारा काम, काम को न वो प्रधानमन्त्री न तू राष्ट्रपति, खेलने के अलावा क्या होगा’

‘ मम्मी जी दो बात करा दो बस’

वह उठ जाता है, बाहर आता है, गली में पीछे के गाँव का लड़का खड़ा है

‘ क्या है घोड़े?’ वह पूछता है

माँ हंस जाती है, वह माँ को बताना चाहता है उस लड़के का नाम शकील है पर उसके अजीब बालिंग रन अप के कारण उसका नाम ‘घोडा’ पड़ गया है. पर घोड़े को सब्र नहीं वह व्याख्या से पहले बोल उठता है –

‘ संटी भाई, मैच फंस गया ऐ’

‘ मैच था तुम्हारा तो पहले बताना था, मैं तैयार रहता’

‘ हमें लग रिया था खुदी हरा लेंग्गे, पर अब तो दो ओवर में तीन आउट हो गये, मुन्ने भाई नै मुझे दौड़ा दिया संटी भाई कूँ ले कै आ’

‘ मेरे लिए भी मुश्किल है, थका हूँ’

‘ संटी भाई इज्जत का सवाल ऐ, मुन्ने भाई नै बड़ी बिसबास से कई ही’ वह रिरियाता है

‘ ठीक है चल, बढ़िया न हो पाए तो रोना मत, थका हुआ हूँ ’

‘ अरे संटी भाई तम मैदान में खड़े रओ बितने से ई जीत जांग्गे’ वह उत्साह और आशा में बोलता है

वह घोडा की साइकिल पर बैठकर मैदान पहुँचता है, स्कोर बारह पर पांच है, सामने के सारे लड़के उसके परिचित हैं, बल्कि दो तीन तो दोस्त और टीम मेट भी, वह घोड़ा की ओर घूरता है –

‘ पहले क्यों नहीं बताया कि किससे मैच है’

‘ तमने पूछी कां ही संटी भाई’ वह मासूम बनता है

‘ फिर भी बताना था’

‘ मुन्ने भाई नै मना कर दी बताइयो मत’ वह हंसता है

‘ तुम भी सालो कम नालायक नहीं हो’

छठवां विकेट भी गिर जाता है

‘ संटी भाई पैड करो जल्दी’ मुन्ने चिल्लाता है

वह मुन्ने से कहना चाहता है कि दोस्तों के खिलाफ नहीं खेल पायेगा, लेकिन उसे मुन्ने की उम्मीदें, मुन्ने का विश्वास और उनकी कमजोर टीम की हालत पहले दिखती है, वह पैडिंग कर मैदान में पहुँचता है, दोस्तों से निगाहें चुरा रहा है, बॉल उसके जिगरी दोस्त के हाथ में है, दोनों तीनों दोस्त उसके पास आते हैं

‘ तो ये तोप ले के आये हैं कटुए, पर तू तो बॉलर है, बल्लेबाज लाना था’ दोस्त हंसते हैं

‘ यार मुझे पता नहीं था कि तुमसे है और तुमने भी कहाँ बताया था’

‘ हमें भी कहाँ पता था हम भी तेरी तरह ही आये हैं’ एक कहता है

‘ खेलने दो यार उसे, अपनी टीम का मैच थोड़े है कोई कहीं से खेले, तू ईमानदारी से खेल संटी ’ जिगरी दोस्त कहता है

‘ हाँ कुछ तो रन बनें, पन्द्रह रन का पीछा करने में भी मजा कहाँ आएगा’ सभी हंसते हैं

वह खेलता है पूरी इमानदारी से, चालीस के आस पास बनाता है, स्कोर सौ के पार, सब खुश हैं

‘ मैंने कई ही संटी भाई कूँ बुलाओ, नहीं मैच तौ गया’ मुन्ने उत्साहित है

‘ खुश मत हो मुन्ने उन पर बल्लेबाज अच्छे हैं’

‘ अरे संटी भाई हो तौ तम बॉलर, आज बल्लेबाजी भी चल गई, सौ तौ बहुत ऐ तमारे लिए’

और वाकई मुन्ने का एस्टीमेट सही रहता है, संटी की बॉलिंग  चलती है, सामने वाली टीम अच्छी होने के बावजूद बीस बाईस पर ढेर, संटी चालीस रन, छे विकेट, मैच अनपढ़, गरीब, खेल में कमजोर मुसलमानों की टीम जीत जाती है. गाँव में जुलूस निकल रहा है. संटी मुन्ने और घोडा के कन्धों पर बैठा हुआ है, ढोल बज रहे हैं

‘ तौ अपने लौंडे जीत गए, बाज़ार वाले हार गये?’ एक बुजुर्ग पूछते हैं

‘ हाँ, बुरी तरह हराया बडबोलों कूँ’ कल्लन कबाड़ी कहता है

‘ जे मुन्ने और घोड़े के कंधे पे जो लौंडा बैठा ऐ बिसने जिताया?’

‘ हाँ’

‘ किसका लौंडा ऐ?’

‘ झां चौराहे के पास में पंडी जी रहें बिनका लौंडा ऐ’

कहता हुआ कल्लन भी जुलूस में नाचने लग जाता है, ये घटना 1988 के आस पास की है शायद.

दृश्य -6   

साभार google से

रात के बारह से ज्यादा का वक्त है, वह छत पर सोने की कोशिश कर रहा है, अचानक नीचे से आवाज़ आती है –

‘ संटी भाई…’

वह खड़ा होकर नीचे की ओर झांकता है, नीचे खुर्शीद भाई, उनका सौतेला भाई और एक बुरका खड़े  हैं

‘ खुर्शीद भाई ? क्या हुआ ?’

‘ अमां नीचे तो आओ’

खुर्शीद भाई का तलाक हो चुका है, भाई भी अठारह उन्नीस का कुंआरा तो ये बुरका कौन? बहन हो सकती है मगर इस तरह? शहर में दंगा हुआ क्या ? वह इसी उधेड़बुन में नीचे उतरता है, उसके पहले ही माँ दरवाज़ा खोल देती है, खुर्शीद भाई बाकी दोनों के साथ अंदर आकर बैठक में बैठ चुके हैं, माँ खुर्शीद को तो जानती है, मगर बाकी दोनों को लेकर शंका है, वह बेटे की ओर प्रश्नवाचक चिन्ह बनाती है बेटा आँखों से इशारा करता है- ‘ बताता हूँ, पहले मैं तो जान लूं’

‘ चाय पिओगे खुर्शीद ?’ माँ पूछती है

‘ हाँ मम्मी जी, पर पहले इन दोनों को अलग अलग सुला दीजिये’

‘ तू छत पर जा साहिल और इन्हें माँ के कमरे में भेज दो’ वह कहता है

दोनों अलग अलग चले जाते हैं, चाय आ जाती है, वह पूछता है –

‘ बहन है?’

‘ कैसी बहन ? बवाल है यार, बताते में शर्म आती है’

‘ अब इतनी रात को आये हो तो बताना तो पड़ेगा, माँ भी जानना चाहेगी’

‘ हाँ आपको हक है जानने का, आपके अलावा किसी का भरोसा कर नहीं सकता था’

‘ ठीक है’

‘ ये औरत इस लौंडे को लेकर भाग गई थी, पुलिस में रिपोर्ट हो गई है’

‘ इस औरत की?’

‘ नहीं साहिल की, अठारह से ऊपर है ना’

‘ शादीशुदा है ये ?’

‘ अम्मा है दो बच्चों की, आठ साल बड़ी है इससे, दिल्ली से पकड़कर लाया हूँ, सुबह कुछ सेटिंग जमाऊंगा थाने में, फिर हाज़िर करूँगा, न लाता तो जिन्दगी खराब हो जाती चूतिये की’

‘ इसका आदमी रख लेगा वापस?’

‘ न रखना होता तो रपट क्यों कराता पर कुछ ले के मरेगा’

‘ पर यहाँ लाने का ख्याल…मान लो माँ मना कर देती तो..?’

‘ शहर में बहुत घर हैं संटी भाई जहाँ पनाह मिल सकती थी, पर अगर मगर का खतरा आपके यहाँ ही नहीं था, विश्वास भी कोई चीज़ होती है’

वह अकेले में माँ को बताता है, माँ गुस्सा होती है –

‘ दोस्ती तक तो ठीक है पर औरतों को भगा के लायेंगे ब्राह्मणों के घर में?’

‘ बच्चा है, सुबह तक की बात है माँ, चला जाएगा, विश्वास पर आया है, परेशानी में है’

‘ विश्वास तो ठीक है पर इस छोरे में डंडे बजे तो कहाँ कहाँ गया, क्या क्या खाया सब बक देगा, फिर पुलिस तुझमें भी डंडे लगा सकती है’

‘ अब दोस्ती की है तो डंडे भी खा सकते हैं, पर चिंता मतकर उसकी नौबत नहीं आएगी’

कहकर वह खुर्शीद भाई  के पास आकर लेट जाता है, सुबह पांच बजे खुर्शीद भाई जगाते हैं –

‘ अच्छा संटी भाई, चलता हूँ, दोनों को समझाकर ही पेश करूँगा, चिंता मत करना भाई, पनाहगार को नुक्सान पहुँचाना कुफ्र है, अगर आप पर आंच आई तो गला काट दूंगा ससुरों का’

कहकर खुर्शीद भाई निकल जाते हैं, ये सम्वाद 1991 में हुआ था शायद.

दृश्य -7 

साभार google से

हालाँकि बस्ती में जाटव और मुसलमान दोनों हैं लेकिन अलग अलग, जहाँ जाटवों के घर खत्म होते हैं, मुसलमानों के शुरू होते हैं, सिवाय इबरू दरजी के, उसका मकान जाटवों के बीच में है, रघुनाथ और बाबूराम जाटव उसके पड़ोसी हैं. इनमे रघुनाथ दरियादिल है, उसके बच्चे पढ़ लिख भी रहे हैं. फिजां गर्म है, मंदिर मस्जिद के झगड़े चल रहे हैं, रात का वक्त है, अचानक उसके घर पर पथराव होता है, कुछ शराबियों की आवाजें –

‘ निकारो जा कटुआ कूँ, निकर तेरी भैन…’

इबरू, उसकी बीवी, चार बेटियां, एक छोटा बेटा घबरा रहे हैं, हालात का अंदाजा तो उन्हें था पर इस तरह..? इतना खराब..? इबरू के मुंह से चीख निकलती है –

‘ ओ रघुनाथ भैया….’

रघुनाथ निकल कर बाहर आ जाता है, बाहर अफरा तफरी है, कुछ शराबी लडके किवाड़ भडभडा रहे हैं, कुछ छत के रास्ते अंदर जाने का प्रयास कर रहे हैं, रघुनाथ लपककर ऊपर चढ़ रहे शराबी की टांग पकडकर खीच लेता है-

‘ उतर नीचे धिय के…’

बवालियों में सन्नाटा छा जाता है, एक बहकी आवाज़ में कहता है –

‘ रघुनाथ चचे तुम जे का..’

‘ तुम भैन के ….तुम का कर रए ?’

‘ मियां मारने ऐ चचा, इनने मन्दिर तोरे मज्जिद बनाई’

‘ जा इबरू नै तोरो तेरो मंदिर? भैन्चो लुक्का, आय गये मूत पी कें, सिग पतो ऐ, छोरी दीख रहीं इबरू की हरामियों, बने बड़े भगत मंदिर बारे, तेरे पुरखा गये कभू अजोध्या जो तू मंदिर बनावैगो’

‘ चचे चुप्प अंदर चले जाओ, जो बीच में आवैगो सो…’

‘ बीच में तौ आय गयो बेटा, चलियो रे अशोक फेंक छत्त पे ते सुलोचन’

रघुनाथ का बेटा अशोक लपककर छत पर चढ़ जाता है, जूते चिपकाने वाले रेजिन सोल्यूशन के डब्बे में आग लगाता है, उसके फेंकने से पहले ही दंगाई भाग जाते हैं. अशोक ऊपर से चिल्लाता है

‘ चाचा, इबरू चचा की बकरी ले गए’

‘ लै जान दै, छोरी तौ बच गईं’

घटना को एक महिना भी नहीं बीता, इबरू मकान बेचकर चला गया, अशोक उदास है, उसका दोस्त कहता है –

‘ क्या बात है अशोक? इबरू की वजह से..’

‘ हाँ, भला आदमी था’

‘ उसकी लड़कियां भी खूबसूरत थीं’

‘ वही वजह रही, लफंगे साले, यहाँ रहती तो देख तो सकते थे, ले लो अब बाबाजी का…’

‘ तुझे भी न देख पाने का गम है ?’ वह हंसता है

‘ हाँ, है तो’

‘ तेरा था कुछ किसी के साथ?’

‘ शुरू ही हुआ था समझो’

‘ कौन सी?’

‘ रेशम, दूसरी वाली, पहले निगाहों वाली बात थी पर उस दिन के बाद तो हीरो बन गया था मैं, बहुत खुल गई थी मुझसे’

‘ हीरो तो है तू’

‘ पर क्या फायदा अब?’

‘ दिक्कत क्या है, कहीं तो गया होगा इबरू, चलते हैं वहीं’

‘ जाने दे, हिन्दू मुसलमान तो हम फिर भी रहेंगे ही’

वह उदास सा दूर नाली में पत्थर फेंक देता है, ये हादसा शायद 1992 का है.

शक्ति प्रकाश द्वारा लिखित

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आश्चर्य जनक किंतु सत्य टाइप फ़िलहाल के चंद अनपढ़ लेखकों में से एक। 

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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