फैसला: कहानी (मैत्रेयी पुष्पा)

कथा-कहानी कहानी

मैत्रेयी पुष्पा 141 12/3/2021 11:12:00 AM

संटी उठाकर जोर से बोलने लगी,  सब जनी सुनो, सुन लो कान खोल कें! बरोबरी का जमाना आ गया। अब ठठरी बंधे मरद माराकूटी करें, गारी-गरौज दें, मायके न भेजें, पीहर से रुपइया-पइसा मंगवावें, क्या कहते हैं कि दायजे के पीछें सतावें, तो बैन सूधी चली जाना बसुमती के ढिंग।

लिखवा देना कागद। करवा देना नठुओं के जेहल।

फैसला

आदरणीय मास्साब,

सादर प्रणाम!

शायद आपने सुन लिया हो। न सुना होगा तो सुन लेंगे। मेरा पत्र तो आज से तीन दिन बाद मिल पाएगा आपको।

चुनाव परिणाम घोषित हो गया।

न जाने कैसे घटित हो गया ऐसा?

‘आज भी ठीक उस दिन की तरह चकित रह गई मैं, जैसे जब रह गई थी, अपनी जीत के दिन। कभी सोचा न था कि मैं प्रधान-पद के लिए चुनी जा सकती हूं।‘

‘कैसे मिल गए इतने वोट?’

‘गांव में पार्टीबंदी थी। विरोध था। फिर ...?’

‘बाद में कारण समझ में आ गया था, जब मैंने सारी औरतों को एक ही भाव से आींदित देखा। उमंगों-तरंगों का भीतरी आलोड़न चेहरों पर झलक रहा था।‘

‘ब्लाक प्रमुख की पत्नी होने के नाते घर-घर जाकर अपनी बहनों का धन्यवाद करना जब संभव नहीं हो सका तो मैं ‘पथनवारे’ में जा पहुंची।‘

‘आप जानते तो हैं कि हर गांव में पथनवारा एक तरह से महिला बैठकी का सुरक्षित स्थान होता है। गोबर-मिट्टी से सने हाथों, कंडा थापते समय, औरतें अकसर आपबीती भी एक-दूसरे को सुना लेती हैं।‘

‘हमारे सुख-दुःखों की सर्वसाक्षी है यह जगह।‘

‘वैसे मेरा पथनवारे में जाना अब शोभनीय नहीं माना जाता।‘

‘रनवीर ने पहले ही कह दिया था कि गांव की अन्य औरतों की तरह अब तुम सिर पर डलिया-तसला धरे नहीं सोहतीं। आखिर प्रधान की पत्नी हो।‘

वे प्रमुख बने तो बंदिशों में कुछ और कसावट आ गई। और जब मैं स्वयं प्रधान बन गई तो उनकी प्रतिष्ठा कई-कई गुना ऊंचे चढ़ गई।

वे उदार और आधुनिक व्यक्तित्व के स्वामी माने जाने लगे। अन्य गांवों की निगाहों में हमारा गांव अधिक ऊंचा हो गया। और मैं गांव की औरतों से दूरी बनाए रखने की हिदायत तले दबने लगी।

पर मेरा मन नहीं मानता था, किसी न किसी बहाने पहुंच ही जाती उन लोगों के बीच।

रनवीर कहते थे, अभी तुम्हारी राजनीतिक उम्र कम है, वसुमती!परिपक्वता आएगी तो स्वयं चल निकलोगी मान-सम्मान बचाकर।

ईसुरिया बकरियों का रेवड़ हांकती हुई उधर ही आ निकली थी, आप जानते होंगे, मैंने जिक्र तो किया था उसका कि वह कितनी निश्छल, कितनी मुखर है।

यह भी बताया था कि मैं और वह इस गांव में एक दिन ही ब्याहकर आए थे।

आप हंस पड़े थे मास्साब, यह कहते हुए कि नेह भी लगाया तो गड़रिया की बहू से! वाह वसुमती!

बड़ी चौचीती नजर है उसकी। जब तक मैंने घूंघट उलटकर गांव के रूख-पेड़ों, घर-मकानों, गली-मोहल्लों को निहारा ही था, तब तक उसने हर द्वार-देहरी की पहचान कर ली। हर आदमी को नाप-जोख लिया। शरमाना-सकुचाना नहीं है न उसके स्वभाव में।

गांव के बड़े-बुजुर्गों के नाम इस तरह लेती है, जैसे वह उनकी पुरखिन हो। ऊंच-नीच, नाते-रिश्ते, जात-कुजात के आडंबरों से सर्वथा मुक्त है।

वह खड़ी-खड़ी आवाज मारने लगी, ओ बसुमतिया...! रन्ना की! रनवीर की दुलहन! ओ पिरमुखिनी!

सब हंस पड़ीं।

बोलीं, वसुमती, लो आ गई सबकी अम्मां दादी! टेर रही हैं तुम्हें। हुंकारा दो प्रधान जी!

वह हाथ में पकड़ी पतली संटी फटकारती, बकरियों को पिछियाती हुई हमारे पास ही आ गई।

झमककर बोली, पिरधान हो गईं अब तौ! चलो सुख हो गया।

किसी ने खास ध्यान नहीं दिया।

संटी उठाकर जोर से बोलने लगी,  सब जनी सुनो, सुन लो कान खोल कें! बरोबरी का जमाना आ गया। अब ठठरी बंधे मरद माराकूटी करें, गारी-गरौज दें, मायके न भेजें, पीहर से रुपइया-पइसा मंगवावें, क्या कहते हैं कि दायजे के पीछें सतावें, तो बैन सूधी चली जाना बसुमती के ढिंग।

लिखवा देना कागद।

 करवा देना नठुओं के जेहल।

 ओ बसुमतिया! तू रनवीरा की तरह अन्याय तो नहीं करेगी? कागद दाब तो नहीं लेगी?

सलिगा ने हमारे हाथ-पांव तोरे, तो हमने लीलो के लड़का से तुरंत कागद लिखवाया था कि सिरकार दरबार हमारी गुहार सुनें।

रनवीर को हमने खुद पकड़ाया था जाकर।

उन दिनों सलिगा हल-हल कांपने लगा था। हाथ तो क्या, उलटी-सूधी जुबान तक नहीं बोल पाया कई दिनों तक। हमारे जानें रन्ना ने कागद दाब लिया, सलिगा सेर बनकें चढ़ा आया छाती पर।

बोला, ‘जेहल करा रही थी हमारी? हत्यारी, हमने भी सोच लई है कि चाहे दो बकरियां बेंचनी पड़ें, पर तेरे कागद की ऐसी-तैसी...’

संटी फेंककर ईसुरिया ने अपनी बांहें फैला दीं। सलूका उघाड़ दिया, गहरी खरांचों और घावों को देखकर सखियों के होंठ उदास हो गए। खिलते चेहरों पर पाला पड़ गया, मास्साब! हंसी-दिल्लगी ठिठुरकर ठूंठ हो गई!

गोपी ने हंसने का उपक्रम किया।

मुस्कराने का अभिनय करती हुई बोली, क्या बक रही है तू? कोई सुन लेगा तो कह न देगा पिरमुख जी से?

वह तुरंत दयनीयता से उभर आई।

 सुन ले! सुनाने के लिए ही कह रहे हैं हम। रनवीर एक दिन चाखी पीसेगा, रोटी थापेगा। और हमारी बसुमती, कागद लिखेगी, हुकुम चलाएगी, राज करेगी।

 है न बसुमती?

 सांची कहना, तू ग्यारह किलास पढ़ी है न? और रनवीर नौ फेल? बताओ कौन हुसियार हुआ?

अब दिन गए कि जनी गूंगी-बहरी छिरिया-बकरिया की नाई हंकती रहे। बरोबरी का जमाना ठहरा। पिरधान बन गई न बसुमती? इन्द्रा गांधी का राज है। बोलो इन्द्रा गांधी की जै।

गोपी डपटने लगी, सिर्रिन, इन्द्रा गांधी तो कब की मर चुकीं। राजीव गांधी का राज है।

मर गईं?

 चलो, तो भी क्या हुआ। मतारी-बेटा में कोई भेद होता है सो? एक ही बात ठहरी।

क्यों जी, झल्लूस कब निकलेगा?  उसे सहसा याद हो पड़ा।

रन्ना पिरधान बना था तब कैसी रौनक लगी थी। माला पहराई थीं। झंडा लेकर चले थे लोग। रन्ना ने तो कंधा-कंधा चढ़कें परिकम्मा की थी गांव की?

सरूपी ने उसे फ़िर समझाया, ओ बौड़म रन्ना-रन्ना करे जा रही है? पिरमुख जी सबसे पहले तेरी जेहल कराएंगे।

उसने लापरवाही से सिर झटका, लो, सुन लो सरूपिया की बातें! रन्ना क्या, तेरा ससुर गजराज भी नहीं कर सकता हमारी जेहल। तेरा जेठ पन्ना भी नहीं कर सकता। है न बसुमती!

झुंड में से कोई बोल पड़ी, काहे को मुंह लगती हो इस सरग-पताल के। ओ ईसुरिया, तेरी छिरियां, वे निकल गईं खेत में।

ओ मोरी दइया...! वह संटी फटकारती दौड़ने लगी।

 

सवेरे की घाम रसोई के ओटले पर रही होगी। चूल्हा जलाकर मैंने तवा रखा ही था। हाथ आटे में सने थे।

कोई छाया-सी द्वार पर दिखी।

सही अनुमान लगाती, तब तक तो आवाज आने लगी, ओ बसुमती! बसुमतिया!

ईसुरिया थी।

पंच्याती चौंतरे पर दुरगा बैठा है! पन्ना देख रहा है! तेरी सां बसुमती, सारे पंच तेरी परतिच्छा में! वह खुशी से खिल रही थी।

मैंने तुरंत कुसुमा को बुलाया। वह बोली, तुम जाओ भाभी, हम बना देंगे रोटी।

सभा में जाने लगी तो औरतें किवाड़ों की झिरी से झांकने लगीं। शायद यह देखने के लिए कि मैं घूंघट डालकर जा रही हूं या परदा त्यागकर।

माथे तक साड़ी का किनारा। न घूंघट था, न खुला चेहरा।

रास्ते में गोपी मिल गई। ईसुरिया को छेड़ने लगी, बसुमती भाभी तो सभा में जा रही हैं, तू कहां जा रही है ईसुरिया?

वह तमक गई, चल! गोपिया की बच्ची! हम बसुमती के सेकटरी ठहरे। सभा में जा रहे हैं। पंचों को टोकते नहीं हैं।

छिरियां कहां गईं आज?

छिरियां चराने सलिगा चला गया। जान गया अब, कि मरद और औरत बरोबर हो गए, बेटा, अब चलो छिरियां चुगाने।

हम चबूतरे के समीप पहुंचने ही वाले थे कि रनवीर आते दिखाई देते।

वे लपकते कदमों से हमारे पास आकर रुके। मुख पर आश्चर्य की रेखाएं थीं और नाक तथा होंठ कठोर मुद्रा में अकड़े हुए।

बोले, कहां?

उत्तर ईसुरिया ने दिया, पिरमुख जी, हम पंचायत में जा रहे हैं। अगाई छोड़ो। रास्ता दो।

उसके कहे वाक्यों को सुनकर वे मुझसे मुखातिब हुए, घर चलो तुम।

ईसुरिया मुंह बाए खड़ी रह गई। कुछ ही क्षणों में संभलकर बोली, टोका-टाकी न करो पिरमुख जी! चलने दो हमें।

रनवीर की त्योरियां झुलस आईं।

सुन नहीं रहीं बसुमती तुम?

उनकी आग्नेय दृष्टि मेरे पांवों को जलाने लगीं। उमंग गतिहीन हो गई।

ईसुरिया अड़ी खड़ी थी। उसकी ओर मैंने समझदार संकेत किया कि लौट चलने में ही मंगल है।

उसने मुझे विचित्र भाव से घूरा और विवश भाव से मेरे पीछे-पीछे खिचड़ आई।

लौटकर मैं बरतन समेटने लगी। कुसुमा के अनकहे प्रश्नों का उत्तर मेरे पास नहीं था। घुटन ज्यों की त्यों ठहरी हुई थी सीने में।

ईसुरिया आंगन में बैठी बड़बड़ा रही थी, लो, हद्द हो गई कि नहीं? हौदा पर तो बसुमती और राज करे रनवीर! अरे, अपनी पिरमुखी संभारें। पिरधानी से अब इन्हें क्या मतलब?

कुसुमा से नहीं रहा गया, मतबल कैसे नहीं है? रामकिसुन कुम्हार से रुपइया वसूल करने हैं। बनीसिंह को बचन दे रखा होगा। भाभी जाती तो क्या मालूम उलटा हो जाता पफैसला।

बेचारे रामकिसुन ने छान-छप्पर के कारण अपना बैल बेच डाला था कि बिन छत के कैसे रहे चौड़े में। बनीसिंह राच्छत, पहले तो बैल खरीद ले गया और खलिहान उठाते ही आ गया लौटाने। कहता है यह मरघिल्ला बैल उसे नहीं चाहिए। लौटाओ रुपइया।

अब कहां से आवें रुपइया? छान बेच दे क्या? छान बिकती है क्या? कौन करे न्याय?

रनवीर तो गरीब को ही मारेंगे। तुम चली जातीं तो बच जाता कुम्हार का।

ईसुरिया भारी कदमों से लौट गई अपने घर।

मास्साब, मेरी आत्मा में किरचें चुभती रह गईं।

लौटकर रनवीर ने खूब समझाया था, पंचायती चबूतरे पर बैठती तुम शोभा देती हो? लाज-लिहाज मत उतारो। कुल-परंपरा का खयाल भी नहीं रहा तुम्हें? औरत की गरिमा आढ़-मर्यादा से ही है। फ़िर तुम क्या जानो गांव में कैसे-कैसे धूर्त हैं?

उस दिन के बाद पंचायती चबूतरे से प्रधान की टेर निरंतर उठती रही। लोग जानते थे कि रनवीर इस बात को पसंद नहीं करते, फ़िर भी बुलाने चले आते।

मैं ही पस्तहिम्मत थी या कि पति की प्रतिछाया मेरे भीतर निवास करती थी, देहरी उलांघते ही कोई बरजने लगता, हम हैं तो सही। अब तक भी तो करते रहे हैं। तुम्हें क्या जरूरत है बाहर आने की?

उत्तर में मन उपफनता। आक्रोश के सवाल की सीमा तक होंठ खुलते, मगर पत्नी होने के नाते सब कुछ सिराने लगता। दूध के झाग-सा बैठ जाता विरोध।

मास्साब, मैंने कितने दिनों तक सोचा था कि दस्तखत नहीं करूंगी। करने दो मनमानी।

रनवीर रजिस्टर लिए चारपाई पर बैठे थे। मैं कामों में उलझी थी। सवेरे का समय वैसे भी खाने-पीने से लेकर दूध-घी की सार-संभाल में निकल जाता है, ऊपर से मईदारों का कलेऊ-पानी।

वे आवाज दे चुके थे, शायद कई बार।

मैं फिर भी खाली नहीं हुई।

सुनो, मैं लिखत-पढ़त कब का निबटा चुका, तुम्हें दस्तखत करने का समय नहीं?

मैं नहीं पहुंची।

वे झल्ला उठे, कब तक बैठा रहूं? ब्लाक पहुंचना है मुझे। एक हफ्ते से घुमा रही हो।

धोती के पल्ले से हाथ पोंछती पहुंच गई मैं। उनके निकट जा खड़ी हुई।

लो, करो दस्तखत, उन्होंने खुला पेन पकड़ा दिया।

तुम सोच क्या रही हो? अभी तक तो बीस बार कर चुकी होती।

मैंने खुला पेन बंद कर दिया।

आंखों में सवाल का जंगल उग आया। भटकती रही मैं। क्या रनवीर उबार नहीं सकते मुझे? आसपास से नुकीले कांटे यों ही छेदते रहेंगे?

रनवीर इसी तरह चले होंगे अपने प्रधान काल में, या किसी दूसरी तरह। पूछना तो चाहिए न, शायद कोई मार्ग...

रनवीर?

वे मुख खोले देखते रहे।

मजूर आए थे मेरे पास, कहते थे कि अभी तक गारा-पत्थरों की ढुलाई की मजदूरी...?

गांव की औरतें ताना देती हैं कि भली हुई तुम प्रधान, अपने द्वारे पर ही पक्का खरंजा करा लिया। अपनी गली ही पत्थरों से जड़ ली। हमसे क्या बैर था बहन कि कीचड़ में ही छोड़ दिए।

बच्चों को स्कूल भेजते डर लगता है, छत आज गिरी कि कल। आपके अलावा कौन सुधरवा सकता है उसे।

कौन कहेगा कि यह पिरमुख का गांव है? गड्ढों में पानी, पानी में मच्छर। कूड़ा-कचरा। घर-घर जूड़ी-ताप। कुछ दवा-दारू होती। गड्ढों की पुराई, जैसे लालपुर में।

कुछ भी तो नहीं हुआ जवाहर रोजगार योजना के पैसे से?

रनवीर की आंखें फैलती चली गईं।

दृष्टि धीरे-धीरे खौलने लगी।

उनके चक्षुओं से ऐसे अग्निबाण बरसने लगे कि मैं खड़ी-खड़ी भस्म होने लगी। मास्साब, मेरे बोल तपते तवे पर पड़े छींटों की तरह जलने लगे।

गाँव की औरतें कह रही थीं या तुम?

ये गांव की औरतें कब से बोलने लगीं?

प्रधान के कर्तव्य और अधिकार वाली पुस्तिका रटी है क्या?

तुम प्रधान हो कि एम. एल. ए.?

उनके चेहरे को विद्रूप हंसी ने ढांप लिया।

च च् च्...! हमसे तो कभी किसी ने कुछ नहीं पूछा और तुमसे इतने ढेर सवाल? रनवीर की भाषा बड़ी तीक्ष्ण थी।

कांपते हाथों से चुपचाप लिख दिया, बसुमती देवी।

दस्तखत!

इस रुपए को जिस दिन हस्ताक्षर करके लाई थी, उन दिनों स्वर्ग के सपनों में विचरा करती थी। चमचमाते स्कूल और पक्की गलियों की चाह थी मन में। वर्षा की रौ में ढहे झोंपड़ों को संवार देने की आकांक्षा की थी। हाथ पर हाथ धरे बैठे बेरोजगारों के घर दुर्दिनों में चूल्हा जलाने की बात सोची थी। बीमारों के दर्द को हरने के लिए कुछ दवा-गोली की साध थी।

‘बसुमती देवी’ इन छह अक्षरों ने सपनों के घरौंदे का कण-कण आहत कर डाला।

 

एक वृद्धा ने आ किवाड़ खटखटाया।

ओ बेटा, बसुमती!

पानी का घड़ा घड़ोंची पर रखती, तब तक रवनीर का छोटा भाई देववीर जा पहुंचा द्वार पर।

क्या है दादी?

बेटा, तनक अपनी भौजाई को भेज।

पंचायत के लिए बुलाने आई हो क्या?

और काहे को लिवा जाएंगे भइया!

दादी, जाओ यहां से। भइया घर पर नहीं हैं। भाभी नहीं जा सकेंगी।

काहे नहीं जा सकेगी? पिरधान नहीं है क्या वह? पंच्यात में तो जाना ही पड़ेगा भइया!

तुम लड़ाई करवाओगी हमारे घर में?

लड़ाई की क्या बात ठहरी बेटा? जे तो पहले ही सोचनी थी तुम्हें।

मैं पौर में आ चुकी थी। बूढ़ी अम्मां ने देख लिया। वे पांवों में गिर पड़ीं, बेटी बसुमती! लाचारी तो समझ हमारी। फिर हमारे जमाई को छुट्टी नहीं मिलेगी। लाम की नौकरी ठहरी। हमारी बेटी का न्याय-फैसला करवा बहू!

मैं खड़ी-खड़ी उनकी सुनती रही।

बेटी, लड़की का दर्द देखा नहीं जाता अब। बाप राच्छत है। चैन से जीना नहीं बदा हमारे भाग में। कहते-कहते वृद्धा के कोये भीगने लगे। धार बह उठी, झुर्रियों भरे मुख पर।

क्या करती, कोई चारा न था। सांत्वना थी मेरे पास, सो देती रही, न्याय मिलेगा अम्मां! भरोसा रखो। पंच अन्याय थोड़ेई करेंगे?

उस समय न जाने कैसे निर्णय ले डाला कि ठिठके कदम अम्मां के संग चल पड़े। देववीर रोकता रह गया।

फैसला करवाकर आई तो अपूर्व तोष में भीगी हुई थी। अनाम आर्द्रता और प्रेमिल निष्ठा के साथ लिया निर्णय। पवित्र मंदिर-सा लगा था पंचायत वाला चबूतरा, जिस पर बैठकर रुके हुए सड़े जल को जैसे काटकर बहा दिया हो मैंने। संपूर्ण गंदगी रिता दी हो अपने हाथों से। अब मानो नई वाटिका का बीजारोपण होगा वहां।

रनवीर ने उस रात धीमे से घर में प्रवेश किया। उनका गंभीर चेहरा दहला देने की हद तक विध्वंसात्मक हो उठा।

मेरे कलेजे को जैसे कोई खुरों से खूंदने लगा।

सनसनाती निस्तब्ध रात में उनका स्वर धीमे से ही बहा, लेकिन भीतर घुला जहर मुझे आपादमस्तक नहलाता चला गया।

कचहरी करने का इतना शौक था तो बाप से कहकर वकालत पढ़ ली होती! बार-बार मना करने पर भी...!

मुझसे जवाब नहीं बना, उनके कहे वाक्य का।

यह रोज-रोज की नौटंकी! रात-दिन की नाटकबाजी! बताओ कब बंद करोगी? रनवीर ने घर के शून्य में विस्फोट किया।

डर के कारण घिग्घी बंधने लगी। लगा कि पूरी देह में कंपन की लहरें उठ रही हैं।

अनायास ही बोल पड़ी, मैं अपने आप नहीं गई थी, अम्मां और उनकी बेटी बुलाने आई थीं। हरदेई का दुःख कौन नहीं जानता?

सबसे ज्यादा तो तुम जानती हो।

हरदेई गिड़गिड़ा रही थी, कहती थी कि रनवीर भइया नहीं समझेंगे मेरी पीर। तुम औरत हो भाभी, मेरा दुःख समझो, न्याय करो। पति की लाम की नौकरी है, छुट्टी अब दो साल बाद ही मिल पाएगी, पूरे सात साल निकल गए इसी तरह।

 हमारे दादा तो सोचते हैं कि मुझे भेज दिया तो दामाद एक पैसे का मनीऑर्डर नहीं करेगा।

 ताले में बंद कर देते हैं मुझे। इनसे नहीं मिलने देते। अम्मां किसी तरह खोल दें तो पता चलते ही घर में हड़कंप? गंदी-गंदी गालियां।

 तीन बार शहर जाकर खतम कराया है पेट का बच्चा।

तुमने देखे हैं भाभी, ऐसे पिता?

अबकी बेर बचा लो। इनके संग भिजवा दो, तुम्हारा जस नहीं भूलूंगी भाभी, जनम भर। हरदेई रो उठी थी।

 मैंने उसकी गुहार फिर भी नहीं सुनी।

 यही सोचती रही, काश! तुमने फैसला कर दिया होता।

वे आंखें गाड़कर बोले, कैसा फैसला? जैसा तुम करके आई हो? जंगल में रह रही है हरदेई? बेटी आप घर कि बाप घर।

वह मलटेरिया कहां रखेगा उसे?

कहीं भी। दोनों में प्रेम है तो क्या घर और क्या बन।

वे झटके से उठ पड़े, तो मैं रोक रहा हूं उसे?

सारी थरथराहट के बावजूद न जाने कैसे शब्द होंठों से झड़ पड़े, मैंने तो सुना है कि उसे हाकिमों के पास उनकी हवस पूरी करने को...

अच्छा? उनकी जीभ लपेटा खाने लगी।

तुमने यह नहीं सुना कि उसके नालायक भाई की नौकरी कैसे लगी? तुम्हें यह नहीं बताया कि उसका बाप सीमेंट की दलाली निधड़क किसकी कृपा से कर रहा है, कि पक्का मकान कैसे उठा है? किस हितू की हिमायत पर हो रहे हैं सारे काम?

मेरा तो उसमें कोई लाभ नहीं?

तुम तो सारी कथा जानते हो। फिर  क्यों नहीं छुड़ाते उसे, उसके बाप के पफंदे से?

तुमने छुड़ा तो दी। मेरे खिलाफ फैसला इस तरह छीछालेदर।

मेरा ऐसा इरादा कतई नहीं था।

फिर उस दिन कैसा इरादा था, जब रामसिंह को पुलिस पकड़ ले जा रही थी? क्यों भागी थीं पुलिस वैन के पीछे पागलों की तरह। होश खोकर।

क्या कहते होंगे दरोगा जी? क्या सोचते होंगे लोग? यही कि प्रमुख की पत्नी का ऐसा कंजर तरीका!

 शरम से गड़ गया न मैं।

आगे ये नाटक रचे तो समझ लेना कि...

सुनो, रामसिंह दोषी नहीं था। निर्दाष को सजा?

वे क्रोध से कांपने लगे।

सुन ले! और समझ ले अपनी औकात! मजबूरी में खड़ी करनी पड़ी तू। मैं दो-दो पदवी नहीं रख सकता था एक साथ। सोचा था, पत्नी से अधिक भरोसेमंद कौन...।

उनके चेहरे पर ‘भरोसेमंद’ शब्द कहते हुए जहरीली हंसी उतर आई जो मेरे कलेजे में धार करती चली गई।

वह पूस की ठंडी रात थी। शिला की तरह जमा देने वाला शीत। मैं बाहर ही बैठी रही। ठिठुरन से मुख घुटनों में गाड़ लिया। हाथ-पांव सुन्न होने लगे थे।

मन बड़ा अस्थिर था। लगा कि इसी समय यह घर, यह गांव, यह धरती-आसमान त्याग जाऊं, कहीं चली जाऊं।

आधी रात निकल गई होगी।

उसी धुंध में लगा कि परछाईं निकट को सरकती चली आ रही है। पैछर पर चेहरा उठाकर देखा, रनवीर थे।

वे समीप आ बैठे। सिर पर हाथ फेरते हुए मनुहार करने लगे, चलो भीतर। सोओ चलकर। ठंड बहुत है। कहा मानो।

धोती झाड़ती हुई मैं बुत की तरह उठ बैठी, अकड़ी हुई-सी।

न विरोध करने की इच्छा हुई, न उलाहना देने की आत्मीयता जागी। अरागात्मक भावना के चलते अपने आप को ढकेलती रही कमरे के भीतर।

वे समझाते रहे, पति-पत्नी में कोई अंतर नहीं होता है? पगली, एक-दूसरे के लिए ही जीते-मरते हैं। गांव वालों को लेकर विरथा अपने मन में क्लेश पाल बैठी।

हमसे जलते हैं सब। देखा नहीं जाता कि पति प्रमुख और पत्नी प्रधान। चाहते हैं कि तुम द्वार-द्वार डोलो। लौंडे-लपाड़े हंसी-ठट्ठा करें। लोगों को कहने का मौका मिले कि रनवीर की घरवाली पराए मर्दों के बीच...

आपको याद होगा मास्साब, जिस दिन मैं प्रधान बनी थी, उस दिन आपने एक छोटी सी चिट्ठी लिखी थी मेरे नाम। उसमें मेरे सुखद भविष्य की, मेरे पतिपरायण होने की कामना की थी आपने। साथ ही नया सूरज ढूंढ़ने की आस जगाई थी। संबंधों को जीतने की चुनौती भेजी थी। लिखा था, बसुमती, अपने आंगन में सत्य के खंभे गाड़कर ईमानदारी की छान डालो कि दीन, दलित, त्रस्त, अभिशप्त छांह पा सकें।

यह कहां तक संभव हो पाता है, आप भी जानते होंगे।

लेकिन आपकी उस लिखावट ने मुझे विचलित अवश्य कर दिया। मैं भूल गई मास्साब कि पदवी प्राप्त आदमी छल-बल और आतंक से जिस प्रजा का दमन करता है, उससे मैं अलग नहीं हूं।

काश, मैं ईसुरिया होती। आढ़-मर्यादा की दीवारों के बाहर मुक्त आकाश तले। कुलीन कही जाने वाली थोथी परंपराओं के भरम से परे।

काश! रनवीर के पास आभिजात्य की तुरप चाल न होती तो परों को बींधता हुआ यह पिंजड़ा मैं साथ ही उड़ा ले जाती।

 

भोर होने लगी थी शायद। पंछियों की चिचियाहट सुनकर मैं उठ बैठी। यद्यपि देह में निद्रा और सुस्ती के लक्षण न थे, फिर मन मार निरस्तता के चलते रोम-रोम अनमना था।

चौका-चूल्हा लीप-पोत दिया। कंडे सुलगा दिए।

रनवीर को कुल्ला-दातुन से पहले चाय पीने की आदत बन गई है।

चाय डालकर कप-प्लेट भीतर ले जा रही थी कि दरवाजे की ओर से आती चीख-चिंघाड़ आंगन में मंडराने लगी।

 ओ रन्ना की दुलहन! ओ बसुमतिया...

अरी बाहर तो आ...

 विरथा है तेरी विद्या! खाक है तेरी पढ़ाई! और राख हो गई तेरी पिरधानी!

यह कातर करुण स्वर!

यह रोदन की लय में छटपटाती ईसुरिया!

विलापात्मक करुणा सनी प्रकंपित आवाज...! हाथ में थमा प्याला थरथराने लगा। न जाने क्या हो पड़ा।

अरी जल्दी आ जा! बड़े पीपरा तरें कुआं में कूद के हरदेई ने पिरान तज दिए। मैं काठ हो गई।

उलटी तरफ भागने लगी रनवीर के कमरे की ओर। टांगें कांप रही थीं। सांसों में अवरोध टकरा रहा था।

विश्वास नहीं हो रहा था, पर भीतर ही भीतर कोई अदृश्य, अस्पष्ट बसूला आत्मा को छीलने में लगा था।

रनवीर बिस्तर पर नहीं थे।

देह शिला से भी भारी होने लगी। पांव गतिहीन...। निढाल हुई आंगन में ही बैठ गई।

किसने उलट दिया निर्णय? रात ही रात में सब कुछ विपरीत कैसे हो गया? पंचों का फैसला रद्द किसने किया? किसने रोका उसे पति के संग जाने से?

ईसुरिया ने मुझे कंधों से झकझोर डाला, अब बैठी ही रहेगी! आखिरी समय मुख तो हेर ले! हरदेई तुझे बोट देने गई थी। झल्लूस में झंडा उठाके चली थी तेरे नाम का।

हां, उसकी अनोखी आनबान वाली छवि...आंखों में तिर आई बसुमती देवी जिंदाबाद! बसुमती भाभी अमर रहें!

ईसुरिया का शोकगीत थमा न था, अच्छा होता बसुमती, हम अपना बोट काठ की लठिया को दे आते, निरजीव लकड़ी को! उठाए उठती तो। बैरी पर वार तो करती। अतीचालों के विरोध में पड़ती। पर रनवीर की दुलहन, तुम तो बड़े घर की बहू ही रहीं। पिरमुख जी की पतनी। घूंघट में लिपटी पुतरिया-सी चलती रहीं, आंखें मूंद के।

पीपल तले पहुंची।

वहां भी क्या हुआ? क्या होना था?

दरोगा, सिपाही और रनवीर, गांव के मुंह देखा लोग, विराजमान थे वहां।

हरदेई के पिता के रोदनमय बयानों पर पुलिसिया कलम चल रही थी दहेज के लोभी पति से मारपीट हुई थी, रात के समय। उसकी बिगड़ी हुई आदतों के चलते हम अपनी बेटी को नहीं भेजते थे उसके साथ। पर होनी को नहीं टाल पाए, दरोगा जी! पिरान खो दिए मेरी हरदेई ने। मां बेहोस पड़ी है घर में।

ईसुरिया विक्षिप्तों की तरह आगे को भागी, दहाड़ मारकर कहने लगी, ओ दरोगा जी...असल बात तो...

रनवीर ने बात बीच में ही रोक ली, अरे! कहां भागे जा रही है तू? न्याय मिलेगा। उस हत्यारे को फांसी न करवाई तो नाम रनवीर नहीं। जा घर। बसुमती को लिवा जा।

पंचनामा कराके दरोगा जी की जीप में रनवीर सादर बैठे चले गए।

पीछे गर्द-गुबार, धुंध में लिपटे लोग त्राहि-त्राहि करते अपने-अपने घरों को लौट लिए।

लौटकर अपने आंगन में, मैं संतप्त औरतों के बीच बैठी रही। लग रहा था जैसे इसी घर से अरथी उठी हो।

अनेक अनबूझ प्रश्न अटके थे, आसपास थकी-पथराई आंखों में। पति-पत्नी के पुण्य-पावन संबंध के नीचे विचलित खगी और शक्तिमान अहेरी का संगमन...

क्या औरतें पहचानती थीं अहंकारात्मक आत्मीयता को? नहीं तो वे मूक- बधिर सी उठकर क्यों चली गईं?

प्रश्न, न कोई प्रतिप्रश्न!

 

समय बीतता गया। प्रमुख का चुनाव आ गया।

रनवीर फिर प्रत्याशी थे।

उन्हें दम लेने की पुफरसत नहीं थी इन दिनों। मेरे पास भी घर-भीतर का काम बहुत अधिक था। सुबह से जला चूल्हा रात तक ही बुझ पाता। फिर भोजन के अतिरिक्त खाट-बिस्तरों का प्रबंध।

आवाजाही के चलते ब्याह-सा मचा था घर में।

रनवीर कहते हैं, गांव का आदमी इतना भोला नहीं, जितना समझा जाता है। फिर वह, जो राजनीति के चक्रव्यूह भेद चुका हो, वह पारंगत तो शहरी नेताओं को पटखनी खिला दे।

एक-एक प्रधान का नखरा साधना था रनवीर को।

मेरे खयाल से तहसील भर के प्रधानों ने हमारे घर आकर जुहार किया रनवीर को। चर्चा तो यहां तक हुई कि अबकी बार रनवीर, प्रमुख के बाद एम. एल. ए. के लिए खड़े होंगे।

ठीक बात थी। रनवीर बड़े चतुर हैं। बोतल-बीड़ी के निखालिस आधार पर नहीं टिकते। दुआ-सलाम में तो कतई भरोसा नहीं है उनका।

आफत-विपद में काम आने वाले आदमी ठहरे।

दरियापुर वाले इसीलिए उनसे बाहिरे नहीं हो सके। हालांकि विपक्ष में खड़ा प्रत्याशी उनका रिश्तेदार ठहरा। कारण था, उनको ग्राह के फंदे से भगवान् की तरह छुड़ा लाए थे रनवीर। नहीं तो बहू ने तो स्पष्ट बयान दिए थे कि बीस हजार नकद दहेज के कारण जलाया है मुझे।

बाप-बेटा फांसी के फंदे पर लटक गए होते, या फिर आजन्म कारावास। रनवीर की कृपा से ही तुर्रेदार साफे का गरूर बरकरार है।

हवा इस तरह की चली कि तीन प्रत्याशी चुनाव के पहले ही घुटने टेक गए। मैदान में केवल एक बचा, वह भी लुहार का लड़का।

नादान था शायद।

रनवीर सुबह ही चले गए।

मेरे लिए शाम को जीप भिजवा दी।

घर का काम था कि सिमटने में ही न आता था। बस किसी तरह पहुंच गई।

वैसे न भी जाती तो भी क्या अंतर पड़ता! मैंने तो यही कहा था रनवीर से। वे ही नहीं माने। कहने लगे, लोग हंसेंगे कि प्रमुख जी की पत्नी प्रधान हैं और वोट देने नहीं आईं।

वोट डालकर लौट आई।

रनवीर रात के समय लौटे थे।

जीप की सर्चलाइट देखते ही गांव के लोग दरवाजे की ओर जुड़ आए।

रनवीर सीधे बैठक में आ गए। वे बहुत थके हुए थे, माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा रही थीं।

पानी लेकर पास जा पहुंची।

वे चुप थे।

लोग उन्हें अस्वस्थ-से देखकर इधर-उधर हो गए।

एकांत में माथे पर हाथ फेरा तो वे अधिक गंभीर हो उठे। चेहरा दयनीय हो आया।

थोड़ी देर में ही वे रेत में पड़ी मछली-से तड़पने लगे। समझने को कुछ शेष नहीं था मास्साब, मैं पराजय पर सांत्वना देने लगी, धीरज रखो। कोशिश करना तुम्हारा काम था, हार-जीत तो लगी रहती है।

दिलासा तो दे रही थी लेकिन मेरा मन भी रुंध-खुंद गया। कभी उनके हाथ सहलाती, कभी पांव दबाती। भीतर से कुंडी बंद कर ली।

मास्साब, यह लिखने की बात नहीं है, पति को धीरज देने का हर संभव प्रयत्न किया था मैंने। मन से मन और देह से देह मिलाकर, ताप हरना चाह रही थी उनका।

वे एकालाप में डूबे थे, वे कौल, वे करार, वह गंगाजली उठाकर सौगंध खाना सब भ्रम था बसुमती?

क धोखा?

उन्हीं अंतरंग क्षणों में बाहर बतियाता देववीर का स्वर मेरे कानों पर हावी हो गया, अगर एक बोट और होता तो भइया हारते नहीं। उस लुहरटा के बराबर आ जाते।

एक बोट!

विश्वास नहीं कर सकी मैं।

सहसा मेरे भीतर सब कुछ डांवाडोल होने लगा।

ओ मेरे अग्नि देवता! ओ सप्तपदी दिलाने वाले महापंडित! ओ मेरे जननी-जनक! और मास्साब आप, मेरे गुरुवर...आपने मुझे सुख-दुःख की सहभागिनी, अर्धानगिनि, सहचरी बनाकर रनवीर की पत्नी के रूप में विदा किया था।

लेकिन मैं क्या करती?

अपने भीतर की ईसुरिया को नहीं मार सकी।

क्षमा करना।

आपकी

बसुमती

-प्रतीकात्मक चित्र google से साभार 

मैत्रेयी पुष्पा द्वारा लिखित

मैत्रेयी पुष्पा बायोग्राफी !

नाम : मैत्रेयी पुष्पा
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जन्म : 30/11/1944 , सिकुर्राअलीगढ़

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