वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे – (भाग-1) यात्रा वृत्तांत (पद्मनाभ गौतम)

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे – (भाग-1) यात्रा वृत्तांत (पद्मनाभ गौतम)

पद्मनाभ गौतम 16 2018-11-17

विकास या विकास की गति को शब्दों में, किसी सपनीली दुनिया की तरह, अपनी कल्पनाओं की उड़ान से भी एक कदम आगे के स्वरूप का वर्णन कर लें किन्तु यथार्थ के धरातल पर तमाम विकास के दावे और वादे कितना मूर्त रूप ले पाए हैं यह सवाल अभी भी पूरी जटिलताओं के साथ हमारे सामने है | आधुनिकता की बातें करते हुए क्या हमें शर्मिन्दा नहीं होना चाहिए जब हमारी पहचान के सांस्कृतिक नगर एवं वहाँ का जन जीवन वर्तमान में भी सदियों पीछे दिखाई देता है ऐसे ही कुछ सवालों से दो चार कराता ‘पद्मनाभ गौतम’ का रोचक अंदाज़ में लिखा गया यात्रा वृत्तांत महत्वपूर्ण है ….| – संपादक

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे: यात्रावृतांत

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे: यात्रावृतांत

पद्मनाभ गौतम 11 2018-11-17

विकास या विकास की गति को शब्दों में, किसी सपनीली दुनिया की तरह, अपनी कल्पनाओं की उड़ान से भी एक कदम आगे के स्वरूप का वर्णन कर लें किन्तु यथार्थ के धरातल पर तमाम विकास के दावे और वादे कितना मूर्त रूप ले पाए हैं यह सवाल अभी भी पूरी जटिलताओं के साथ हमारे सामने है | आधुनिकता की बातें करते हुए क्या हमें शर्मिन्दा नहीं होना चाहिए जब हमारी पहचान के सांस्कृतिक नगर एवं वहाँ का जन जीवन वर्तमान में भी सदियों पीछे दिखाई देता है ऐसे ही कुछ सवालों से दो चार कराता ‘पद्मनाभ गौतम‘ का रोचक अंदाज़ में लिखा गया यात्रा वृत्तांत महत्वपूर्ण है ….| (दो भागों में लिखे गए इस यात्रा वृत्तांत का दूसरा भाग तीन दिन बाद आपके सामने होगा ) – संपादक

हाल ही में प्रकाशित

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 46 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 61 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

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