कब ले बीती अमावस के रतिया: कहानी (गीताश्री)

कथा-कहानी कहानी

गीताश्री 670 3/4/2021 10:03:00 AM

"विश्व महिला दिवस" को समर्पित हमरंग की प्रस्तुति "एक कहानी रोज़" 'महिला लेखिकाओं की चुनिंदा कहानी' में आज चौथे दिन प्रस्तुत है "गीताश्री" की कहानी ।  टिप्पणी  हनीफ़ मदार  की  ॰॰॰॰॰ । कहानी पर आप भी अपनी टिप्पणियाँ नीचे कमेंट बॉक्स में ज़रूर करें।

कब ले बीती अमावस के रतिया

बारह साल बाद जैसे उमा कुमारी के भाग्य जगे, वैसे ही सबके जगे। हाईवे के किनारे बसा पूरा गांव चहचहा उठा था।  सबकी जुबां पर यही बात थी। खातोपुर गांव का उत्साह देखते बन रहा था। खुद उम्मी यानी उमा कुमारी के पतिदेव अचंभित थे कि जिस स्त्री को अब तक त्याज्य समझा था, उसे गांव के लोग इतना प्यार कैसे करते हैं। उसे उम्मो के प्रति गांव वालो के प्यार पर उतनी खुशी नहीं हो रही थी जितना अचंभा हो रहा था। वह अपनी शहरी आंखें फाड़ फाड़ कर कभी आधुनिक रंग ढंग में रंग चुकी युवा बीबी को देखे तो कभी ओसारे पर जमा महिला मंडल की औरतों को। सिर्फ औरतें नहीं, उनके आगे कई बच्चे खड़े खड़े, टुकुर टुकुर देखे जाए तमाशा। गाड़ी दरवाजे पर ही खड़ी थी। कोई उससे सवाल नहीं पूछ रहा कि इतने साल कहां रहे। जवान बीवी की खोज खबर क्यों न ली। क्यों लापता रहे कि कोई ढूंढ न सके। जब पता चला तो कहानी बदल चुकी थी। पता चले भी पांच ही साल हुए। उम्मो ने कैसे दिन रैन बिताए, क्या पता। उम्मो के पतिदेव यानी मालभोग ठाकुर जानना भी नहीं चाहते कि उम्मो के दिन रैन कैसे कटे उनके बिना। बस, वे इन दिनों खाली थे, पत्नीविहीन थे। पत्नी उनसे अलग होकर बच्चा समेत दूसरे परिवार में रम चुकी थी। लगभग शहर से गायब थी, जैसे वे खुद गायब हुए थे कभी। उन्हें पहली बार पता लगा था, लापता होने का दर्द पीछे छूट जाने वालो के लिए क्या होता है। अब वे लापता नही रहना चाहते थे और पुराने पते पर लौट जाना चाहते थे जहां कोई अब भी उनकी राह देख रहा था। उन्हें एक औरत की सख्त जरुरत थी जो शहर में उनके खालीपन को भर सके। उनकी देखरेख कर सके, उनका घर संभाल सके। वे इन दिनों नितांत अकेले हो गए थे। तन्हाई काटे नहीं कट रही थी। अकेला घर काट खाने दौड़ता था। स्कूल से निकलने के बाद सीधे कोचिंग सेंटर पहुंच जाते और देर शाम तक का समय वहीं बिताते। रात तो आखिर सबको अपने घर लौटने पर मजबूर कर ही देती है। पहले वे कोचिंग सेंटर में एक घंटा समय देते थे। जब से अकेले हुए हैं, कोचिंग सेंटर में ज्यादा बैच पढ़ाने लगे हैं। कमाई भी अच्छी और वक्त भी अच्छा कट जाता है। घर की याद नहीं रह जाती। लेकिन कब तक. घर तो लौटना ही था।

गीताश्री 

दिनों के बीच में एक रात होती है जो विभाजन करती है। अगले दिन के लिए इंसान को तैयार करती है। एक नई शुरुआत के लिए रात एक स्पेस है जहां से प्रस्थान की भूमिका तैयार होती है। अगली रणनीति की योजना बनती है। रात सिर्फ विश्राम स्थल नहीं, प्रस्थान बिंदू भी है। जहां मालभोग उर्फ मालू  जी तरह तरह की रणनीति बनाया करते हैं। जिंदगी अकेली न कटे, इसकी रणनीति रात में ही बनाते हैं जो सुबह तक ध्वस्त हो जाती है। किसे अपने साथ लें, किससे सलाह करें, हिम्मत नहीं जुटा पाते कि गांव एक बार फोन करके बात ही कर लें। पांच साल से संपर्क बढ़ाना शुरु किया था, जब बेटे ने कहा था - “दादी से मिलना है, गांव कैसे होता है, आपका घर देखना है पापा...”

बेटा अपनी जड़ खोज रहा था और पापा जड़ से कट कर भुरभुरी जमीन पर उग रहे थे। उन्हें कभी अहसास ही न हुआ कि वे जड़विहीन हो चुके हैं और उनके पैरो तले ठोस जमीन नहीं, रेत ही रेत है।

1999  की गरमियों में जो घर छोड़ कर निकले, सो लौटे ही नहीं। एक खत लिख कर सूचित कर दिया कि वे हमेशा के लिए घर छोड़ कर जा रहे हैं। उनकी खोज बेकार है, कभी न लौटेंगे। जब तक वह स्त्री घर में रहेगी, हम पैर न धरेंगे। जवाब के लिए कोलकाता का एक पता भेजा था। उस पते पर गांव से कोई न गया। जाता भी कौन। पिता तो बचपन में ही गुजर गए थे। बची थी केवल मां और एक विवाहित बहन जो यदाकदा मायके की देखभाल बेटे की तरह करती थी। शिक्षिका मां ने जरुर अपने हाथों से खत लिखा- जिसका मजमून इस प्रकार था-

प्रिय बेटा जी

आप हमारे लिए जीवित होते हुए भी मरे हुए के समान हैं। आपने तो हमारी कोख को लज्जित किया है, हमें कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा है, हम आपको अपने जायदाद से भी बेदखल करते हैं और आज से मेरे लिए बेटा की तरह होगी आपकी पत्नी, मेरी बहू जिसे मैं अपनी पसंद से ब्याह लाई हूं...जिसकी वजह से आप घर त्याग कर चले गए। अपनी मां तक का खयाल न रखा। इस बुढापे में मेरा कोई आसरा नहीं है सिवाए बहू के। हम इसके भरोसे जिंदगी काटेंगे। आप जहा रहे, खुश रहें, आबाद रहें...हम सब मर गए आपके लिए।

इस खत के साथ खातोपुर गांव हमेशा के लिए दिल दिमाग से मिट गया। सबकुछ भुला कर मालभोग ने कोलकाता से भी दूर मणिपुर जाकर अपनी जिंदगी शुरु की। गणित में होशियार मालू ने वहां प्राइवेट स्कूल में पढ़ाना शुरु किया और साथ में बी ए की पढ़ाई भी जारी रखी। जो भी फैसला उसने लिया, उसके लिए वह खुद ही तैयार नहीं था। मुजफ्फरपुर में होस्टल में रह कर पढ़ाई करते हुए उसे पता नहीं था कि उसके पीछे गांव में उसकी मां ने उसकी आगामी जिंदगी की पटकथा कुछ इस तरह लिख दी कि उसे सबकुछ छोड़ कर अनजान नगर में बस जाना पड़ा।  

कैसे भूल जाए 1999 की गर्मी छुट्टी को। 15 मई को गांव आया दो महीने के लिए और इधर मां ने बैंड बजवाने की पूरी तैयारी कर ली थी। वह चीखता रहा कि एक बार लड़की से मिलवा दो, मां ने आगे फोटो रख दिया। लड़की का बायोडाटा देखना चाहता था , मां ने चार लाइन की जानकारी आगे धर दी-

लड़की का नाम- उमा कुमारी, जन्म तिथि, शिक्षा- दसवीं पास, रंग- गेंहुआ-गोरा, लंबाई- पांच फीट, गृहकार्य में निपुण. मृदुभाषिणी, लोकगीत से लगाव। व्रत त्योहार में गहरी आस्था।

बायोडाटा देख कर मालू ने माथा ठोक लिया। मां खुद शिक्षिका होकर उसके भाग्य का ऐसा फैसला कैसे कर सकती थीं। वह हैरान था। उसने प्रतिवाद जताना शुरु किया, मां अपना कलेजा पकड़ कर जमीन पर लुढ़क जाती। पूरा घर, पट्टीदार सब हाय हाय करने लगते। लगन के समय में ऐसा अशुभ नाटक करना मालू को शोभा नहीं देता है। सबलोग मालू को कोसने लगते। मालू को अपना भविष्य अंधकारमय दिखता और चुप लगा जाता। इसी माहौल में मालू ब्याह दिए गए उमा कुमारी से। उधर उमा कुमारी को कुछ नहीं पता कि लड़के वालों के घर में क्या चल रहा है। वे तो ब्याह कर आ गई। मड़वा में ही देख लिया था अपने पतिदेव को और निहाल हो गई थी। पतिदेव ने एक बार भी पलट कर बहू का मुंह नहीं देखा। ससुराल में इतनी चुहल होती रही, मुंह दिखाई की रस्म हुई, काहे को मालू जी लट कर देखें। दुल्हे को अतिरिक्त रुप से गंभीर देख कर कुछ लोगो ने कानाफूसी शुरु कर दी थी। मालू के चेहरे से साफ पता चल रहा था कि वे अपनी शादी में नहीं, किसी मातम में शामिल होने आए हैं। उनके मन में क्या चल रहा है, उससे सब अनजान थे। उमा कुमारी ने तो बस एक झलक देखी और उसी छवि में खो गई। उसके पास सपने बुनने का अवकाश था, भविष्य सोचने के लिए पर्याप्त अवसर भी। शादी ब्याह में दुल्हा दुल्हन को छोड़ कर सबके पास बहुत काम होता है। दो तमाशबीन होते हैं जो सारे रिश्तेदारों को नाचते हुए, चहकते हुए देखते हैं और मजे लेते हैं। दोनों की इतनी कद्र होती हैं कि कसम से जीवन में पहली और आखिरी बार वी आई पी होने का अहसास होता है। दोनों अपनी अपनी दिशाओं में खोए हुए थे। दोनों सपने बुन रहे थे, ऊन के गोले और उनके रंग अलग अलग थे। जबकि मर्जी की शादी में एक ही गान बजता है- तेरे मेरे सपने अब एक रंग हैं...। यहां तो रेत पर ताश के महल खड़े होने की नौबत आ गई थी। मालू जी दुल्हन लेकर चले और कोहबर में जाने से पहले ठिठक गए। बहन रास्ता रोकर खड़ी थी।

“बहिन सभ के नेग पहिले चुकइयो हे दुलरुआ भइया

तब जइहो कोहबर आपन...हे दुलरुआ भइया...”

मालू जी ने सोचा...अच्छा मौका है...पॉकेट से सारी सलामी निकाली जो ससुराल में आते वक्त बड़ों के पैर छूने पर मिली थी। जेब से निकाली और सारी की सारी बहन को थमा दी। बहन गदगद और हैरान दोनों। इतना कंजूस भाई तना मेहरबान कैसे. वह संशकित होकर रास्ते से हटी और दुल्हन अंदर, समूची भीड़ अंदर, मालू बाहर से ही खिसक लिए। गर्दन से पीली धोती उतारी और देह पर से पीले अक्षत झाड़ते हुए सीधे दालान पर बैठ गए। वहां बहिन पहले से बैठी हुई जीजा के कान में कुछ कह रही थी...जीजा का चेहरा तन गया। वह सावधान की मुद्रा में उठा और मालू जी से चिपक गया। मालू को ये सब असहज लगा।

मालू ने कहा- “मुझे दिशा के लिए खेत में जाना है...”

जीजा ने कहा- “क्यों, बाहर मर्द वाले लैट्रीन में जाओगे तो कोई दिक्कत ..? तुम्हीं शहरी लोगो के लिए बनवाया गया है साले बाबू....”

“हमको खुले में जाना है...कोई दिक्कत...”

“हां, दिक्कत, दुल्हा खेत में जाएगा...बताओ जरा। हालत देखी है अपनी...जाओ, चापाकल पर नहाओ धोओ पहले...फिर बाहर निकलने लायक लगोगे...”

“हमको आप मत बताइए...बोलते हुए मालू उठे और चौखट पर रखा लोटा उठाया और खेत की तरफ चल पड़े। पीछे पीछे जीजा जी...”

वह हाथ से इशारे करता रहा...लौटने का। जीजा क्यों लौटने लगे। मालू ने आंखें दिखाई तब जाकर जीजा के कदम रुके। वहीं खड़े रहे जहां से घनी झाड़ी नजर आने लगी थी।

उनका इंतजार लंबा खींच गया। वे झाड़ी में झांकने गए। लोटा वैसे ही पड़ा था। मालू हाईवे का रास्ता पकड़ कर कब के दूर निकल चुके थे। गांव की भोर हो चुकी थी। हल्के अंधेरे में ही दुल्हन विदा होकर आई थी। जब तक पूरा गांव जगता, खेत की तरफ शौच के लिए आता, मालू गांव से पार हो चुके थे।

जीजा जी खाली हाथ चिल्लाते हुए लौटे। माथा पीट रहे थे, उनको लोगो ने धरा। आंगन की औरतें बाहर निकल आई। कोहबर में औरतो से घिरी दुल्हन अकेली रह गई थी। उस तक सिर्फ आवाजें , चीख पुकार पहुंच रही थी।

उसके भीतर शोर नहीं, सन्नाटा पसर रहा था जिसके साथ जीवन बिताने का फैसला कर रही थी। भन के गोले बिखर गए थे। सपनों की स्वेटर उधड़ गई थी। उसमें पांव धंस रहे थे और आंखों से बुनाई दिखनी बंद हो गई थी। उसने कोहबर की दीवार पर सिर टिका कर आंख बंद कर लिया।

नींद , गम के मारो के लिए सांत्वना की तरह होती है। सारी रात की जगी उमा कुमारी को नींद आ गई थी।

उसके बाद उसे नींद से मोहब्बत होने लगी थी। जब मौका मिलता, कहीं भी सोने की जगह ढूंढ लेती थी। माहौल सामान्य हो चला था। मायके वाले विदा कराने नहीं आए। सासु मां ने हमेशा के लिए अपने पास रख लिया। उन्हें घर देखने वाली की जरुरत भी थी। उन्हे सहायिका मिल गई थी। बेटे का गम भी खत मिलने के बाद कम हो गया। सलामती की खबर काफी राहत देती है। दोनों अपनी अपनी जिंदगी में रमने लगी थीं।

उमा कुमारी के पास रहने को घर तो था, खाने को अन्न था। सबकुछ जरुरत भर था। सासु मां की तीर्थ यात्राएं बढ़ चली थीं। पैसे की तंगी का रोना बढ़ गया था। उमा कुमारी की देह पर कपड़े जरुरत भर थे। खेत के अन्न और सब्जी से काम चलाने की नसीहते थी। कपड़े खुद सिल कर पहनने की हिदायते थी। स्वेटर खुद बुन कर पहनने का हुकुम था। बाजार पहुंच से बाहर था। सासु मां का जुमला अक्सर उछलता था-

“का पर करुं सिंगार, पिया मोरा आन्हर...”

सिंगार के लिए न पैसे थे, न साधन न मन। न घर के काम कभी खत्म होते थे। मन में छोटी सी इच्छा जग रही थी...कि सासु मां की तरह ही टीचर ट्रेनिंग करके टीचर बन जाए। सरकारी नौकरी की चाहत उसे खींच रही थी। जी जान लगा कर सासु मां की सेवा में खुद को लगा दिया था। उनका हर सितम सहे जाए, कड़वे वचन को हवा में उड़ा दे। सासु मां यानी शशिकला देवी अपनी बहू की सेवा से प्रसन्न रहती थीं और पट्टीदारो के सामने बेटे को कोसती रहती थीं जिसने उनकी पसंद की बहू को अपनाने से इनकार कर दिया था। इस बात को वे अपनी पराजय के रुप में लेती थी। एकाध बार दबी जुबान में किसी रिश्तेदार ने कहा- “लड़की की उम्र ही क्या है, ब्याह क्यों नहीं देती..क्यों मरद के बिना घर में बिठा रखा है...कहीं ऊंच-नीच हो गया तो...”

बड़ी गोतनी ने कहा- “बहू बना कर लाई थी, बेटी बना कर ब्याह दो। कब तक घर पे बिठा कर रखोगी लड़की को...बेटे ने तो छुआ तक नहीं लड़की को...”

शशिकला देवी बुरा मान जातीं।

“अरे...ऐसे कैसे...मेरे घर की इज्जत है, ब्याह कर लाई थी, मरते दम तक यही मेरी बहू रहेगी...चाहे बेटा वापस लौटे न लौटे...”

“अब क्या लौटेगा...मालू की माय, परदेस में बस गया, शादी कर ली, बच्चे हो गए होंगे...तुम भी किस निर्मोही के इंतजार में बैठी हो...”

शशिकला देवी कुपित हो उठतीं। उन्हें लगता कि सब मिल कर उनके बुढ़ापे का सहारा छीनना चाह रहे। जाने क्यों उनको लगता कि एक दिन उनका बेटा लौटेगा और उनकी पसंद को अपना लेगा। पागल है, एक बार देखता तो सही...सुहागरात मना लेता तो कभी ना जा पाता...बहू इतनी भी बुरी नहीं है...सुंदरता का क्या है...जितना संवारो, संवरती है...

उन्हें मलाल रह गया कि बेटे ने बहू को जी भर के न देखा न प्यार किया। और बहू ऐसी कि कभी शिकायत नहीं करती। दिन भर काम में जुती रहती, खाली समय में कुछ कुछ बनाती रहती और सोती रहती। नींद बहुत प्यारी थी उसे। नींद के कारण शशिकला देवी बहुत डांट लगाती थीं। उमा कुमारी को डांट का कोई फर्क नहीं पड़ता था। फर्क तब पड़ता था जब वह नगद रुपये उनसे मांगती और वे कोई बहाना बना कर टाल जाती। दस सवाल पूछतीं। फिर उसने मांगना ही बंद कर दिया। किताबें चाहिए थीं, आगे की पढ़ाई करनी थी। दस काम होते थे जिसके लिए कैश चाहिए। हर रोज नींद में जाने से पहले उपाय सोचती..

दशहरे की छुट्टियां थीं। शशिकला देवी गायत्री परिवार की महिलाओं के साथ हरिद्वार के लिए रवाना हो चुकी थीं। घर में अकेली उमा कुमारी और अन्न पानी। बगल में कुछ पट्टीदार लोग। जिनकी चहल पहल से उसे आश्वस्ति मिलती कि लोग हैं आसपास। मौसम बदलने के कारण आसपास रौनक ज्यादा थी। गांव के पास से ही हाईवे गुजरता है सो बाहर की आबोहवा आती थी। एक दोपहर मचिया पर बैठी बैठी उमा नगद रुपयो के बारे में सोच रही थी। कैसे पैसा आए, कहां से,...सामने बड़ी-सी टोकरी में गेंहू पर नजर पड़ी। मोटा दाना , साफ सुथरा, सोने-सा दमकता हुआ। उमा उठी और बाहर की तरफ दौड़ी। मंगरु लाल बाहर गाय के लिए चारा काट रहा था। उसक बीबी उसके लिए खाना लेकर आई थी । दोनों साथ साथ बैठे किसी बात पर ठिठिया रहे थे। उमा का मन न हुआ कि इस रंग में भंग डाले। कुछ देर खड़ी रही। अपलक दोनों को देखती हूई...उसे नींद की तलब महसूस होने लगी थी। अभी बिस्तर मिलता तो सो जाती...

मंगरु की नजर पड़ गई। उसने अपनी बीबी को भेजा। नींद के झोंके से ऊबर कर उमा कुमारी ने मंगरु की बीवी को अपनी योजना बताई। फिर क्या था। थोड़ी देर में दोनों गावं से निकल कर साप्ताहिक हाट में पहुंच गई थीं। टोकरी का गेंहू अच्छे मोल में बिक गया। हथेली पर रुपया लिए, रिक्शा पर बैठी दोनों स्त्रियां खिलखिलाती हुई चली आ रही थीं। मंगरु ने यह दुश्य देखा, उसे भीतर से राहत मिली। उसने बाद में अपनी बीवी को उमा की दोस्ती में निहाल होते देखा। जब। तक मलकिनी नहीं आ रही हैं, तब तक दोनों खूब घूम लो...आते ही पता चलेगा...मन ही मन बड़बड़ाता मगर टोकता नहीं। जानता था कि यह चार दिन की चांदनी है...उमा के हिस्से फिर अंधेरा ।

दोनों रोज बाजार जातीं, पहले उमा ने रेशमी धागे और सूती कपड़ो से स्टायलिश झोले बनाए, उन्हें बेचा, फिर गुडिया, गुड्डे, मोतियों से छोटे छोटे पर्स बनाएं, सब बाजार में बिकते गए। हेयर बैंड बनाया। जो बनाती, एक दूकानदार सब खरीद लेता। उमा को ऑर्डर मिलने लगे। वह अपने लिए पहली बार सलवार कुर्ता खरीद कर लाई, नाइटी लाई, किताबें, और सिंगार के कुछ सामान। शशिकला देवी ज्यादा दिन वहां रुक गईं। उमा को और आजादी मिली। वह मन ही मन दुआ करती कि कुछ समय और न आएं। उसने अपने पुराने कपड़ो को मिलाकर रंगीन धागे से सूजनी बनाया, वो तो गांव के लोग ही हाथोहाथ खरीद ले गए। उमा के हुनर की खुशबू दूर दूर तक फैलने लगी थी। शशिकला देवी लौटी तो झटका खा गईं। जिस उमा को छोड़ कर गई थीं वो तो नहीं मिली उन्हें। जो उमा मिली वो उन्हें गंवारा नहीं हुई। बहुत कलह हुआ और अंत में एक घर को दो स्त्रियों ने मिल कर आपस में बांट लिया। शशिकला देवी का बस चलता तो घर से निकाल देतीं। लेकिन तब तक उमा का पट्टीदारों में और आसपास बहुत समर्थक हो गए थे जो अकेली शशिकला देवी पर भारी पड़ गए थे। शशिकला देवी लोकोक्तियों के लिए मशहूर थीं। पट्टीदार पहले से खफा थे, उन्हें मौका मिल गया। क्योंकि शशिकला अक्सर कहा करती- “दाल और पट्टीदार जितना गले, उतना अच्छा।“

अब पट्टीदारो ने कहा- “न तुम्हारी दाल गलेगी न हम पट्टीदार। गलोगी तुम। सब गए छोड़ कर, बहू भी गई। देखते हैं, बेटी कितने दिन देखरेख करेगी।“

इस प्रकार से दो स्त्रियों में पहली बार विभाजन देखा गया। उमा ने अपने काम के साथ गांव की पांच स्त्रियों को जोर लिया था। अब उसे नींद कम आने लगी थी। काम और पढ़ाई से फुरसत कहां। उसका घर हस्तकला का छोटा मोटा सेंटर बन गया था। हाईवे से गुजरने वाले टूरिस्ट को ढाबे वाले इस घर की तरफ भेज देते थे। जो आता, बिना कुछ खरीदे नहीं जा पाता।

दिन कट रहे थे। कई साल बीत गए। उमा ने काम को ज्यादा नहीं बढ़ाया। उसे तो सरकारी नौकरी में जाना था। उसी दिशा में आगे बढ़ रही थी। अपने साथ साथ पांच और औरतो को रोजगार दिलवा दिया था। खुद पढ़ाई में और ट्रेनिंग में व्यस्त। शशिकला देवी ताना मारतीं – “किसके नाम का सिंदूर लगा रखा है। मिटाती क्यों नहीं, मेरा बेटा गया तुम्हारे हाथ से। उसका घर बस गया। वह कभी नहीं लौटेगा। मैं भी उसी के पास चली जाऊंगी...यहा का सब बेचबाच दूंगी...देखती हूं फिर कौन तुम्हे संपत्ति में हिस्सा दिलवाता है...चली क्यों नहीं जाती ये गांव छोड़ कर...क्या रखा है यहां...?”

उमा ने कभी पलट कर जवाब नहीं दिया था। पहले रो धो कर रह जाती या नींद लेने चली जाती। अब सुनकर मुस्कुरा देती है। काम में लग जाती है। शशिकला के सारे वार खाली चले जाते। उमा ने हमेशा सिंदूर, बिंदी लगाई। एकाध बार उसकी सहेली रुपा ने टोका भी...

उमा ने जवाब दिया- “तू अपने समाज को नहीं जानती...अभी तो नाम के लिए पति है न, जिस दिन यह निशानी भी मिटा दी, सब मेरा क्या हाल करेंगे...मैं गांव के इसी घर में इसीलिए पड़ी हूं कि पति का घर तो है...मैं अकेली छोटे शहर में कैसे जी पाऊंगी...सोच जरा...कोई मरद तो चाहिए न साथ. न भाई है न बाप...सबने मुझे मरने के लिए यहां छोड़ दिया, मैं कैसे खुद को मरने दूं...मैं मरने तक जिंदा रहना चाहती हूं, वो भी अपने हिसाब से...किसी पर बोझ नहीं बनना चाहती...जो किस्मत में था, वो तो हो गया, मैं अपनी किस्मत बदल नहीं सकती, खुद को बदल सकती थी, बदल दिया, अब चलने दे...देखा जाएगा...जिंदगी पूरी पड़ी है...नौकरी हो गई तो यहां से चली जाऊंगी...उसके पहले नहीं।“

“कब ले बीती अमावस के रतिया...”

रुपा चुहल करती.

“अरे… बीत जाएगी सखि...कोई अमावस इतनी लंबी नहीं होती कि अंजोरिया रात को रोक ले...”

उसी टोन में जवाब देती उमा।

दोनों हंस पड़ती एक साथ। रुपा के साथ चुहल के पल खूब मिलते थे। सुख-दुख के बीच भी दोनों चुहल कर लेती थीं।

“और सिंदूर कब तक लगाएगी...?”

उमा के सिंदूर पर ऊंगली धरते हुए पूछा था।

“एक बार मुझे उनसे मिलना है रुपा...एकबार...फिर ...”

“जब तक तू सिंदूर लगाएगी, कोई और मरद तेरी तरफ ताकेगा भी नहीं...ऐसे ही जीवन गुजारेगी क्या...?”

उमा को ऐसी बातों पर फिर से नींद आने लगती थी...लंबी नींद...जिसमें अपने लिए वह सुकुन ढूंढा करती थी। नींद की पनाह उसके लिए कितनी जरुरी थी। नींद उसके लिए वह नदी थी जिसमें तैर कर दुख से दूर जा सकती थी। नींद में पानी ही पानी और उसमें डूबती उतराती उमा। कभी नदी, कभी झील, कभी पानी में डूबे खेत...कोसी नदी मानो खेतो में घुस आई हो...उस पानी में देखती हरी भरी फसलें सीधी खड़ी होने के बजाय पानी पर सो जाती थी...अधलेटी-सी...

उमा की पनीली नींद हमेशा कर्कश आवाजों से खुलती थी। पूरा शरीर गीला होता था। जाने नींद भिगोती थी या पसीना होता था। गरम सपनों के भाप से भी तो भींग जाते हैं हम।

ऐसे जाने कितने बरस बीते। उमा ने बरस नहीं युग गिने। उम्र नहीं गिने, जिंदगी के दिन गिने। बारह सालो के संघर्ष ने उसे 32 साल की उम्र में चालीस पार का बना दिया था। इस बीच पति की तरफ कोई संपर्क की कोशिश न हुई, न कोई खत आया। उमा ने अपने मोबाइल नंबर को हवा की तरह दूर दूर तक फैला दिया था। नौकरी के इंतजार में बेहाल हो गई थी। वैकेंसी निकलता तो आवेदन करती। कहीं न कहीं कोई विवाद खड़ा हो जाता, फिर रुक जाती बहाली। समस्तीपुर, कोचिंग सेंटर के अधेड़ मालिक द्रुमदल सिंह उमा के लिए वैकेंसी पर खास नजर रखते थे। दिल से उसकी मदद करना चाहते थे। उनका मानना था कि औरतों के लिए टीचिंग जॉब सबसे बेहतर और सुरक्षित होता है। वे ग्रामीण पृष्ठभूमि की लड़कियों, औरतों को यही समझाते थे। उन्हें सारी जानकारी मुहैय्या कराते थे। उमा को उनके रुप में एक बड़ा सहारा मिल गया था। उमा को किसी भी दिन अप्वाइंटमेंट लेटर का इंतजार था।

आंगन में अपनी हस्तकला टीम के साथ बैठी उमा गप्पे मार रही थी। इस महीने एक एन जी ओ ने अलग तरह के कलात्मक झोला बनाने का बड़ा ऑर्डर दिया था। सभी लगी पड़ी थीं जी जान से। रेशमी और सूती धागो का संसार आंगन में फैला पड़ा था। टीम में शोभा पैचवर्क का काम अच्छा कर लेती थी सो एन जी ओ का लोगो बनाने में व्यस्त थी। यह स्त्रियों का साझा संसार था जहां सबके चेहरे पर स्वाभिमान का नूर टपकता था। तभी बाहर से कुछ शोर सुनाई पड़ा। कोई गाड़ी रुकी थी। सबसे पहले

आंगन में शशिकला देवी दाखिल हुईं, साथ में रिश्ते की औरतें। सबके चेहरे खिले हुए। उमा से अलग बात करना चाहती थीं। उमा ने हैरान होकर देखा।  कई साल बाद उसकी तरफ कदम धरा और उससे बात कर रही हैं। पिछले कुछ सालो में तो उमा के मरने जीने की खबर भी न ली। न उमा को अपनी तरफ फटकने दिया। ऐसी दीवार खींच दी थी कि दोनों उसके पार नहीं देख पा रही थीं। उमा चकित होती हुई उनके पास गई। शशिकला देवी को सुनते हुए उमा के चेहरे का रंग पल पल बदल रहा था। कोई एक रंग टिकता न था। सारी औरते काम छोड़ कर बाहर निकल गईं। बाहर पहले से ही काफी लोग जमा थे। वहां तरह तरह की सरगोशियां सुनाई दे रही थीं। औरतें मुंह पर हाथ रखें बोले कि उमा के भाग जग गए। ऐसे ही सबके जगे। बारह साल बाद आदमी लौट आया। उमा की तपस्या रंग लाई...मां का बेटा लौट आया..अब सब ठीक हो जाएगा...बड़ा दुख देखी हैं सास बहू...अब सब मिल जुल कर रहे...और क्या चाहिए...

बाहर कुर्सी पर बैठा मालू बेचैनी से पहलू बदल रहा था। निगाह आंगन की तरफ थी। वह पहले सीधे आंगन में आना चाहता था लेकिन मां ने रोक दिया था। शशिकला देवी खुद को फिर से बीच में रखने की ख्वाहिशमंद थी। आखिर इस बहू को ब्याह कर तो वही लाई थीं। सीधे बेटे को डील करने कैसे दें, कहीं दोने मिल गए तो उनका क्या होगा। बड़ी मुश्किल से तो बेटा लौटा है, बहू को अपनाना चाहता है। उनके कलेजे पर रखा पत्थर हट गया था। गायत्री मंत्र का जाप करती हुई वे उमा से बात करने घुसी थी।   

उमा ने उनकी पूरी बात सुन ली। उसकी आंखें बार बार छलक रही थीं। मन हुआ, सारा गुस्सा , मान सम्मान झटक कर दौड़ जाए, बांहों में झूल जाए...खूब लड़े, खूब बोले...एक जमाना बीत गया, पूरे जमाने की बात कह ले...वो सारी चिट्ठियां जो बिन पते के लिखी थीं, उन्हें पढ़वा दे।

उससे बाहर न जाया गया। बाहर की भीड़ उसे अच्छी नहीं लग रही थी। उसने शशिकला को धीरे से कहा-

“उनको अंदर भेज दीजिए। आप लोग जाइए...हम अकेले में बात करना चाहते हैं...”

मालू को इसी पल का इंतजार था। पल भर में वह उमा को बाहों में घेरे हुए खड़ा था। भीड़ बाहर दुआएं पढ़ रही थी।

उमा से कुछ न कहा गया....फफक कर रो पड़ी। मालू की बातें उसे सुनाई दे रही थी...

पूरे एक युग की कथा वह उसी पल में बता देना चाहता था। अपने भागने की कथा से लेकर वापस आने तक की कथा। जबरिया ब्याह ने उसके भीतर गुस्सा भर दिया था। घरवालो से बदला लेने के लिए उसने ऐसा किया...अपने हर गुनाह को वह कबूलता गया...मणिपुर में अपनी शादी की बात, फिर बच्चा...फिर पत्नी से मनमुटाव...फिर पत्नी का बच्चा समेत घर छोड़ कर चला जाना...बिना बताए...जाने कहां...कोई क्लू नहीं मिल रहा है...

एक बार भी ये नहीं कह पाया मालू कि उसे कभी एकांत में उमा की याद आई। जमाने की उस कथा में कहीं जिक्र न था उमा का।

उमा ने गला साफ करके मुलायम आवाज में पूछा- “अब क्यों आएं हैं ? मुझसे क्या चाहते हैं ?”

“अरे, मां ने बताया नहीं क्या...”, मालू झुंझलाया।

“हमें आपसे जानना है...”

“तुम साथ चलोगी न, हम कोलकाता शिफ्ट कर गए हैं, मणिपुर हमेशा के लिए छोड़ दिया है...तुम्हारे साथ नयी जिंदगी शुरु करना चाहता हूं...मेरे साथ चलो...”

“आपने जो मेरे साथ किया, उस पर शर्मिंदा हैं आप...? हमसे माफी मांगिएगा, सबके सामने...गांव वालों के सामने...अपनी मां के सामने...लिखित दीजिएगा कि हमसे ये ये गलती हुई और आगे फिर कभी नहीं करेंगे ऐसा ?”

“ मेरा जीवन था, मुझे हक था अपने हिसाब से फैसला लेने का, लेकिन तुम्हें लगता है, मैंने गलती की तो गलती तो हुई उमा...लेकिन माफी क्यों...पति पत्नी में एतना कहीं लिखत पढ़त होता है, तुम कोर्ट हो क्या..? कैसी बातें करती हो...?”

“आप मेरी वो रातें, वो मेरा इंतजार, मेरा सम्मान लौटा देंगे...”

“पूरी कोशिश करेंगे...”

अपना तपता हुआ गाल मालू ने उमा के गाल से सटाना चाहा....

उमा पीछे हटी। हाथ से उसके चेहरे को दूर किया।

“आपकी जिंदगी थी, आपने फैसला किया, मेरी जिंदगी तबाह कर दी...एक बार भी सोचा नहीं, कोई अपराध बोध भी नहीं आपको ? आपको सबकुछ कितना आसान लग रहा है न मालू बाबू ?”

उमा के मुंह से मालू बाबू सुन कर मालू को अजीब-सा लगा। वह तो एक ग्रामीण , देहाती पत्नी की उम्मीद में आया था जिसे लेकर उसकी अलग राय थी। जिसमें एक राय ये भी थी कि देहाती पत्नियां ज्यादा टिकाऊ होती हैं।

“उमा कुमारी ठाकुर....चलिए अब चलने की तैयारि करिए...मां से बात हो गई है, गांव वाले भी सब बहुत खुश...सब आपकी तारीफ कर रहे थे। गांव वालो पर तो तुमने जादू कर दिया है...”

“अगर मैं न जाना चाहूं तो...?”

“तो मैं तीसरी शादी कर लूंगा...मत जाओ...मुझे पत्नी चाहिए...औरत चाहिए...मुझे घर बसाना है...अकेले जीवन नहीं काटना है...वंश चलाना नहीं है क्या..? .एकलौता बेटा हूं खानदान का. दामोदर ठाकुर का बेटा मालभोग ठाकुर नि:संतान नहीं मरेगा उमा देवी...समझीं...चलिए...अब तक आप मेरे घर में हैं, मेरी पत्नी के रुप में...आप पर मेरा हक बनता है...मर्जी से नहीं जाएंगी तो जबरन ले जाऊंगा...जब तक साथ नहीं चलती, मैं यहां रहूंगा...”

मालू गुस्से में कांप रहा था। वह इतने साल बाद लौटा है और पत्नी स्वागत करने के बजाय बहस तलब कर रही है।

बाहर तक मालू का चीखना पहुंच गया था। बाहर खड़ी भीड़ के सुर बदल गए थे।

“ऐसे कोई करता है क्या, इतने दिन बाद भाग जगे हैं, अब तो सुख के दिन आए हैं, क्यों नखरे कर रही है...?”

शशिकला देवी की आवाज – “चार पैसे क्या कमाने लगी, चार अक्षर क्या पढ़ लिए, दिमाग खराब हो गया है इस औरत का...जाना तो पड़ेगा चाहे थाना सिपाही करना पड़े...”

उमा ने मालू को घर से निकल जाने का इशारा किया। वह बौखलाया हुआ पलटा। मन हुआ एक तेज झापड़ लगा दे और झोंटा घसीट कर गाड़ी में बिठा ले। शशिकला देवी किसी से थानेदार को बुलाने की बात कर रही थीं।

बाहर ये सब चल रहा था कि उमा अपने हाथ का बनाया हुआ कलात्मक झोला लिए हुए बाहर निकली। क्रीम कलर का दुपट्टा ओढ़ा जिस पर अपने हाथों से मिथिला पेंटिंग बनाई थी।

 “श्रीमान मालभोग ठाकुर...आप अपने नाम के अनुसार ही बहुत घटिया इनसान हैं। जाने क्या सोच कर आपका नाम आपके खानदान ने रखा। नाम का बहुते असर होता है इनसान पर। हम औरतें आपके लिए माल नहीं हैं कि एक से मन भर गया तो दूसरी को भोगने आ गए।“

“मुझे खेद है कि अब तक आपके घर में रही, पत्नी की तरह...यह कैद मेरी चुनी हुई थी, आज से आजादी भी मेरा चयन। आपका घर, आपकी पहचान, सुहाग के चिन्ह जिन्हें मैने कर्तव्य समझ कर ढोया, ये सब यहीं छोड़ कर जा रही हूं...संभालिए...”

“थाना सिपाही आप क्यों बुलाएंगी, अम्मा जी...हमीं बुला देते हैं...हम बच्चे नहीं, पुलिस जानती हैं कि एक युग के बाद रिश्ता अपने आप खत्म हो जाता है...हमारे गांव में तो बारह साल बाद गायब आदमी को मरा हुआ मान कर श्राद्ध भी कर देने का रिवाज है, यकीन न हो तो पंडित जी को बुला कर पूछ लीजिएगा।”

तनाव से उमा कंपकंपा रही थी। कांपते हाथों से उसने झोले से अपना मोबाइल निकाला कि मोबाइल बज उठा। मंगरु की पत्नी पीछे आ खड़ी हुई थी। उमा ने उसको आदेश दिया- “घर खाली कर दो, काम का सारा सामान अपने यहां से ले जा...हम अपना घर बनाएंगे।“

मंगरु की बीवी काम में जुट गई। पैर पटकता हुआ मालू बाहर की तरफ जाकर जोर जोर से चीखने लगा था। उमा बेपरवाह, मोबाइल पर बात करती हुई सधे कदमों से सड़क की तरफ बढ़ी। गहरे तनाव में थी मगर पहली बार उसे नींद की तलब महसूस नहीं हो रही थी।

 

कहानी पर 'हनीफ़ मदार' की टिप्पणी -

बस रात के बाद सबेरा है॰॰॰

गीताश्री की कहानियाँ सीधी सपाट और शांत नहीं चलतीं बल्कि वे किसी बल खाती नदी की तरह बहती हैं जो अपने भीतर के असंतोष और अपने स्वतंत्र वहाब को अवरुद्ध करती  सामाजिक बेड़ियों को अपनी तेज लहरों से धकियाते हुए किनारे पटक आगे बढ़ती है । वे लहरें जो बाहरी तौर पर सूरज की किरणों से चमकती हुई नदी की खिलखिलाहट प्रतीत होतीं हैं जबकि वे अपने अवरोधों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध से भरीं होतीं हैं । कल-कल कर अपने मुक्ति संघर्ष के संगीत के साथ अपना पथ प्रसश्त करती हर नदी मानो दुनिया की तमाम नदियों का प्रतिनिधित्व कर रही होती है । हालाँकि पुरुषप्रधान सत्ता और समाज इसे स्वीकारने को तब भी तैयार नहीं होता जब इनके आक्रोश के समक्ष वह इतना निरीह पाता है कि अपना सब कुछ लुटा बैठता है । शायद यही सत्तात्मक अहमन्यता है । गीताश्री की अधिकतर कहानियों को इसी तरीक़े से व्याख्यायित किया जा सकता है किंतु यहाँ प्रस्तुत कहानी ‘कब ले बीती अमावस के रतिया’ के संदर्भ में यह वाक्य एकदम सटीक है ।