जगतमाता : लघुकथा (दिलीप कुमार)

कथा-कहानी लघुकथा

दिलीप 302 2019-01-19

  • दिलीप कुमार की ​ लेखकीय संवेदनशीलता का छोटा प्रमाण है उनकी यह लघुकथा॰॰॰॰॰ 'जगतमाता'   

  •  जगतमाता

  • आज काली बहुत खुश है। काली के चार बच्चों में से जीवित बचा गोलू अब बिना लड़खड़ाये चलने लगा है। ये तो काली ही जानती है कि उसने कड़कड़ाती ठंड, खूंखार कुत्तों, खुले नालों और सीवर तथा सड़क पर बेलगाम दौड़ते वाहनों से गोलू को कैसे कैसे बचाकर रखा है। अब गोलू, अपनी माँ के पीछे पीछे दौड़ता है, उछलता-कूदता है, अटखेलियाँ करता है और दूसरे कुत्तों पर भौंकता भी है। काली, आज गोलू को गाँव दिखाने ले जा रही है। वो गली, वो घर जहाँ से रोटी मिलने की उम्मीद होती है और वो गली भी जहाँ जाना खतरनाक है क्योंकि वो दूसरे कुत्तों का क्षेत्र है। काली, सबसे पहले गोलू को गांव के मंदिर में लेकर आई है। आरती का समय है, मंदिर भक्तों की भीड़ से अटा पड़ा है, देवी की प्रतिमा के सामने आँख बंद किये भक्त आरती में मग्न हैं। इत्र, धूप और फूलों से मंदिर महक रहा है। देवी की प्रतिमा का रूप अत्यंत भव्य और मातृत्व सुख देने वाला है। सिर को सोने सी चमक वाला मुकुट और फूलों की माला गले को शुशोभित कर रही है, खुले केश और शस्त्र धारण किये अष्ट भुजायें, प्रतिमा को विराटता प्रदान किये हुए हैं। देवी का शेर, आज्ञाकारी पुत्र की भांति देवी के पैरों में बैठा है। पूरा मंदिर ढोल, मजीरों, चिमटों और भक्तों की तालियों से गूँज रहा है। माँ, ये किसकी मूर्ति है? बेटा, जैसे मैं तेरी माँ हूँ वैसे ही ये सारी दुनियाँ की माँ हैं। सारी दुनियाँ की? हाँ मेरे बेटे, ये जगतमाता हैं। माँ, ये क्या करती हैं? बेटा, ये सबकी रोटी का इंतजाम करती हैं, सबकी रक्षा करती हैं। सबकी? हाँ बेटा, सबकी। जिंदगी और मौत इन्हीं के हाथों में है, इनकी इच्छा के बिना कुछ भी नहीं होता। गोलू की आँखें मूर्ति पर गढ़ गई मानो मन ही मन गोलू देवी से कुछ माँग रहा हो। अब उसे रोटी के लिए माँ के साथ घर घर घूमना नहीं पड़ेगा, अब उसे किसी कुत्ते से डरना नहीं पड़ेगा और पता नहीं क्या क्या ख्याल गोलू के दिमाग में तैरने लगे। आरती पूरी होते ही माता के जयकारे लगने लगे, प्रसाद बांटने की तैयारी होने लगी कि मंदिर के एक कोने से कोई आवाज़ आई और अचानक मंदिर में भगदड़ मच गई, लोग बाहर की ओर भागने लगे। ढोल, मंजीरे, चिमटे और तालियों की आवाज़ चीखों में बदल गई, लोग एक दूसरे को धकेलते-कुचलते दौड़ रहे थे। भीड़ के रेले ने काली को मंदिर के दरवाज़े तक पहुंचा दिया, लेकिन गोलू वहीं मंदिर के अंदर रह गया। गोलू, माँ को पास ना पाकर घबराया गया और डरके मारे कांपता हुआ चीखने लगा। गोलू की आँखें अब देवी को नहीं बल्कि अपनी माँ को ढूंढ रही थीं लेकिन उसे लोगों के पैरों के अलावा कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। काली भी गोलू को भीड़ में ढूंढ रही थी। काली बिलबिला रही थी, परेशान थी कि गोलू अभी बहुत छोटा है और उसका इकलौता बच्चा भी। काली, कभी इस कोने से तो कभी उस कोने से मंदिर में घुसने की कोशिश करती रही लेकिन हरबार की तरह निराशा ही हाथ लगी। काफ़ी जद्दोजहद और मशक्कत के बाद आखिर काली मंदिर के अंदर पहुँच ही गई। भीड़ भी अब कम होती जा रही थी। बदहवास काली इधर उधर मंदिर में घूम रही थी तभी उसकी नज़र गोलू पर पड़ी, गोलू ज़मीन पर पड़ा कराह रहा था जिसके मुँह से खून बह रहा था। काली दौड़कर गोलू के पास पहुँची, काली को देखते ही गोलू की आँख से आँसू बहने लगे। काली भी अपने इकलौते बेटे को इस हालत में देख अपने आँसू रोक न सकी। गोलू, लगातार दर्द से कराह रहा था और काली कभी गोलू के चारों ओर घूमने लगती तो कभी गोलू को चाटती। गोलू का कराहना अब सिसकियों में बदल गया, सिसकियाँ भी ज्यादा देर तक गोलू का साथ न दे सकीं और धीरे धीरे सिसकियाँ खामोशी में बदल गईं, गोलू की खुली आँखें जगतमाता को घूरती रहीं।

दिलीप द्वारा लिखित

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इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

नोट-

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