हलाला निकाह: एक वैध वेश्या-वृत्ति: आलेख (हुश्न तवस्सुम निहाँ)

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हुश्न तवस्सुम निहाँ 105 2018-11-18

“कहा जाता है कि शरीयतन स्त्री को इस्लाम में तमाम अधिकार दिए गए हैं। ऐसा वास्तव में है भी किंतु ये अधिकार कभी अमल में लाते हुए दिखाई दिए नहीं। अर्थात ये सारे महिला अधिकार सिर्फ धर्म ग्रंथों तक ही सीमित हो कर रह गए हैं । इन अधिकारों को व्यवहार में लाया ही नहीं गया। बल्कि मुस्लिम महिला को बताया तक नहीं कि उसे कुछ अधिकार भी मुहैया कराए गए है। क्यँू ? क्योंकि अगर वह अपने अधिकारों की बाबत जान लेगी तो कल अधिकार मांगने को खड़ी भी हो जाएगी। शायद यही कारण है कि आज के समय में यदि महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो सबसे बत्तर स्थिति मुस्लिम महिला की है। हलाला निकाह मुस्लिम महिला के शेाषण की ही एक अगली कड़ी है। हलाला निकाह के बारे में ठीक-ठीक स्पष्ट नहीं कि इसका इतिहास क्या है, क्यूं ये रिवायत शुरू करनी पड़ी। इसके पीछे का लॉजिक क्या था। तलाक और फिर निकाह और फिर तलाक की थ्योरी क्या है? या फिर किसी पैगम्बर या खलीफा की पत्नी का भी कभी हलाला निकाह हुआ था या नहीं ? बहरहाल स्थिति है तो बेहद गम्भीर और शर्मनाक।हलाला इस्लाम धर्म की एक ऐसी प्रथा है जो काफी निंदनीय कही जा सकती है। इसमें एक तलाकशुदा पत्नी को अपने पति से दोबारा निकाह करने के लिए, उससे पहले किसी दूसरे मर्द से निकाह करना पड़ता है। यही नहीं उसके साथ हमबिस्तरी भी जरूरी है। यानि निर्दोष होते हुए भी काल का ग्रास महिला को ही बनना है। पति के कुसूर की सजा पत्नी को, क्योंकि वह महिला है। यह तो एक तरह का यौन उत्पीड़न ही है। अर्थात महिला के यौन उत्पीड़न की खुली छूट।” ‘हुश्न तवस्सुम निहाँ‘ का आलेख ……

हलाला निकाह: एक वैध वेश्या-वृत्ति 

हुश्न तवस्सुम निहाँ

हुश्न तवस्सुम निहाँ

धर्म के नाम पर स्त्री का शेाषण, उसके अधिकारों का हनन आम बात हो गई है। वो किसी भी धर्म में हो। सिफत ये कि महिलाएं इस प्रकार की थोपी गई उट-पटांग रिवायतों को सहर्ष ढो भी रही है। इन्हें आत्मसात कर रही है। ये किसी भी धर्म की औरत हो सकती है। इनमें मुस्लिम महिलाओं की स्थिति कुछ ज्यादा ही चिंताजनक और हास्यास्पद है। इन मुस्लिम महिलाओं को आज भी डेढ़ सौ साल पुरानी रिवायतें ढोनी पड़ रही है। वो चाहे तलाक के रूप में हो, खतना के रूप में या फिर हलाला जैसी घोर निंदनीय प्रथा। इन तमाम रिवायतों को मुस्लिम महिला सदियों से ढोती आ रही है। भले ही दुनिया काफी आगे निकल चुकी हो परन्तु मुस्लिम महिला के लिए आज भी दुनिया वहीं की वहीं टिकी हुई है। हालांकि कहा ये भी जाता है कि शरीयतन स्त्री को इस्लाम में तमाम अधिकार दिए गए हैं। ऐसा वास्तव में है भी किंतु ये अधिकार कभी अमल में लाते हुए दिखाई दिए नहीं। अर्थात ये सारे महिला अधिकार सिर्फ धर्म ग्रंथों तक ही सीमित हो कर रह गए हैं । इन अधिकारों को व्यवहार में लाया ही नहीं गया। बल्कि मुस्लिम महिला को बताया तक नहीं कि उसे कुछ अधिकार भी मुहैया कराए गए है। क्यँू ? क्योंकि अगर वह अपने अधिकारों की बाबत जान लेगी तो कल अधिकार मांगने को खड़ी भी हो जाएगी। शायद यही कारण है कि आज के समय में यदि महिलाओं के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो सबसे बत्तर स्थिति मुस्लिम महिला की है। हलाला निकाह मुस्लिम महिला के शेाषण की ही एक अगली कड़ी है।
हलाला निकाह के बारे में ठीक-ठीक स्पष्ट नहीं कि इसका इतिहास क्या है, क्यूं ये रिवायत शुरू करनी पड़ी। इसके पीछे का लॉजिक क्या था। तलाक और फिर निकाह और फिर तलाक की थ्योरी क्या है? या फिर किसी पैगम्बर या खलीफा की पत्नी का भी कभी हलाला निकाह हुआ था या नहीं ? बहरहाल स्थिति है तो बेहद गम्भीर और शर्मनाक।
वास्तव में ‘हलाला‘ शब्द ‘हलाल‘ से बना है जिसका अर्थ है ‘वैध‘। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं हलाल शब्द ‘हराम‘ का विपरीतार्थी शब्द है। हराम, अर्थात जो चीजें वर्जित हों। और जो ना वर्जित हो वो ‘हलाल‘। इसी शब्द से बना है हलाला। तलाक के बाद पत्नी को पति पर हराम मान लिया जाता है। इसी कारण स्त्री को दोबारा ‘हलाल‘ बनाने के लिए उसे ‘हलाला‘ (वैधता ) जैसी अग्नि-परीक्षा से गुजरना पड़ता है। बगैर इस परीक्षा के पत्नी का पति से दूसरी बार निकाह संभव ही नहीं। हलाला के लिए निकाह करने वाले पुरूष को मुहल्लिल कहा जाता है। हालांकि इस प्रथा का कोई ठोस आधार और कहीं कोई ऐतिहासिक पृष्ठभूमि नहीं मिलती। अभी तक ऐसा कुछ सामने निकल कर नहीं आया कि पहली महिला कौन थी जिसका ‘हलाला‘ निकाह हुआ और कौन था वो प्रथम पुरूष जिसकी पत्नी का ‘हलाला‘ निकाह हुआ और कौन था वो जिसने पहली बार किसी स्त्री से हलाला निकाह किया।
हलाला इस्लाम धर्म की एक ऐसी प्रथा है जो काफी निंदनीय कही जा सकती है। इसमें एक तलाकशुदा पत्नी को अपने पति से दोबारा निकाह करने के लिए, उससे पहले किसी दूसरे मर्द से निकाह करना पड़ता है। यही नहीं उसके साथ हमबिस्तरी भी जरूरी है। जैसा कि नीचे दृश्यतव्य है-
‘‘ हजरत आयशा से रिवायत है कि ह. रफा करवी की पत्नी मोहम्मद स. के पास आ कर बोली कि मैं रफा के पास थी तो उन्होंने मुझे तलाक ए बिंता दे दी। पर उनके बाद मैने अब्दुर्रहमान बिन जुबैर से शादी कर लिया और उनके पास ही हूँ, मगर कपड़े के फुनगे की तरह।‘‘ मो. साहब ने कहा-‘‘ क्या तुम रफा के पास जाना चाहती हो?‘‘ ह. रफा की पत्नी ने कहा-‘‘ हाँ ‘‘ तब मो. साहब ने कहा-‘‘यह नहीं होगा जब तक तुम उसका और वह तुम्हारा जायका ना चख ले‘‘
यानि निर्दोष होते हुए भी काल का ग्रास महिला को ही बनना है। पति के कुसूर की सजा पत्नी को, क्योंकि वह महिला है। यह तो एक तरह का यौन उत्पीड़न ही है। अर्थात महिला के यौन उत्पीड़न की खुली छूट। इस बारे में जब मुल्ला मौलवियों से दरयाफ्त किया जाता है तो वे बताते हैं कि इस प्रकार के निकाह से तलाक देने वाला पति मजाक का पात्र बनता है, यही उसकी सजा है। हालांकि ये जवाब भी बेहद हास्यास्पद है। सवाल ये कि यहां जितना मजाक पति का बनता है, उससे कहीं लाख गुना ज्यादह मजाक का पात्र वो महिला बनती है। मेरा स्वयं का अपना अनुभव है कि ऐसी महिलाओं की समाज में जरा भी क.द्र नहीं होती। बल्कि वे जीवन भर के लिए मजाक का पात्र बन जाती हैं और मौके-मौके पर उन्हें इसी बात को ले कर समाज द्वारा जलील भी किया जाता है, ताने भी मारे जाते हैं। जिससे वे कुंठा का शिकार हो जाती है। एक कभी ना खत्म होने वाला मानसिक संत्रास सहती हैं वे। किंतु औरत की गिनती तो इंसानों में है ही नहीं। कुरान में कहा गया है-
‘‘ जिन औरतों की नाफरमानी और बदगुमानी का तुम्हें खैाफ हो उन्हें नसीहत करो, और उन्हें अलग बिस्तर पर छोड़ दो। और उन्हें मार की सजा दो। और अगर फिर वो कोई ताबेदारी करें तो इन पर कोई रास्ता तलाश करो बेशक अल्लाह तआला बड़ी बुलंद और बड़ाई वाला है।‘‘(सूरह निसा 4:34)

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इसी तरह हजरत सौबान रजि. से रिवायत है कि नबी सल. अलै. वसल्लम ने फरमाया कि-‘‘जिस औरत ने अपने पति से बिलावजह तलाक मांगा उस पर जन्नत की खुशबू हराम है‘‘ (र्तिमृर्जी)
सवाल ये कि बगैर किसी वाजिब वजह के पत्नी तलाक मांग सकती है क्या? और फिर उक्त ‘वजह‘ की सीमा क्या हो सकती है? ये कहीं नहीं फरमाया मो. पैगम्बर ने कि बिलावजह पत्नी को तलाक देने वाले पति पर जन्नत की खुशबू हराम है। या फिर ऐसे पति को सौ-दो सौ कोड़ों की सजा दी जाए। बल्कि ऐसे में भी प्रायश्चित स्वरूप पत्नी को ही ‘हलाला‘ की सजा दी जाती है। पति को संगसार करने की सजा क्यूं नहीं। जबकि वह एक स्त्री को बेवजह मानसिक और शारीरिक यंत्रणा से गुजरने को बाध्य करता है।
कुरान की आयत सूरह अल बकरा (2: 230) में जिक्र है कि ‘‘फिर अगर इस तलाक को दे दे तो अब इसके लिए हलाल नहीं जब तक के वो औरत इसके सिवा किसी दूसरे से निकाह ना करे, फिर अगर वो भी तलाक दे दे तो इन दोनों को मेल जोल कर लेने में कोई गुनाह नहीं बशर्ते कि यह जान ले कि अल्लाह की हदों को कायम कर सकेंगे, यह अल्लाह तआला की हदें हैं जिंन्हें वह जानने वालों के लिए बयां करता है‘‘ (सूरह अल बकरा-2: 230)
इसी प्रकार उम्मुल मोमिनीन आयशा फरमाती हैं कि किसी व्यक्ति ने अपनी पत्नी को तलाक दे दिया। लेकिन बाद मे फिर से अपनी पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा प्रकट की। तब रसूल ने कहा कि ऐसा करना बहुत बड़ा गुनाह है। ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक उसकी पत्नी किसी दूसरे मर्द का शहद और वह मर्द उसके शहद का स्वाद ना चख ले।‘‘ ( अबू दाउद, किताब 12, नंबर 2302)
अब्दुल्लाह बिन मसूद ने कहा कि रसूलल्लाह स. वसल्लम ने हलाला करने वाले और जिसके लिए हलाला किया जाए दोनों पर लानत की है। हैरत ये होती है कि एक तरफ इस कुत्सित प्रथा पर लानत भी भेजी जा रही है तो दूसरी तरफ इसकी ताईद भी की जाती है। हलाला की चर्चाएं कुरान में भी पाई जाती हैं। अगर ये बातें लानत भेजने की चीज है तो मो. साहब ने इसे हराम क्यूं नहीं कह दिया? इससे जाहिर होता है कि हलाला निकाह पितृसत्तात्मक व्यवस्था का ही एक रूप है जो महिलाओं पर अंकुश लगाने और पति की बांदी बन कर रहने को बाध्य करता है। अगर दाल में नमक कम है तो भी पति पत्नी को तलाक दे देता है। बाद में होश आने पर वह पत्नी को पुनः पाना चाहता है तब उसे हलाला का रास्ता सुझााया जाता है और उस निरीह पत्नी को किसी और मर्द के पास भेज दिया जाता है। जिससे तलाक देने वाले पति की गैरत को चोट पहुँचे। पर ये समझ से परे है कि यह जलालत और अपमान की स्थिति पत्नी क्यों सहे? अजीब रिवायतें हैं इस धर्म की। कभी औरत को खेती बताता है तो कभी वेश्या की श्रेणी में ला कर खड़ा कर देता है। कभी स्त्री की सुन्नत करवाने पर बल दिया जाता है। समझ नहीं आता ऐसी अर्थहीन और अनर्गल बातें पेगम्बर मोहम्मद के जेहन में आती कहां से थीं। कहा जाता है कि खुदा के घर से अर्थात आसमान से ‘‘वही‘‘ उतरती थी। नाजिल होती थी। मगर ये ‘वही‘‘ सिर्फ मोहम्मद साहब पर ही क्यूं उतरती थी? या किसी महिला पर क्यूं नहीं उतरती थीं ये आयतें। वास्तव में सुन्नत प्रथा या हलाला जैसी प्रथाएं सिर्फ स्त्री की यौनिकता पर अंकुश लगाने के तरीके हैं। ये तरीके आज भी उतने ही प्रचलन में हैं जितना कभी पहले हुआ करते थे। अर्थात मुस्लिम समाज आज इक्कीसवीं सदी में भी कुरान द्वारा ही संचालित हो रहा है। हैरत तब होती है जब असगर अली इंजीनियर जैसे प्रगतिशील विचारक भी अपनी पुस्तकों में असमानी किताब या ‘‘बही‘‘ आने का जिक्र करते हुए इस्लामी गाथा लिखते हैं। ऐसे में भला क्या उन्नति कर सकेगा ये मुस्लिम समाज।
बहरहाल, हलाला निकाह को कुछ और स्पष्ट करने के लिए नीचे एक तालिका रखना चाहूंगी जो हलाला निकाह की त्रासदी को और अधिक स्पष्ट करती है-
शरयी हुक्म                                 निकाह मसनूनन                                    निकाह हलाला
नियत                              जिंदगी भर साथ निभाने की                              एक या दो रातों के बाद तलाक की
मकसद                           औलाद हासिल करना                                      दूसरे मर्द के लिए औरत को हलाल करना
औरत की मर्जी                 जरूरी है                                                         मर्जी नहीं जानी जाती
कफू                                 दीनदारी, हस्ब ए नस्ब ए दौलत

                                        ए हुस्न ए जमाल सब देखा जाता है                      कोई चीज नहीं देखी जाती
मेहर                                अदा करना फर्ज है                                             न तय किया जाता है, ना अदा
ऐलान और प्रचार              ऐलान और प्रचार करना मसनून है                      खुफिया रखा जाता है
रूखसती                          इज्जत और वकार के साथ सुसराल आती है         खुद चल कर मुहल्लिल के पास जाती है
दूल्हा दुल्हन के जज्बात       मुहब्बत और खुशी के होते हैं                                नफरत और शर्मिंदगी
रिश्तेदारों की दुआ             मुहब्बत और खुशी से दुआ                                   हर तरफ लानत और मलालत की जाती है
दुल्हन का बनाव सिंगार      सहेलियां खुशी खुशी करती हैं                                दुल्हन बनने का तसव्वुर ही नहीं होता
सुहागरात का इंतजाम        सुसराल वाले खुशी खशी करते हैं                           सुसराल का वजूद ही नहीं होता
शैाहर की तरफ से हदिया    शैाहर खुशी खुशी देता है                                       फूटी कौड़ी भी नहीं मिलती
जिम्मेदारी                           शौहर के लिए हमेशा के लिए                                   मुहल्लिल कीमत वसूलता है

उपरोक्त तालिका में साफ पता चलता है कि हलाला निकाह कितनी शर्मनाक रिवायत है। एक औरत के लिए यह कितनी बड़ी सजा और यंत्रणा है।

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अभी कुछ दिन पहले की घटना है कि कस्बा फतेहगंज के निकटवर्ती गांव में कुछ आपसी मन मुटाव हो जाने के कारण पति-पत्नी ने अलग हो जाने का फैसला किया और तलाक ले लिया। किंतु कुछ दिनों में ही उन्हें ऐसा आभाष हुआ कि उनका निर्णय गलत था। उन्होंने दोबारा साथ रहने का फैसला किया और आपसी बात चीत के बाद ‘हलाला‘ निकाह करने का निर्णय लिया गया। एक व्यक्ति को ‘हलाला‘ निकाह के लिए राजी भी कर लिया गया। यह तय हुआ कि निकाह के एक दिन बाद वह महिला को तलाक दे देगा। तलाक के बाद महिला पूर्व पति से निकाह कर लेगी। हां इस निकाह के बारे में उक्त ग्रामीण ने अपनी पत्नी से कुछ नहीं बताया था। दो दिन पूर्व ग्रामीण की पत्नी को पति के दूसरी महिला से निकाह करने की भनक लग गई। नतीजा, वह गुस्से में आगबबूला हो गई और कमरा बंद कर फांसी से लटक गई।
गरज ये कि यही है ‘हलाला‘ निकाह का सच। उपरोक्त तालिका में एक बात और देखी जा सकती है कि ‘हलाला निकाह‘ के लिए औरत की मर्जी भी नहीं जानी जाती। यानि औरत मात्र एक भोग्या ही है। जो जैसे चाहे वैसे भेागे। अब तो हलाला के नाम पर अच्छा खासा व्यवसाय भी होने लगा है। तमाम मुस्लिम बहुल पिछड़ी बस्तियों में मुल्ला मौलवी अपनी अच्छी पैठ बनाए रहते हैं। इनका कार्य है फतवे देना। अब तो मेल और फैक्स से भी तलाक दे दिए जाते हैं। कई बार ये संदेश ना मिलने के बावजूद ये बिकाउ मौलाना हलाला निकाह तय कर देते हैं। इनके फतवे भी अब किस्म-किस्म के हो गए हैं। दारूल उलूम देवबंद के फतवा विभाग के दारूल इफ्ता से पूछा गया-‘‘ अगर इंसान शराब के नशे में अपनी बीबी को फोन पर तीन बार तलाक बोल दे लेकिन बाद में पछतावा हो और वह तलाक ना चाहता हो, तो क्या ऐसी सूरत में भी तलाक हो जाएगा?‘‘ इस पर मुफ्तियों ने फतवा जारी किया कि अगर तलाक नशे की हालत में दिया गया हो तो भी पति-पत्नी का रिश्ता खत्म हो जाएगा। फोन पर दिया गया तलाक भी मान्य है। अगर ऐसा शख्स पुनः अपनी पत्नी के साथ रहना चाहता है तो हलाला के सिवाए कोई दूसरा विकल्प नहीं। ‘‘
यही नहीं अब तो ये प्रथा व्यवसाय में तब्दील होने लगी है। मुल्ला मौलवी अपनी कमाई करने के लिए फिजूल के फतवे देते रहते हैं। इनके पास हलाला निकाह करवाने के लिए किराए के मर्द भी मिल जाते हैं। चूंकि यह जलालत और शर्मिंदगी का सौदा होता है सो भीतर ही भीतर लेन देन करके सौदा तय कर लिया जाता है,। हलाला निकाह हो जाता है। इस तरह ये लोग चोरी छिपे जासूसी भी करते रहते हैं कि कहाँ शराब पी के पति दंगा कर रहा है और तलाक की नौबत आने वाली है। और कहीं तलाक हुआ नहीं कि ये हलाला निकाह करवाने धमक पड़ते हैं। विवश हो कर सीधे साधे मुसलमान अल्लाह के खैाफ से पत्नी का हलाला निकाह करवाने को बाध्य हो जाते हैं। बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती ये मुल्ला मौलवी फर्जी तलाकनामे तक बनवा देते हैं।
बहरहाल यह प्रथा तो खैर बुरी है ही अब चाहे इसे पैगम्बर मोहम्मद ने तजवीजा हो या फिर किसी और ने। किंतु महिला के हक में यह पूरी तरह गलत है। बात यहीं खत्म नहीं होती। इसके खिलाफ महिलाओं ने आवाज भी उठाई है। जिससे जाहिर होता है कि मुस्लिम महिलाएं इस कुत्सित रिवायत से मुक्ति चाहती हैं। तभी तो एक अखबार में छपता है कि लखनउ में दोपहर के समय करीब 200 मुस्लिम महिलाएं सिर्फ दुपट्टा सिर पर डाले हुए मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड के दफ्तर में घुस गईं। वे नारे लगा रही थीं कि ‘‘मुस्लिम ख्वातीन को मुल्लों से बचाया जाए जो फर्जी तलाकनामें बनवा कर उनको ‘‘हलाला‘‘ करने पर दबाव डालते रहते हैं या तलाक को रद्द करने के लिए रू. मांगते हैं। इन महिलाओं का नेतृत्व शाईश्ता अम्बर कर रही थीं।
उक्त तथ्यों से साफ स्पष्ट होता है कि इस्लाम में धर्म के नाम पर प्रायः ऐसी रिवायतें जन्म लेती ही रहती हैं जो पूरी तरह पितृसत्तात्मक व्यवस्था की तरफ इशारा करती हैं। जैसे कभी मुस्लिम देशों में यकायक ये नियम लागू कर दिया जाता है कि जेलों में जिन महिलाओं के लिए मौत की सजा का ऐलान हुआ है उन्हें फांसी देने से पहले उनके साथ जेल के अधिकारियों या कर्मचारियों को शारीरिक संबंध बना लेना चाहिए। इससे महिला को मौत के बाद जन्नत मिलेगी या फिर अनायास किसी मुस्लिम देश में यह फरमान आ जाता है कि सरकार की तरफ से कि कार्यालयों में काम करने वाली सभी महिलाओं को अपने कुलीग्स को स्तन पान कराना होगा। इससे उन महिलाओं का स्तनपान करने वाले अपने कुलीग्स से दूध का रिश्ता या मां बेटे का रिश्ता हो जाएगा और महिलाओं के साथ कोई ‘‘अप्रिय घटना‘‘ नहीं घटेगी। यह सारे ऐसे फरमान और कानून हैं जिनका जिक्र हो तो इस्लामी सभ्यता का सिर शर्म से झुक जाता है। अगर ऐसे शर्मनाक तथ्यों को हटाने के लिए कुरान में संशोधन किया जाए तो क्या बुरा है। क्योंकि जब तक कुरान से यह चीजें हटेंगी नहीं, यह कुप्रथाएं मिटेंगी नहीं। क्योंकि ऐसे कामों पर आपत्ति होने पर फौरन कुरान का हवाला दे कर उसे सही ठहराने का प्रयाास किया जाने लगता है।
जहां तक हदीसों की बात है तो हदीस रचने वाले भी पुरूष ही हैं। उन्हें अपनी सत्ता तो बरकरार रखना ही है। इसके लिए वे कुछ भी लिख देंगे। उसे हदीस कहेंगे। खुदा का फरमान कहेंगे। इसके लिए महिलाओं को भी आगे आना होगा। ऐसे तमाम मिथकों को तोड़ना होगा जो उसकी शुचिता और अस्तित्व पर प्रहार करते हैं। ऐसी रिवायतों का निषेध और विरोध करना होगा। हालांकि अब ये क.वाएद शुरू हो गई है। गति थेाड़ी धीमी जरूर है क्योंकि मुस्लिम महिलाओं के जेहन में परलोक का भय कुछ ज्यादह ही गहरे पैठा होता है। वे पति को मजाजी खुदा मानती हैं। किंतु घीरे-धीरे ये मान्यताएं भी समाप्त होगीं। फिलहाल महिलाओं को हलाला निकाह करने से ही मना कर देना चाहिए और बाकी औरतों को उन महिलाओं को इस चीज से रोकना चाहिए कि वे तलाक के बाद दूसरा निकाह जरूर करें पर पूर्व पति से निकाह करने के लिए नहीं या हलाला निकाह करने के लिए नहीं बल्कि अपनी दुनिया और बेहतर बनाने के लिए। यही नहीं इसके खिलाफ एक मुहिम चलानी चाहिए। क्योंकि हलाला निकाह कोई निकाह-विकाह नहीं, निकाह के नाम पर एक धर्म-समर्थित वेश्या-वृति है और किसी भी मुस्लिम महिला को ये वेश्या-वृत्ति नहीं करनी।

संदर्भ
1- बुखारीवैल्यूम-7, पुस्तक-63, नंबर-186
2- अबु दाउदपुस्तक-12, नंबर- 2302
3- सूरह अल बकरह की आयत संख्या- 230, 231, 232
4- www.patrika.com
5- manjari mishra,TNN,mar,8/2011, 04.44am IST
6- www.islam-the-truth.com

हुश्न तवस्सुम निहाँ द्वारा लिखित

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हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

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'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 260 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

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