अंतिम युद्ध : नाटक (राजेश कुमार)

अंतिम युद्ध : नाटक (राजेश कुमार)

राजेश कुमार 658 2018-11-18

कइयों बार इन सवालों के व्यूह से गुजरा हूं कि आज जब देश आजाद है, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र यहां स्थापित है, विश्व की राजनीति में लगातार किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, कला-सौंदर्य-अंतरिक्ष के क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़ रहा है, वहां फिर से भगतसिंह और मुठ़ी भर क्रांतिकारियों को याद करने का क्या मतलब हो सकता है? भगत सिंह पर तो वैसे भी फिल्म बन चुकी है, आजादी की स्वर्ण जयंती पर धड़ा-धड़ सीरियल बन रहे हैं, नाटक लिखे जा चुके हैं, इतिहास की किताबों में ढेरों कहानियां छप चुकी हैं फिर एक नाटक लिखने की जरूरत? कौन नहीं जानता है, सब जानते हैं भगत सिंह की कहानी। सबको पता है, भगतसिंह एक बहादुर इंसान थे, पक्के देशभक्त थे। उन्होंने सांडर्स को मारकर लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लिया। पुलिस की आंखों में धूल झोंककर दुर्गा भाभी व उनके पुत्र शची के साथ लाहौर से कलकत्ता गये। सेंट्रल असेम्बली में बम फेंका और गिरफ्तारी देकर हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गये। फिर इस कथा को पुनः दोहराने की क्या आवश्यकता? लोगों को स्मरण दिलाने के लिए एक बार अगर इतिहास दिखला भी दे तो उसकी प्रासंगिकता क्या है? निःसंदेह वे स्मरणीय है, पूजनीय है। उन पर गीत-कवितायें लिखे जा सकते हैं, आजादी के पर्वों पर उनकी कुरबानियों को याद किया जा सकता है पर आज के समाज में जो घट रहा है उथल-पुथल बरकरार हैं उसमें कहां फिट बैठते हैं? इन्हीं सवालों से जूझने व इसकी तह में जाने की प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है यह नाटक ‘अन्तिम युद्ध’ ।

झोपड़पट्टी: नाटक (राजेश कुमार)

झोपड़पट्टी: नाटक (राजेश कुमार)

राजेश कुमार 484 2018-11-18

‘राजेश कुमार’ ऐसे इकलौते हिंदी नाटककार हैं जो निरंतरता में ऐसे नाट्यालेखों को लिख रहे हैं जो यथा स्थिति ही बयान नहीं करते बल्कि वे एक चेतना भी पैदा करते हैं और प्रतिरोध भी | उदारीकरण के प्रभाव में वर्तमान दौर से उपजी राजनैतिक उथल पुथल जिसके कारण विभिन्न सामाजिक तबकों की विविधता भरी जिंदगियों में तरह – तरह के बदलाव आये हैं जो सामान्यतः सकारात्मक से कहीं ज्यादा नकारात्मक हैं | राजनैतिक लालसा के प्रभाव में सामाजिक व्यक्तित्व भी, व्यक्तिवादी अंधी सोच में तब्दील हो रहा है | सामाजिक रूप से हमें इसका अंदाजा भी नहीं होता | चारों तरफ से राजनैतिक चालों से घिरे आम-जन के, इन्हीं बेरहम सवालों से जूझते हुए उनके जबाव खोजने का रचनात्मक प्रयास है नाटक ‘झोपडपट्टी”

हाल ही में प्रकाशित

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