गज़लें : मुनीश तन्हा

कविता ग़ज़ल

मुनीश तनहा 353 2020-08-14

'मुनीश तन्हा' की गज़लें 


 1.

रोज चेहरा छुपा रहा है कोई 

फासला यूँ बढ़ा रहा है कोई 


ये मुहब्बत मियाँ अजब चुम्बक 

दिल जला के बता रहा है कोई 


लूट उसको बता कहाँ जाती 

ज़िन्दगी आइना रहा है कोई 


साथ सब प्यार से रहें भाई 

मांगता ये दुआ रहा है कोई 


तजकिरा प्यार पे करो लेकिन 

सोच ले वास्ता रहा है कोई 


फूट धारा पड़ी पहाडों से 

जल नदी सिलिला रहा है कोई 

2.

शक्लो  सूरत  से  हू  ब हू है वही

कैसे  कर  लूँ  यकीं  मैं तू है वही


वो  छुपा  है  कहाँ  पता तो चले

थक  गए  ढूंढ  जुस्तजू  है  वही


चौक  पहचान कर  सनम बोले

आइए  साथ - साथ  कू है  वही


मैं  इधर  ही  जनाब  रहता   हूँ

इसलिए  जानता  हूँ  बू  है वही


फैलता ही       गया है कोरोना

हर घड़ी रोज    गुफ्तगू है वही


काम जिसको नहीं कोई "तन्हा "

आदमी देख      फ़ालतू है वही

3.

याद के बादल हैं छाए दिल चहकने है लगा

प्यार के आगोश में मौसम बदलने है लगा


मतलबी      रिश्ते हुए हैं आजकल के दौर में 

काम निकला  खत्म अपनापन अखरने है लगा


सख़्त तेवर के लिए  मशहूर था जो आदमी

आंच पाई प्यार की तो वो पिघलने है लगा


है गुज़ारी रात गम की हमने प्यारे इस तरह

दर्द आँसू आह से कमरा महकने है लगा


कर्म का फल देख मिलता गम मिले या फिर खुशी

याद जिसको       आ गया रब वो उभरने है लगा


सच शिकारी सा छुपा है मन के भीतर झांक लो

झूठ उड़ने को हुआ तो पर कतरने है लगा

4.

कब फकीरों की दुआओं से असर जाते हैं

बे यकीं       लोग निगाहों से उतर जाते हैं


फ़िक्र अपनी न करी हमने कभी यूं फिर भी 

आप ने प्यार         से देखा तो संवर जाते हैं


जुर्म  ईमान              में आंसू न बहाए कैसे

गर्द चेहरे         पे लिए पापी तो घर जाते हैं


वक़्त आया  है खरा तो भी मिला लो आंखें

जो चुराते       हैं नजर फ़िक्र से मर जाते हैं


लोग आते हैं   मनाने को   जहाँ पे खुशियां    

हम तो उस   राह से चुपचाप गुज़र जाते है


वो रुलाते हैं           हँसाते हैं मनाते "तन्हा"

प्यार करते हैं जो     मौके पे मुकर जाते हैं 

5.

खुदा के प्यार का रास्ता रहा हूँ 

मुहब्बत में सदा सच्चा रहा हूँ 

तुम्हें अब याद भी शायद नहीं है 

कभी पर रात दिन मिलता रहा हूँ 

खुदा  तो आइना है ज़िन्दगी का 

यही बस सोचकर अच्छा रहा हूँ 

मेरा महबूब मालिक है सदा से 

उसी के वास्ते ज़िन्दा रहा हूँ 

अभी तक हूँ सभी से देख आगे 

समय के साथ मैं चलता रहा हूँ 

जिसे सब देख कर उंगली उठाएं 

कभी ऐसा भी मैं रिश्ता रहा हूँ

करे कैसे न "तन्हा"याद दुनिया

बना दीपक सदा जलता रहा हूँ 

मुनीश तनहा द्वारा लिखित

मुनीश तनहा बायोग्राफी !

नाम : मुनीश तनहा
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ऑथर के बारे में :

जन्म- अक्तूबर १९६८

पत्र-पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित, काव्य गोष्ठियों में शिरकत 

संपर्क-  नादौन, ज़िला हमीरपुर, हिमाचल 

         फ़ोन- 9882892447

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“हमरंग बारह क़िस्से टन्न” लाइव क़िस्सा कहन के लम्बे चले आयोजन के हासिल के रूप में बहुत से साहित्यिक मित्रों से परिचय हुआ और उनमें से कुछ अच्छे दोस्त भी बने हैं। उन्हीं में से एक नाम है कथाकार “शैलेंद्र शर्मा” का । मथुरा से बहुत क़रीब आगरा रहते हुए भी अपरचित रहने का कारण भी उनकी कहानियों से गुजरते हुए समझ में आता है कि आप अपने समय और समाज को इंसानी जज़्बातों के साथ पढ़ते तो हैं किंतु पढ़ाने की  क़थित उग्रता में आपका यक़ीन नहीं है । आपकी कहानी पाठक के भीतर ठीक वैसे ही जगह बनाकर आ बैठती है जैसे वे खुद अपने व्यवहार और बात-चीत की सहजता से किसी के भी दिल में जगह बना लेते हैं । आपकी कहानी के पात्र मिलकर जो समाज गढ़ते हैं उसका ताना-बाना इतनी महीन और सघन बुनाबट के साथ इतनी सहज और सरलता से उतरता है जहां किसी अकल्पनीय बितान का धागा मात्र भी खोज पाना भी मुश्किल होता है । यही कारण है कि आपकी कहानियों में लेखकीय कल्पनाशीलता का ऐसा यथार्थपरक सामंजस्य का सामर्थ्य महज़ किताबी ज्ञान नहीं जान पड़ता बल्कि सामज के गहन विश्लेषण का नतीज़ा है । आज यहाँ प्रस्तुत कहानी ‘अपने भीतर की यात्रा’ आपकी कथा यात्रा से निकली एक ऐसी ही कहानी है जो न महज़ खुद को पढ़वा लेती है बल्कि पाठक को गहरे आत्म चेतन में उतार ले जाकर संवेदना के इंसानी संवेग के साथ जैविक ऊर्जा की ज़मीन के रूप में उपस्थित होती है जो इस कहानी और कहानीकार को ख़ास बनाती है ॰॰॰॰॰॰॰। - संपादक

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