हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

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अनीश अंकुर 255 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है 'रंगमंच'

पिछले कई  दशकों से 27अप्रैल, ‘विश्व  रंगमंच दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।  तकनीकी बदलावों ने देशों के मध्य आपसी आदान-प्रदान  में संवाद करने की क्षमता में गुणात्मक बढ़ोतरी ला दी है। अब दूसरे मुल्कों के रंगमंच से परिचित होने का अवसर दिल्ली के अतिरिक्त छोटे शहरों  को भी होने लगा है। दुनिया की विदेश नीति में  कल्चर सॉफ्ट पावर’ के रूप में जाना जाने लगा है। कहा जाता है कि अॅंग्रेजों के साम्राज्य विस्तार के दौरान सांस्कृतिक वर्चस्व कायम करने में शेक्सपीयर के नाटकों का भी उपयोग किया । पिछले साल थियेटर ओलंपिक’ एक ऐसा आयोजन था जिसमें विश्व के अनेक देशों  ने अपने रंगमंच का प्रदर्शन किया। खुद पटना में थियेटर ओलंपिक का एक चैप्टर आयोजित किया। इससे कुछ साल पहले जद्दोजहद कर रहे फिलीस्तीनी जनता के प्रतिरोध थियेटर से बिहार के लोगों को परिचित होने का मौका मिला था।


 पूरी दुनिया के रंगमंच की एक खास पहचान रही है कि वो मनोरंजन करने के साथ साथ प्रतिरोध की भूमिका भी निभाता है। भारतीय रंगमंच के एक प्रमुख हस्ताक्षर रतन थियम कहते हैं ‘‘ रंगमंच को लोगों के  मनोविज्ञान में प्रवेष करने का प्रयास करना चाहिए। यह प्रतिरोध का संदेश लिए हुए रहता है। यह लोगों को सोचने पर मजबूर पर करेगा कि  व्यवस्था में कुछ न कुछ गड़बड़ी है और इसमें बदलाव की आवश्यकता है। पिछले तीन हजार वर्षो में एक भी नाटक ऐसा नहीं लिखा गया है जिसमें प्रतिरोध न हो। ’’


 संभवतः इन्हीं वजहों से  प्राचीन भारत में नाटक करने वाले शूद्र माने जाते थे। भरतमुनि  ने नाट्यशास्त्र’ के लिए  नाट्यवेद’ लिखा यानी उसे वेद की संज्ञा दी। वेद शब्द का व्यवहार रामायण के लिए नहीं किया गयामहाभारत के लिए नहीं किया गया। लेकिन भरतमुनि ने अपने ग्रंथ के लिए नाट्य वेद का प्रयोग किया और उन्होंने बार-बार इस बात का उल्लेख किया कि शूद्रों के लिए मैंने पांचवां वेद बनाया है। नाटक में पुरोहितों व सामंतों का मजाक बनाया जाता था। शायद इसी से नाराज होकर सामंतों व पुराहितों ने नटों को शूद्र कहा। 

 

हिंदी क्षेत्र के लगभग हर प्रांत में  परंपरागत लोकनाटकों की भरमार रही है। बिहार में लोकनाट्यों के कई रूप रहे हैं रेशमा चौहरमलबहुलागोढ़िनहिरनी-बिरनी,सतीबिहुलाराजा सलहेस सहित हर भाषाई इलाकों में एक से बढ़कर लोक नाट्य परंपरायें रही है। जर्मनी के महान नाटककार बर्तोल्त ब्रेख्त ने अपने एपिक थियेटर की अवधारणा ऐशियाई देशों के पारंपरिक रंगमंच से ही की थी। रंगमंच व अभिनय के क्षेत्र में उनका एलियेनेशन इफेक्ट’ का आधार ये पारंपरिक रंगमंच ही रहे हैं। ब्रेख्त कहा करते थे ‘‘ नाटक को कुछ इस प्रकार प्रस्तुत किया जाए  दर्षक को नाटक के चरित्र से तादात्मय स्थापित करने से रोका जाए। चरित्रों के क्रियाकलापों के प्रति स्वीकार या इंकार का भाव  दर्षकों की चेतना के स्तर पर हो न कि अवचेतन स्तर पर होजैसा कि पहले सोचा जाता था।’’ यानी पाठक चरित्र के साथ डूबे नहींमुग्ध नहोबराबर नाटक से अपने को अलग रखे। ब्रेख्त की ऐपिक अवधारणा को इरविन पिस्काटर ने  थोड़े और स्पष्ट करते हुए  कहा था ‘‘ नाटक देखने वाला दर्षकों  में संवेदना जगाने की क्षमता को उद्वेलित करना,इस एपिक थियेटर का काम नहीं है। ऐपिक थियेटर भावना जगाने की बजाए चकित करने पर जोर  देता है। यदि इसे दूसरे ढ़ंग से कहा जाये तो दर्षक नायक से खुद को  जोड़ने या एकाकार करने की बजाय उन परिस्थितियों पर ध्यान देचकित होजिसमें नायक फंसा है।’’

 ब्रेख्त की इस समझ ने रंगकर्मियों की कई पीढ़ियों को प्रभावित किया। 70के दषक के बाद फोक थियेटर के बोलबाला होने के बाद इसकी प्रसंगिकता और बढ़ा दी। 


 लेकिन पारंपरिक रंगमंच से इतर बादल सरकार लगभग इसी समय थर्ड थियेटर या तीसरी धारा का रंगमंच की अवधारणा लेकर आए। बादल सरकार के थर्ड थियेटर’ पर भी विश्व रंगमंच में हो रहे प्रयोगों का प्रभाव रहा है।  उनके अनुसार  पहला थियेटर भारत का पारंपरिक रंगमंच हैदूसरा औपनिवेषिक काल में होने वाले प्रोसिनियम है और तीसरा है ये थर्ड थियेटर’ है जिसके अनुसार यह लाइव यानी जीवंत होने के साथ घुमंतू यानी मोबाइल और मुफ्त होगा। बादल सरकार ने इसी प्रेरणा  ग्रोटोव्स्की के पुअर थियेटर’ और रिचर्ड स्टेसनर के परफॉर्मेंस ग्रुप के  अनुभवों से लिया था। उनका थियेटर खुले में प्रस्तुत किया जाता है तथा शारीरिक भंगिमाओं पर ध्यान दिया जाता है । यह थियेटर राजनीतिक  मसलों को अपना विषय बनाता है। नुक्कड़ नाटक को इस परंपरा से   भी प्रेरणा मिली है।  बिहार में नुक्कड़ नाटक का प्रारंभ बादल सरकार के लिखे नाटक जुलूस से माना जाता है। 1974के व्यापक प्रभावों वाले जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले छात्र आंदोलन में जुलूस जैसे नुक्कड़ नाटकों के जरिए सतीश आनंद ने भागीदारी निभाकर भविष्य के आंदोलनों और आम जनता से जुड़ाव रखने वाले रंगमंच को नया आयाम प्रदान किया।


बिहार के रंगमंच की सबसे खास बात है इसका प्रयोगधर्मी होना। नाटकों को लेकर इतने किस्म के प्रयोग बिहार के रंगमंच पर हुए हैं कि उसकी गिनती संभव नहीं। बिहार के रंगमंच के प्रयोगधर्मी होने की एक मुख्य वजह इस राज्य का एक खास चरित्र रहा है। बिहार  काफी लंबे समय से सामाजिक-राजनीतिक हलचलों का केंद्र रहा है। कई विद्वानों का मानना है कि पिछले ढ़ाई हजार वर्षों से बिहार एक बेचैन प्रदेश  रहा है। बुद्ध के वक्त से लेकर आज तक जितनी तरह के आंदोलन बिहार में हुए उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती। बिहार के रंगमंच पर भी इसका प्रभाव पड़ा है। समाज को बेहतर बनाने की कई तरह की कोशिशों की प्रयोगभूमि बना है बिहार । यदि आधुनिक समय में देखें तो आजादी के आंदोलन से किसान आंदोलनसमाजवादी आंदोलनवामपंथी आंदोलनसबको अच्छा-खासा समर्थन इस राज्य में मिला। इन तमाम आंदोलन की सबसे खास बात थी इनमें आमलोगों की व्यापक पैमाने पर भागीदारी। बिहार के सामाजिक जीवन की यह विषेशता यहॉं के कला संस्कृति में भी अभिव्यक्त हुई है।  कला के लगभग तमाम अनुशासनों की विषिष्टता रही उसका जनोन्मुख होना। जैसे पेंटिंग में देखें तो पटना कलमइस देश में चित्रकला के क्षेत्र में पहली ऐसी शैली थी जिसने पहली बार आम आदमी को चित्रकला के केंद्र में लाया। ठीक इसी तरह साहित्य में देखें तो फणीश्वर नाथ रेणुनागार्जुन  से लेकर आज के साहित्यकारों तक सबकी केंद्रीय चिंता आम आदमी है। संगीत में पटना हिंदी इलाके की एकमात्र ऐसी जगह रही है जहॉं शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रमों में भी श्रोताओं और आम दर्षकों की विशाल संख्या उसमें भाग लेती रही है। दशहरे के मौकों पर आम जनता की व्यापक भागीदारी वाले संगीत सभाओं का आयोजन इस राज्य की विषिष्टता रही है। यहॉं के रंगमंच में भी प्रारंभ से ही आम जनता के सरोकारों से जुड़ना यहॉं के रंगकर्मियों की प्राथमिक चिंता रही है। 


डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकताएक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है।   भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता हैवह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’

नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता हैहंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है।  बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त  ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’


- सभी प्रतीकात्मक चित्र google से साभार 

अनीश अंकुर द्वारा लिखित

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बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

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