वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे – (भाग-1) यात्रा वृत्तांत (पद्मनाभ गौतम)

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे – (भाग-1) यात्रा वृत्तांत (पद्मनाभ गौतम)

पद्मनाभ गौतम 231 2018-11-17

विकास या विकास की गति को शब्दों में, किसी सपनीली दुनिया की तरह, अपनी कल्पनाओं की उड़ान से भी एक कदम आगे के स्वरूप का वर्णन कर लें किन्तु यथार्थ के धरातल पर तमाम विकास के दावे और वादे कितना मूर्त रूप ले पाए हैं यह सवाल अभी भी पूरी जटिलताओं के साथ हमारे सामने है | आधुनिकता की बातें करते हुए क्या हमें शर्मिन्दा नहीं होना चाहिए जब हमारी पहचान के सांस्कृतिक नगर एवं वहाँ का जन जीवन वर्तमान में भी सदियों पीछे दिखाई देता है ऐसे ही कुछ सवालों से दो चार कराता ‘पद्मनाभ गौतम’ का रोचक अंदाज़ में लिखा गया यात्रा वृत्तांत महत्वपूर्ण है ….| – संपादक

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे: यात्रावृतांत

वाया बनारस अर्थात् फिसल पड़े तो हर गंगे: यात्रावृतांत

पद्मनाभ गौतम 256 2018-11-17

विकास या विकास की गति को शब्दों में, किसी सपनीली दुनिया की तरह, अपनी कल्पनाओं की उड़ान से भी एक कदम आगे के स्वरूप का वर्णन कर लें किन्तु यथार्थ के धरातल पर तमाम विकास के दावे और वादे कितना मूर्त रूप ले पाए हैं यह सवाल अभी भी पूरी जटिलताओं के साथ हमारे सामने है | आधुनिकता की बातें करते हुए क्या हमें शर्मिन्दा नहीं होना चाहिए जब हमारी पहचान के सांस्कृतिक नगर एवं वहाँ का जन जीवन वर्तमान में भी सदियों पीछे दिखाई देता है ऐसे ही कुछ सवालों से दो चार कराता ‘पद्मनाभ गौतम‘ का रोचक अंदाज़ में लिखा गया यात्रा वृत्तांत महत्वपूर्ण है ….| (दो भागों में लिखे गए इस यात्रा वृत्तांत का दूसरा भाग तीन दिन बाद आपके सामने होगा ) – संपादक

हाल ही में प्रकाशित

'अपने भीतर की यात्रा' : कहनी

'अपने भीतर की यात्रा' : कहनी "शैलेंद्र शर्मा"

शैलेंद्र शर्मा 193 2020-12-27

“हमरंग बारह क़िस्से टन्न” लाइव क़िस्सा कहन के लम्बे चले आयोजन के हासिल के रूप में बहुत से साहित्यिक मित्रों से परिचय हुआ और उनमें से कुछ अच्छे दोस्त भी बने हैं। उन्हीं में से एक नाम है कथाकार “शैलेंद्र शर्मा” का । मथुरा से बहुत क़रीब आगरा रहते हुए भी अपरचित रहने का कारण भी उनकी कहानियों से गुजरते हुए समझ में आता है कि आप अपने समय और समाज को इंसानी जज़्बातों के साथ पढ़ते तो हैं किंतु पढ़ाने की  क़थित उग्रता में आपका यक़ीन नहीं है । आपकी कहानी पाठक के भीतर ठीक वैसे ही जगह बनाकर आ बैठती है जैसे वे खुद अपने व्यवहार और बात-चीत की सहजता से किसी के भी दिल में जगह बना लेते हैं । आपकी कहानी के पात्र मिलकर जो समाज गढ़ते हैं उसका ताना-बाना इतनी महीन और सघन बुनाबट के साथ इतनी सहज और सरलता से उतरता है जहां किसी अकल्पनीय बितान का धागा मात्र भी खोज पाना भी मुश्किल होता है । यही कारण है कि आपकी कहानियों में लेखकीय कल्पनाशीलता का ऐसा यथार्थपरक सामंजस्य का सामर्थ्य महज़ किताबी ज्ञान नहीं जान पड़ता बल्कि सामज के गहन विश्लेषण का नतीज़ा है । आज यहाँ प्रस्तुत कहानी ‘अपने भीतर की यात्रा’ आपकी कथा यात्रा से निकली एक ऐसी ही कहानी है जो न महज़ खुद को पढ़वा लेती है बल्कि पाठक को गहरे आत्म चेतन में उतार ले जाकर संवेदना के इंसानी संवेग के साथ जैविक ऊर्जा की ज़मीन के रूप में उपस्थित होती है जो इस कहानी और कहानीकार को ख़ास बनाती है ॰॰॰॰॰॰॰। - संपादक

नोट-

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