मानवीय करुणा का उच्च शिखर है परसाई का व्यंग्य: आलेख (सुरेश क़ांत)

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सुरेश कान्त 70 2018-11-18

जीवन की व्याख्या के लिए एक विचारधारा की अनिवार्यता बताते हुए परसाई लिखते हैं, “एक ही बात की व्याख्या भिन्न–भिन्न लोगों के लिए भिन्न–भिन्न होती है. इसलिए एक विचारधारा जरूरी है, जिससे जीवन का ठीक विश्लेषण हो सके और ठीक निष्कर्षों पर पहुंचा जा सके. इसके बिना लेखक गलत निष्कर्षों का शिकार हो जाता है. मेरा विश्वास मार्क्सवाद में है. यहीं से प्रतिबद्ध लेखन का विवादास्पद प्रश्न खड़ा हो जाता है. प्रतिबद्ध लेखन को जो पार्टी–लेखन मानते हैं, वे अनजाने या जान–बूझकर भूल करते हैं. प्रतिबद्धता एक गहरी चीज है, जो इस बात से तय होती है कि समाज में जो द्वंद्व है, उसमें लेखक किस तरफ खड़ा है—पीड़ितों के साथ या पीड़कों के साथ. कोई यह स्वीकार नहीं करेगा कि वह पीड़कों के साथ है. पर यदि वह अपने को किनारे की या बीच की स्थिति में रख लेता है, तो निश्चित रूप से पीड़कों का साथ देता है. अपने पक्ष के निर्वाचन से कोई बचाव नहीं, सिवा छल के. …जो जीवन से तटस्थ है, वह व्यंग्य–लेखक नहीं, जोकर है.”

मानवीय करुणा का उच्च शिखर है परसाई का व्यंग्य 

सुरेश क़ांत

अगस्त महीना व्यंग्य-प्रेमियों के लिए विशेष महत्त्व रखता है. इसी महीने व्यंग्यकार-शिरोमणि हरिशंकर परसाई पैदा भी हुए थे और इसी महीने दिवंगत भी हो गए थे. इसलिए इससे अच्छा कोई अवसर नहीं हो सकता उन्हें याद करने का. तो चलिए, उन्हें याद करें.

यह तो कहने की आवश्यकता ही नहीं कि हरिशंकर परसाई आधुनिक हिंदी-व्यंग्य-साहित्याकाश के एक उज्ज्वल नक्षत्र हैं. स्वातंत्र्योत्तर युग में शिल्प और कथ्य की दृष्टि से हिंदी-व्यंग्य को एक सशक्त और सुगठित स्वरूप प्रदान करने में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान है. लेकिन यह समझना आवश्यक है कि अपनी ऊर्ध्व सामाजिक चेतना का श्रेय वे अपने विसंगत यथार्थ, आर्थिक अभाव, परिवेशगत चारित्रिक वैषम्य और व्यापक जिम्मेदारियों को देते हैं.

22 अगस्त 1924 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के जमानी कस्बे में जन्मे परसाई एक श्रमजीवी व्यक्ति की संतान थे. अभी वे तेरह-चौदह वर्ष के ही थे कि उनकी माँ प्लेग की बीमारी से चल बसीं. पाँच बच्चों के पालन-पोषण के भार से दबे पिता भीतर से टूट गए और परसाई उन्हें टूटता देखते रहे. अपनी ‘तिरछी रेखाएँ’ पुस्तक की ‘गर्दिश के दिन’ नामक भूमिका में पृष्ठ 14-15 पर वे लिखते हैं, “प्लेग की वे रातें मेरे मन में गहरे उतरी हैं. जिस आतंक, अनिश्चय, निराशा और भय के बीच हम जी रहे थे, उसके सही अंकन के लिए बहुत पन्ने चाहिए. यह भी कि पिता के सिवा हम कोई नहीं टूटे थे. …धंधा ठप, जमा-पूँजी खाने लगे. मेरे मैट्रिक पास होने की राह देखी जाने लगी. …बीमारी की हालत में ही पिता ने एक बहन की शादी कर दी—बहुत मनहूस उत्सव था वह. मैं बराबर समझ रहा था कि मेरा बोझ कम किया जा रहा है. पर अभी दो छोटी बहनें और एक भाई और थे.”

मैट्रिक पास करने के बाद परसाई ने जंगल-विभाग में नौकरी की. फिर उसे छोड़ अध्यापकी की और फिर उसे भी छोड़ दिया. आजादी का अपहरण करने वाली चाहे सरकार हो या कोई संस्था, परसाई के आजाद मनुष्य ने उसे अपने ऊपर अधिकार नहीं जमाने दिया, इसलिए वे नौकरी के दायरे में आ-आकर छूट जाते रहे. समाज के भीतर पाई जाने वाली दुरंगी चालें उनसे सही नहीं गईं. वे लगातार उन चालों की तहों को देखते गए और उनकी समझ में आया कि बदमाशी और धूर्तता के बीज बोने वाला एक खास तरह का वर्ग होता है. अनुभव ने ही उन्हें इस वर्ग को समझने में सहायता पहुँचाई.

परसाई के जीवन का धरातल यथार्थ से सीधे जुड़ा रहा है. जीवन की किसी भी विडंबना से उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया. वे किसी कारण अथवा घटना से कभी विचलित नहीं हुए. वे पूरे साहस के साथ परिस्थितियों से साक्षात्कार करते रहे. उन्हें जीवन में बड़ी त्रासदी और गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा. अभावों से भरी आर्थिक स्थिति और नैतिक दायित्व के बीच के अंतराल ने परसाई की संवेदनशीलता को इस हद तक झंकृत किया कि हठात सम्मोहन की स्थिति भंग हो गई और उन्होंने व्यापक राजनीतिक दृष्टि प्राप्त कर ली. वे लिखते हैं, “बहुत लोग अपने लिए ‘बेचारा’ सुनकर संतोष का अनुभव करते हैं. मुझे भी पहले ऐसा लगा पर मैंने देखा, इतने ज्यादा बेचारों में मैं क्या बेचारा. इतने विकृत संघर्षों में मेरा क्या संघर्ष.” (वही, पृष्ठ 18-19)

दुःख जहाँ सामान्य जनों को तोड़ देता है, वहीं विशेष चेतना-संपन्न लोगों को परिमार्जित करता है. परसाई के दु:खों ने व्यापक धरातल पर संवेदना एवं सह-अनुभूति का प्रसार किया. सामाजिक दृष्टि निर्मित हुई और रुदन-धर्मी संकीर्ण आत्म से बाहर निकल उन्होंने व्यापक सामजिक भाव-बोध से अपने को जोड़ा. व्यक्तित्व-विकास हेतु सामाजिक संलग्नता की अनिवार्यता अनुभव करते हुए उन्होंने स्वानुभूति का विस्तार किया, “दुःखी और भी हैं. अन्याय-पीड़ित और भी हैं. अनगिनत शोषित हैं. मैं उनमें से एक एक हूँ. पर मेरे हाथ में कलम है और मैं चेतना-संपन्न हूँ.” (वही, पृष्ठ 19). वैसे भी वे अपने दु:खों को बहुत महत्त्व देने, उन्हें महिमा-मंडित करने और “बड़े लेखक होने के लिए जो ‘मार्कशीट’ तैयार होती है, उसमें दुःख के विषय में अधिक नंबर जुड़वाने” के पक्षधर नहीं रहे, “किसी को बड़ा लेखक इसलिए नहीं माना जा सकता कि उसने बहुत दुःख भोगे हैं. सिर्फ हाय-हाय की कूची से कला में रंग नहीं भरे जाते.” (हम इक उम्र से वाकिफ हैं’ पुस्तक की ‘क्या कहूँ आज जो…’ शीर्षक भूमिका, पृष्ठ 37).

यही कारण है कि परसाई की चेतना निरंतर सजग और सचेत रहते हुए वस्तु-यथार्थ का विश्लेषण करती रही. वैयक्तिक संघर्ष, पीड़ा और अभावों को झेलते हुए भी उनकी व्यंग्य-चेतना विकृत आक्रोश की शिकार नहीं हुई, अपितु सामाजिक सह-अस्तित्व की उदारता प्राप्त करती गई. सामाजिक न्याय के लिए ‘समझो और लड़ो’ का शंखनाद फूँकते हुए परसाई धर्म और नीति के साथ-साथ राजनीति और अर्थव्यवस्था की विसंगतियों की भी तह में जाते हैं और स्वाधीन देश के आजाद-मिजाज लोगों का षड्यंत्र खोलते हैं, “यह अजीब बात है, बल्कि षड्यंत्र है कि जब शोषित लोग लड़ने लगते हैं, तब ही यह शोर हो जाता है कि हिंसा हो रही है. शोषक वर्ग की हिंसा सिर्फ ‘लॉ एंड आर्डर प्रॉब्लम’ कहलाती है. शासन की हिंसा संवैधानिक बन जाती है.” (‘आँखिन देखी’, सं. कमला प्रसाद, साक्षात्कार, पृष्ठ 36).

इतिहास साक्षी है कि जब भी प्रशासक-गण पथभ्रष्ट हुए हैं, अवाम ने जाग्रत होकर उन्हें राह दिखाई है, उन्हें चुनौतियाँ दी हैं और बदलने को मजबूर किया है. परसाई इस यथार्थ से, जनता की इस शक्ति से परिचित थे. अत: वे अपने व्यक्तित्व का विस्तार करते हुए जनसामान्य के संघर्ष के साथ हो लेते हैं, “असंख्य लोग हैं—मजदूर हैं, किसान हैं, गरीब लोग हैं, जो परिवर्तन के लिए लड़ रहे हैं. यही सफल होंगे, मैं इनके साथ कलम लेकर पैदल चलने वाला हूँ.” (वही, पृष्ठ 37)

अपने इस वक्तव्य में परसाई कलम को हथियार के रूप में स्वीकार करते हैं. दुनिया से लड़ने के लिए ही वे व्यंग्य-लेखन को अपनाते हैं.

अभिव्यक्ति की विशेष प्रतिभा ने उनके व्यक्तित्व को एक असाधारण लेखक का रूप दिया. उन्होंने सायास अपने लेखक को एक प्रतिबद्ध लेखक के रूप में प्रतिष्ठित किया. समाज के संघर्ष ने उन्हें अनुभव दिया और अनुभव के विश्लेषण ने उन्हें दृष्टि दी.

परसाई का रचनाधर्मी व्यक्तित्व ‘वसुधा’ के प्रकाशन से सामने आया. ‘वसुधा’ ने परसाई की पहचान न केवल अच्छे संपादक के रूप में कराई, वरन् उन्हें अच्छे रचनाकार के रूप में भी स्थापित किया. रचनाकार के रूप में उनके दो गहरे साथी थे—कबीर और मुक्तिबोध. कबीर की अक्खड़ता को उन्होंने उसी तरह आत्मसात किया, जैसे निराला ने तुलसीदास को किया था. कबीर उनके व्यक्तित्व में लीन-जैसे थे. तनाव के क्षणों में उन्हें कबीर की पंक्तियों—‘हम न मरिहै, मरिहै संसारा’, ‘जो घर जारै आपना, सो चलै हमारे साथ’, ‘सब कहते कागद की लेखी, मैं कहता आँखिन की देखी’ आदि दुहराते देखा जा सकता था. परसाई ने ‘सुनो भाई साधो’, ‘कबिरा खड़ा बाजार में’, ‘माटी कहे कुम्हार से’ जैसे कॉलमों में कबीर की विरासत को ही तो आगे बढ़ाया था.

परसाई की वर्ग-शत्रुता की पहचान बेहद बारीक थी. वे हमेशा सजग रहते थे. मुक्तिबोध की तरह वे निरंतर अपने चारों ओर दुश्मन का जाल देखते. हर समय दुश्मन उनकी आँखों के सामने नाचता रहता. किंतु विशेषता यह कि मुक्तिबोध और परसाई दोनों ने ही असुरक्षा की इस ग्रंथि को निजता से उबारकर उसका रचनात्मक रूपांतरण किया. दोनों लेखकों का वर्ग-चरित्र और जिंदगी के संघर्ष के आयाम लगभग मिलते-जुलते रहे, इसलिए दोनों पक्के दोस्त रहे.

पंडित भवानी प्रसाद तिवारी के संपर्क में आकर परसाई समाजवाद के पक्षधर बने, पर भारतीय समाजवादियों की रीति-नीति से उनका विरोध 1952 के प्रथम आम चुनाव के बाद ही शुरू हो गया और तब उनका संपर्क सृष्टिधर मुकर्जी और पी.के. ठाकुर जैसे स्थानीय साम्यवादी नेताओं से हुआ, जिन्होंने उन्हें कम्युनिस्ट विचारधारा के मध्य में लाकर रख दिया. जीवन की व्याख्या के लिए एक विचारधारा की अनिवार्यता बताते हुए परसाई लिखते हैं, “एक ही बात की व्याख्या भिन्न-भिन्न लोगों के लिए भिन्न-भिन्न होती है. इसलिए एक विचारधारा जरूरी है, जिससे जीवन का ठीक विश्लेषण हो सके और ठीक निष्कर्षों पर पहुंचा जा सके. इसके बिना लेखक गलत निष्कर्षों का शिकार हो जाता है. मेरा विश्वास मार्क्सवाद में है. यहीं से प्रतिबद्ध लेखन का विवादास्पद प्रश्न खड़ा हो जाता है. प्रतिबद्ध लेखन को जो पार्टी-लेखन मानते हैं, वे अनजाने या जान-बूझकर भूल करते हैं. प्रतिबद्धता एक गहरी चीज है, जो इस बात से तय होती है कि समाज में जो द्वंद्व है, उसमें लेखक किस तरफ खड़ा है—पीड़ितों के साथ या पीड़कों के साथ. कोई यह स्वीकार नहीं करेगा कि वह पीड़कों के साथ है. पर यदि वह अपने को किनारे की या बीच की स्थिति में रख लेता है, तो निश्चित रूप से पीड़कों का साथ देता है. अपने पक्ष के निर्वाचन से कोई बचाव नहीं, सिवा छल के. …जो जीवन से तटस्थ है, वह व्यंग्य-लेखक नहीं, जोकर है.” (‘आँखिन देखी’, सं. कमला प्रसाद, आत्मकथ्य, पृष्ठ 31 और वही, ‘एक अंतरंग बातचीत, पृष्ठ 44).

यही कारण है कि आज की तरह उनके समय में भी एक ओर जहाँ सार्थक और सोद्देश्य व्यंग्य-रचनाएँ सामने आईं, वहीं व्यंग्य के नाम पर घटिया, फूहड़, विचारहीन लेखन भी खूब हुआ. इसका विश्लेषण करते हुए और हास्य-विनोद तथा सामाजिक चेतना से युक्त व्यंग्य का फर्क बताते हुए परसाई कहते हैं, “यह सही है कि बहुत-कुछ जो व्यंग्य और विनोद के नाम पर लिखा जा रहा है, तीव्र सामाजिक चेतना से हीन है. …हास्य-विनोद अच्छी चीजें हैं. हँसना स्वास्थ्य का लक्षण है, पर हर बात पर हँसना गैर-जिम्मेदारी और मूर्खता है. जीवन में हर बात पर हंसी नहीं आती. किसी बात पर करुणा पैदा होती है, किसी से घृणा होती है, किसी से क्रोध होता है. इसलिए केवल विनोद और हास्य का लहजा गैर-जिम्मेदारी का काम है. कोई लेखक पीटनेवाले पर भी हँसे कि कैसे मजे में पीट रहा है और पिटनेवाले पर भी हँसे कि कैसे मजे से पिट रहा है, तो ऐसे लेखक को आप क्या कहेंगे? …यह समझ चाहिए कि क्या हँसने लायक है, क्या रोने लायक है अर्थात सहानुभूति तय होनी चाहिए, इसके लिए लेखक को ठिठोली और छिछोरापन छोड़ करके सामाजिक जीवन में अपने को शामिल करना होता है, उसकी संबद्धता चाहिए, यहीं से मात्र हास्य-विनोद और सामाजिक चेतना-संपन्न व्यंग्य अलग हो जाता है.” (वही, साक्षात्कार, पृष्ठ 34).

पारिवारिक जीवन से लेकर सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन की विसंगतियाँ परसाई की चेतना को झंकृत करती हैं, उसमें खलबलाहट पैदा करती हैं. भीतर की इस खलबलाहट, इस बवंडर को वे व्यापक धरातल पर अभिव्यक्ति देते हैं और यह अभिव्यक्ति व्यंग्य का स्वरूप धारण कर लेती है, “सही व्यंग्य व्यापक जीवन-परिवेश को समझने से आता है. व्यापक सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक परिवेश की विसंगति, मिथ्याचार, असामंजस्य, अन्याय आदि की तह में जाना, कारणों का विश्लेषण करना, उन्हें सही परिप्रेक्ष्य में देखना—इससे सही व्यंग्य बनता है. जरूरी नहीं कि व्यंग्य में हँसी आए. यदि व्यंग्य चेतना को झकझोर देता है, व्यवस्था की सड़ाँध को इंगित करता है और परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है, तो वह सफल व्यंग्य है. जितना व्यापक परिवेश होगा, जितनी गहरी विसंगति होगी और जितनी तिलमिला देने वाली अभिव्यक्ति होगी, व्यंग्य उतना ही सार्थक होगा.” (मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य-रचनाएँ, लेखक की बात, पृष्ठ 10-11)

एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में व्यंग्य का महत्त्व बताते हुए परसाई लिखते हैं, “आज सारी दुनिया में व्यंग्य साहित्य का मूल स्वर है. बुर्जुआ समाज में बेहद विसंगतियाँ हैं—परिवार से लेकर राष्ट्र के मंत्रिमंडल तक. भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण, मिथ्याचार, पाखंड है. व्यंग्य इन सबके अन्वेषण और उद्घाटन का माध्यम है.” (वही, पृष्ठ 13)

परसाई कथ्य की आत्मा को महत्त्व देते हुए विराट अनुभूति की सहज अभिव्यक्ति पर बल देते हैं. इसलिए वे व्यंग्य को विधा के रूप में नहीं, अपितु विधाओं की आत्मा के रूप में देखते हैं, “व्यंग्य कोई विधा नहीं है. इसका अपना कोई ‘स्ट्रक्चर’ नहीं है. यह एक ‘स्पिरिट’ है, जो हर विधा में आ सकती है.” (‘आँखिन देखी’, सं. कमला प्रसाद, साक्षात्कार, पृष्ठ 34).

परसाई की यह धारणा गलत नहीं है. व्यंग्य में यह शक्ति है कि वह एक ‘स्पिरिट’ के रूप में सभी विधाओं में आ सकता है. किंतु इसके साथ-साथ व्यंग्य विधा भी है, जैसा कि मैं कई बार, कई जगहों पर लिख चुका हूँ. यहाँ सिर्फ इतना ही कहूँगा कि हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि परसाई यह बात अपने समय में, अपने सामने मौजूद व्यंग्य-रचनाओं के परिप्रेक्ष्य में कह रहे हैं, जब ऐसी और इतनी व्यंग्य-रचनाएँ विद्यमान नहीं थीं, जिनके आधार पर व्यंग्य को विधा कहा जा सकता. लेकिन बाद में स्वयं परसाई और उनके समकालीन तथा अनुवर्ती व्यंग्यकारों ने ऐसी और इतनी व्यंग्य-रचनाएँ दे दीं, जिनके आधार पर व्यंग्य को विधा मानना संभव ही नहीं, अनिवार्य हो गया.

वैसे प्रकारांतर से परसाई स्वयं भी इसे स्वीकार कर लेते हैं, जब अपनी ‘बेईमानी की परत’ नामक पुस्तक की ‘ये निबंध’ नामक भूमिका में वे कहते हैं, “कहानी के साथ ही मैं शुरू से निबंध भी लिखता रहा हूँ और यह विधा अपनी प्रकृतिगत स्वच्छंदता और व्यापकता के कारण मुझे बहुत अनुकूल भी प्रतीत हुई…निबंध लिखते हुए मुझे सार्थकता और संतोष का अनुभव हुआ है. मुख्य रूप से मैंने कहानियाँ लिखी हैं—गो इसमें भी मतभेद है कि वे शास्त्रीय मान से कहानियाँ भी हैं या नहीं. बहुत बारीक समझ के लोगों ने कहा भी है कि वे ‘चीजें’ मन पर असर तो डालती हैं, याद भी रहती हैं, गूँजती भी हैं…मगर उनके कहानी होने में शक होता है. होता होगा. अपने पैर में जो जूता फिट न बैठे, उसे कोई जूता ही नहीं मानता. वे भूल जाते हैं कि कुछ जूते सिर के नाप के भी बनाए जाते हैं.”

स्पष्ट हो जाता है कि व्यंग्य की ‘स्पिरिट’ से लिखा गया निबंध शास्त्रीय पैमाने पर निबंध नहीं रहता, न कहानी ही कहानी रह जाती है, उनमें मौलिक संरचनात्मक परिवर्तन हो जाता है. जो जूता, जूता होते हुए भी पैर में फिट न बैठे, सिर पे बैठे (पड़े), उसे जूता नहीं कहा जा सकता. वह व्यंग्य हो जाता है.

परसाई के व्यंग्य संबंधी ये विचार उनके संपूर्ण व्यंग्य-साहित्य में शिद्दत से प्रतिफलित हुए हैं. उन्हें पढ़ते हुए कदम-कदम पर यह एहसास होता है कि व्यंग्य जीवन की व्यापक समझ से उपजा वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण है, जो हंसवत् सत-असत का निर्णय करते हुए असत को बदलने और सत को अपनाने की प्रेरणा देता है. उनका व्यंग्य मानवीय करुणा और शुभचिंता का उच्च शिखर है.

10 अगस्त 1995 को परसाई हमारे बीच नहीं रहे. किंतु उनका अद्वितीय व्यंग्य-लेखन उन्हें सदैव अमर रखेगा और दुःखी-पीड़ित मानवता का संबल बन उनकी मौत को जुठलाता रहेगा.

सुरेश कान्त द्वारा लिखित

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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