और’मुंशी’ प्रेमचंद’ बन गए: किस्सा, (सूरज प्रकाश)

बहुरंग किस्से ‘सूरज प्रकाश’ के

सूरज प्रकाश 30 2018-11-18

31 जुलाई को कथा सम्राट प्रेमचंद की 137 वीं जयंती पर विशेष –

औरमुंशी‘ प्रेमचंद‘ बन गए  

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सूरज प्रकाश

दुखियारों को हमदर्दी के आंसू भी कम प्यारे नहीं होते – प्रेमचंद 

प्रेमचन्द (धनपतराय) (नायाब राय) (1880 – 1936) से पहले हिंदी में काल्पनिक, एय्यारी और पौराणिक धार्मिक रचनाएं ही की जाती थी। प्रेमचंद ने हिंदी में यथार्थवाद की शुरूआत की।
वे बेहद गरीबी में पले। पहनने के लिए कपड़े नहीं, भरपेट खाना नहीं, ऊपर से सौतेली माँ का क्रूर व्यवहार। प्रेमचंद खेतों से शाक-सब्ज़ी और पेड़ों से फल चुराने में दक्ष थे। उन्हें मिठाई का बड़ा शौक़ था और विशेष रूप से गुड़ से उन्हें बहुत प्रेम था। एक बार पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट और गणित की किताब बेचनी पड़ीं। बुकसेलर की दुकान पर ही एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने प्रेमचंद को अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया।
तेरह वर्ष की उम्र में से ही प्रेमचन्द ने लिखना आरंभ कर दिया था। शुरू में कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में उपन्यास लिखना आरंभ किया। प्रेमचंद का विवाह 15 बरस की उम्र में अपने से बड़ी और बदसूरत लड़की से करा दिया गया। बाद में शिवरानी नाम की बाल विधवा से विवाह किया। प्रेमचंद संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता तथा सुधी संपादक थे। वे स्वभाव से सरल और आदर्शवादी व्यक्ति थे।
जीवन के प्रति उनकी अगाढ़ आस्था थी लेकिन जीवन की विषमताओं के कारण वह कभी भी ईश्वर के बारे में आस्थावादी नहीं बन सके। धीरे-धीरे वे अनीश्वरवादी बन गए थे।
प्रेम चंद एमए करके वकील बनना चाहते थे लेकिन मजबूरी में पाँच रुपये महीना की पहली नौकरी वकील के बच्‍चों को पढ़ाने की करनी पड़ी थी। दो रुपये अपने लिये रखते और तीन रुपये सौतेली मां को भेजते। अक्‍सर उधार लेने की जरूरत पड़ जाती।
1921 में उन्होंने महात्मा गांधी के आह्वान पर अपनी नौकरी छोड़ दी। प्रेम चंद ने मुंबई में मोहन दयाराम भवनानी की अजंता सिनेटोन कंपनी में कहानी-लेखक की नौकरी भी की और 1934 में प्रदर्शित मजदूर नामक फिल्म की कथा लिखी।
कुल करीब तीन सौ तेरह कहानियां, लगभग एक दर्जन उपन्यास और कई लेख लिखे। उन्होंने कुछ नाटक भी लिखे और बहुत अनुवाद कार्य किया। उनकी अधिकांश रचनाएं मूल रूप से उर्दू में लिखी गई हैं लेकिन उनका प्रकाशन हिंदी में पहले हुआ। उनका अंतिम उपन्यास मंगल सूत्र उनके पुत्र अमृत ने पूरा किया।
प्रेमचंद सब के हैं। किसी भी तरह की राजनैतिक राय रखने वाले प्रेमचंद का विरोध नहीं कर पाते। उनका लेखन हिन्दी साहित्य की एक ऐसी विरासत है जिसके बिना हिन्दी के विकास का अध्ययन अधूरा होगा।
सत्यजित राय ने उनकी दो कहानियों पर यादगार फ़िल्में शतरंज के खिलाड़ी और सद्गति बनायीं।
लेखन के अलावा प्रेमचंद को अपने जीवन का अधिकांश समय और ध्‍यान गरीबी से लड़ने, पेचिश से जूझने, हैडमास्‍टरियां बदलने और अपनी प्रेस लगाने में खपाना पड़ा।
प्रेमचंद के मुंशी बनने की कहानी भी बहुत रोचक है। ‘हंस’ नामक पत्र प्रेमचंद एवं ‘कन्हैयालाल मुंशी’ के सह संपादन मे निकलता था। जिसकी कुछ प्रतियों पर कन्हैयालाल मुंशी का पूरा नाम न छपकर मात्र ‘मुंशी’ छपा रहता था। साथ ही प्रेमचंद का नाम इस प्रकार छपा होता था – संपादक मुंशी, प्रेमचंद। कालांतर में पाठकों ने ‘मुंशी’ तथा ‘प्रेमचंद’ को एक समझ लिया और ‘प्रेमचंद’- ‘मुंशी प्रेमचंद’ बन गए।
हम अक्‍सर पहली मुलाकात में किसी भी नये लेखक से, शोध विद्यार्थी से या अपने आपको साहित्‍य प्रेमी बताने वाले से जब यह पूछते हैं कि आज कल क्‍या पढ़ रहे हैं तो वह अगर कुछ नहीं पढ़ रहा होता है तो बिना एक पल भी गंवाये प्रेमचंद की गोदान या किसी न किसी किताब का नाम ले लेता है। और कुछ न पढ़ रखा हो, प्रेमचंद तो पढ़ ही रखा होता है।
मुंबई के मुजिब खान दुनिया के अकेले ऐसे नाटककार हैं जिन्‍होंने प्रेमचंद की 285 कहानियों का मंचन किया है।

सूरज प्रकाश द्वारा लिखित

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सूरज प्रकाश का जन्म उत्‍तराखंड (तब के उत्तर प्रदेश) के देहरादून में हुआ था। सूरज प्रकाश ने मेरठ विश्‍व विद्यालय से बी॰ए॰ की डिग्री प्राप्त की और बाद में उस्‍मानिया विश्‍वविद्यालय से एम ए किया। तुकबंदी बेशक तेरह बरस की उम्र से ही शुरू कर दी थी लेकिन पहली कहानी लिखने के लिए उन्‍हें पैंतीस बरस की उम्र तक इंतजार करना पड़ा। उन्होंने शुरू में कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं और फिर 1981 में भारतीय रिज़र्व बैंक की सेवा में बंबई आ गए और वहीं से 2012 में महाप्रबंधक के पद से रिटायर हुए। सूरज प्रकाश कहानीकार, उपन्यासकार और सजग अनुवादक के रूप में जाने जाते हैं। 1989 में वे नौकरी में सज़ा के रूप में अहमदाबाद भेजे गये थे लेकिन उन्‍होंने इस सज़ा को भी अपने पक्ष में मोड़ लिया। तब उन्‍होंने लिखना शुरू ही किया था और उनकी कुल जमा तीन ही कहानियाँ प्रकाशित हुई थीं। अहमदाबाद में बिताए 75 महीनों में उन्‍होंने अपने व्‍यक्‍तित्‍व और लेखन को संवारा और कहानी लेखन में अपनी जगह बनानी शुरू की। खूब पढ़ा और खूब यात्राएं कीं। एक चुनौती के रूप में गुजराती सीखी और पंजाबी भाषी होते हुए भी गुजराती से कई किताबों के अनुवाद किए। इनमें व्‍यंग्य लेखक विनोद भट्ट की कुछ पुस्‍तकों, हसमुख बराड़ी के नाटक ’राई नो दर्पण’ राय और दिनकर जोशी के बेहद प्रसिद्ध उपन्‍यास ’प्रकाशनो पडछायो’ के अनुवाद शामिल हैं। वहीं रहते हुए जॉर्ज आर्वेल के उपन्‍यास ’एनिमल फॉर्म’ का अनुवाद किया। गुजरात हिंदी साहित्‍य अकादमी का पहला सम्‍मान 1993 में सूरज प्रकाश को मिला था। वे इन दिनों मुंबई में रहते हैं। सूरज प्रकाश जी हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी, गुजराती, मराठी भाषाएं जानते हैं। उनके परिवार में उनकी पत्‍नी मधु अरोड़ा और दो बेटे अभिजित और अभिज्ञान हैं। मधु जी समर्थ लेखिका हैं।


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हनीफ मदार 173 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

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भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

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- पंकज तिवारी का आलेख 

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