रमणिका फांउडेशन और दलित लेखक संघ की काव्य-गोष्ठी: रिपोर्ट (सुमन कुमारी)

बहुरंग रिपोर्ताज

सुमन कुमारी 151 2018-11-18

प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को रमणिका फांउडेशन और भारतीय दलित लेखक संघ के संयुक्त तत्वाधान में काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में हर बार प्रत्येक विधा के लेखक, श्रोतागण, पत्रकार और बुध्दिजीवी शामिल होते हैं। लेखक अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ करते हैं और रचना पाठ के बाद श्रोतागण रचनाओं पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया सबके समक्ष रखते हैं।

रमणिका फांउडेशन और दलित लेखक संघ की काव्य-गोष्ठी 

सुमन कुमारी

प्रत्येक माह के दूसरे शनिवार को रमणिका फांउडेशन और भारतीय दलित लेखक  संघ के संयुक्त तत्वाधान में काव्य-गोष्ठी का आयोजन किया जाता है। इस आयोजन में हर बार प्रत्येक विधा के लेखक, श्रोतागण, पत्रकार और बुध्दिजीवी शामिल होते हैं। लेखक अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ करते हैं और रचना पाठ के बाद श्रोतागण रचनाओं पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया सबके समक्ष रखते हैं।

इस बार काव्य-गोष्ठी 13.06.2016 को किया गया। काव्य-गोष्ठी में भावना बेदी, मनीषा जैन, नीलिमा चैहान, ज्योति चावला, उमाशंकर चैधरी और इला कुमार सहित छह कवियों ने अपनी-अपनी कविताओं का पाठ किया। सभी कवियों ने प्रत्येक रंग की कविताओं के माध्यम से अपने विचारों को अभिव्यक्त किया। कार्यक्रम की शुरूवात मनीषा जैन की कविताओं से हुई, इनके दो काव्य-संग्रह प्रकाशित है। मनीषा ने ‘किसान के लिए’, ‘सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं करते तुम’, ‘मकड़ी का जाला’, और ‘ये बच्चे’’ कविताओं का पाठ किया।’ इनकी कवितायें समाज के प्रत्येक वर्ग की बात करती है और साथ ही समाज के प्रति चिंता भी प्रकट की है। ‘किसान के लिए’ और ‘ये बच्चे’ कविता में इन्होंने किसान और बच्चे के लिए चिंता व्यक्त की है। ‘मकड़ी का जाला’ कविता में लेखिका ने स्त्री को स्वंय की नियति मानते हुए कहती है कि

‘‘जिससे अगली सुबह तुम

तैयार हो सको

दफतर के लिए

और अगले दिन मैं फिर

मकड़ी की तरह

नये जालों का ताना बाना बुन सकूं’’

जिसमे स्त्री स्वंय को सिर्फ घर की साज-सज्जा बानाये रखने की एक पात्र है जो सुबह से शाम तक अपने पति द्वारा बिखरे गये काम को समटने व सवारने में लगी रहती है। ‘सच्चाई को स्वीकार क्यों नहीं करते तुम’ में अंतविरोधों को रंखाकिंत किया गया है। समाज के प्रत्यक्ष रूप की तरफ ध्यान ले जाने की कोशिश की गई है।

इसके बाद भावना बेदी ने अपनी कविताओं का पाठ किया। ‘तारीखें’, ‘अंधेरा और पहाड़’, ‘पहाड़ बैठा है’ और ‘ठंडा शोर’ शीर्षक की कवितायें पढ़ी। इनकी कवितायें प्रकृति पर केंद्रित है, स्वंय को प्रकृति से जोड़ती हुई विचारों की अभिव्यक्ति की गई है। इनकी कविताओं में युवा कवि के तौर पर साकारात्मक संभावना दिखाई पड़ती है।

नीलिमा चैहान ‘चोखेरबाली’ ब्लाॅग के संचालिका के तौर पर जानी जाती है। पत्र-पत्रिकाओं में स्त्रीवादी तेवर के लेखों में प्रचलित भी है। हाल ही में इनकी एक संपादित किताब ‘बेदाद-ए-इश्क रूदाद-ए-शादी’ प्रकाशित हुई है। नीलिमा चैहान की कविताओं में व्यंग्यात्मकता मिलती है। ‘देवता के विरूद्ध’ और ‘स्माइल अंडर सर्विलेंस’ कवितायें समकालीन स्थिति को चोट करती है। ‘सुरंगों में भागती औरत’ में अपनी जिंदगी से कशमोंकश करती स्त्री का वर्णन है, वहीं ‘खोजने से भी नहीं मिलेंगी देवियां’ कविता में एक निडर स्त्री का वर्णन करते हुए कहा है-

‘‘मुझे तुम्हारी गालियों से डर नहीं लगता

तुम्हारे तमगे पहनकर निकलने से भी

डरना बंद कर दिया मैंने

कुल्टा, कलंकिनी, कुछलिनी या रंडी

को फर्क नहीं पड़ता

तुम्हारी गढ़ी ये गालियां अब

अर्थ नहीं पैदा करती कोई

तुम्हारे चरित्र प्रमाण-पत्र

अब नहीं दरकार मुझे’’

जिसमें स्त्री को सशक्ति और तेवर वाली दिखाया गया है। इनकी सभी कविताओं में लयबद्धता मिलती है।

साहित्य अकादमी से सम्मानित उमाशंकर चैधरी ने ‘शिमला के माल रोड पर वह’ और ‘हमारे समय में रंग’ कविताओं का पाठ किया। इनके दो संग्रह प्रकाशित हो चुके है। इनकी कवितायें अपने आप में संपूर्ण मानी जाती है। वर्तमान राजनीति पर कटाक्ष करती हुई ‘हमारे समय में रंग’ कविता आज की स्थिति पर सार्थक सिद्ध होते हुए कहते है-

‘‘बेटी निकालती थी रंगो के बक्सों से रंग

तो लगता था आसमान इन्द्रधनुषी होता

ज रहा है।

परंतु उसी इन्द्रधनुष से कुछ रंग निकल कर

आ गये है अब सड़क पर बैखौफ’’

इनकी लेखनी समाज का दर्पण के रुप में भी प्रदर्शित होती है। भाषा और शिल्प की दृष्टि से भी कवितायें सौंदर्यपूर्ण है।

ज्योति चावला की कवितायें कुछ अलग ही स्वाद देती है, जिसमें बेटी के द्वारा मां के सौंदर्य की व्याख्या के साथ-साथ समकालीन राजनीति परिस्थितियों को दर्शाया गया है। ‘बहरूपिया आ रहा है’, ‘उदासी’, और ‘मां और आशा पारेख’ कवितायें पढ़ी गई, जिसमें शिल्प और कथ्य की संपूर्णता है।  ‘मां और आशा पारेख’ कविता में मां को एक बेटी की नजरों से नहीं बल्कि एक स्त्री की नजरों से उसकी इच्छाओं को परिभाषित किया गया है।

दार्शनिक कविताओं के लिए जानी जाती इला कुमार ने ‘अश्रांत आविर्भाव’, ‘किन्हीं रात्रियों में’, ‘फूल,चांद,रात’ और ‘शब्द’ कविताओं का पाठ किया। इनकी कविताओं में शास्त्रों की झलक पूरी तरह समाहित है। प्रत्येक विचारधारा को दार्शनिकता से जोड़ते हुए अभिव्यक्त करती है।

छह कवियों के कविता-पाठ के बाद श्रोतागण ने इन सभी की कविताओं पर अपनी-अपनी प्रतिक्रिया दी। भीमसेन आंनद ने कहा कि कविताओं को छोटी होनी चाहिए, बड़ी कविता रोचकता खो देती है। वहीं रमेश प्रजापति ने कहा कविताओं में भाषा और शिल्प महत्वपूर्ण होती है, सभी की कवितायें अपने आप में संपूर्ण है। डाॅ. विवेकानंद ने बताया कि सारी कविताओं की अच्छी समझ समय साथ आती है,कविताओ में लय की जरूरत होती है। इन्हें इला कुमार की कवितायें पसंद आई।

सुनील ने कहा की मनीषा जैन की कवितायें उपदेशपरक है। भावना की कविता छोटी और अच्छी है, बद्धता की दरकार है। नीलिमा चैहान ने स्त्री विमर्श को पुरुष भाषा में लिखा है। उमाशंकर की कवितायें आकर्षण बनाये रखती है। ज्योती चावला की कवितायें वर्तमान राजनिती पर प्रतिरोध व्यक्त करती है। और इला कुमार की कवितायें पूरी तरह दार्शनिकता की बातें करती है।

 ज्योतिकृष्ण वर्मा ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आलोचक को टिप्पणी करते समय शब्दों पर खास ध्यान रखना चाहिए। यशपाल ने बताया की सभी की कवितायें सार्थक और सजग है, समकालीन स्थिति पर सार्थक है। मुक्ति तिर्की को ज्योती चावला की कविता पसंद आई, जिसमें एक मां के सौंदर्य का वर्णन किया गया है।

            रमणिका फांउडेशन की अध्यक्ष रमणिका गुप्ता ने सभी की कविताओं को साकारात्मक मानते हुए, वर्तमान समय की मुखर रचनाओं का दर्जा दिया। साथ ही ज्योति चावला की कविता ‘मां और आशा पारेख’ को भिन्न बताया, जिसमे स्त्री संबंधों से परे एक स्त्री दुसरी स्त्री की इच्छाओं की बात करती है।

भारतीय दलित लेखक संघ के अघ्यक्ष अजय नावरिया नें सभी कवियों को शुभकामनायें दी। कार्यक्रम के अंत रमणिका फांउडेशन और भारतीय दलित लेखक संघ के संयुक्त आयोजन में दो प्रस्तावनाओं को पारित किया गया। प्रथम, जेएनयू में हुए ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ के नारों का रमणिका फाॅउंडेशन और भारतीय दलित लेखक संघ के द्वारा खंडन किया गया । द्वितीय, निदा फाजली, रवीन्द्र कालिया, सुधीर तैलंग और प्रकाश कवि जो दिवंगत हुए, उन्हें मौन धारण कर श्रद्धाजंली दी गई।

इस प्रकार रमणिका गुप्ता ने सभी का धन्यवाद करते हुए कार्यक्रम का समापन किया।

सुमन कुमारी द्वारा लिखित

सुमन कुमारी बायोग्राफी !

नाम : सुमन कुमारी
निक नाम :
ईमेल आईडी :
फॉलो करे :
ऑथर के बारे में :

अपनी टिप्पणी पोस्ट करें -

एडमिन द्वारा पुस्टि करने बाद ही कमेंट को पब्लिश किया जायेगा !

पोस्ट की गई टिप्पणी -

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 357 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

नोट-

हमरंग पूर्णतः अव्यावसायिक एवं अवैतनिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक साझा प्रयास है | हमरंग पर प्रकाशित किसी भी रचना, लेख-आलेख में प्रयुक्त भाव व् विचार लेखक के खुद के विचार हैं, उन भाव या विचारों से हमरंग या हमरंग टीम का सहमत होना अनिवार्य नहीं है । हमरंग जन-सहयोग से संचालित साझा प्रयास है, अतः आप रचनात्मक सहयोग, और आर्थिक सहयोग कर हमरंग को प्राणवायु दे सकते हैं | आर्थिक सहयोग करें -
Humrang
A/c- 158505000774
IFSC: - ICIC0001585

सम्पर्क सूत्र

हमरंग डॉट कॉम - ISSN-NO. - 2455-2011
संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
हाइब्रिड पब्लिक स्कूल, तैयबपुर रोड,
निकट - ढहरुआ रेलवे क्रासिंग यमुनापार,
मथुरा, उत्तर प्रदेश , इंडिया 281001
info@humrang.com
07417177177 , 07417661666
http://www.humrang.com/
Follow on
Copyright © 2014 - 2018 All rights reserved.