विभिन्न सुर-ताल से सजी कविताएं: रिपोर्ट (सुमन कुमारी)

विभिन्न सुर-ताल से सजी कविताएं: रिपोर्ट (सुमन कुमारी)

सुमन कुमारी 21 2018-11-18

‘ताजमहल’ कविता में मजदूरों के दर्द, पीड़ा और उनकी दुर्दशा पर मुख्य रूप से बात की गई है। लोक प्रचलित धारणा से हटकर कवयित्राी यहां अपने दृष्टिकोण को विस्तार देती है। काव्य-गोष्ठी के तीसरे कवि रमेश प्रजापति रहे। जिनकी पहचान देशज कविता के लिए है। इन्होंने ‘पानी का राम’, ‘अरी लकड़ी’, ‘तपो-तपो हे सूर्य’ और ‘महानगर में मजदूर’ कविताओं का पाठ किया। इनके सभी विषय गांव और गांव से जुड़ी समस्याओं से संब( हैं। ‘पानी’ की महत्ता पर अपनी बात कहते हुए रमेश प्रजापति कहते हैं कि, ‘‘बेहिसाब बर्बाद हो रहा पूंजीपतियों की ऐय्यासी में कालाहांडी ही नहीं बल्कि बुंदेलखंड के साथ-साथ अब सूखने लगा है लातूर और भीलवाड़ा का कंठ।’’……

एक शाम अदब के नाम – ‘बज़्म-ए-शायरी’

एक शाम अदब के नाम – ‘बज़्म-ए-शायरी’

सीमा आरिफ 26 2018-11-18

आज के युग में जहाँ सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है, बहुत कुछ पीछे छुट रहा है। डिजिटल के दौर में हमें चीज़ों को भूलने की आदत पड़ती जा रही है।हम बहुत कुछ वो खो रहे हैं जिसको सेहजना,सवंरना हमारी ज़िम्मदारी है। इसी में एक है उर्दू ग़ज़ल शेरों शायरी। सुख़नवर-ए-शायरी का जन्म शेरों शायरी की मक़बुलियत, रिवायत को ज़िंदा, तरोताज़ा रखने, उसे एक नई शक्ल, स्फूर्ति दिलाने की नियत से हुआ था। सुख़नवर-ए-शायरी का मक़सद नई नस्ल के दिमाग़ों से यह ग़लतफ़हमी भी निकालना है कि शायरी ,ग़ज़ल बहुत ‘बोरिंग’ होती है। सुख़नवर-ए-शायरी का उद्देश्य नए शायरों, शायराओं के हाथों में एक ऐसा डाइस थमाना है जिस डाइस पर आकर वो किसी रिवायत,किसी बंदिश में बधें नहीं, बल्कि उर्दू ज़ुबाँ की रूह में खोकर शायरी पढ़े। ग़ज़ल की खुबसूरती में मदहोश होकर दूसरों के कलाम को सुने और नज़्मों की तिरछी चाल से क़दम से क़दम मिलाकर शायरी की महफ़िलों का लुत्फ उठाएं। वो एहसास जो ज़िन्दगी के हर पहलू को किसी ने किसे तरह से शायरी से जोड़ते हैं,ऐसे ही एक एहसास का नाम है सुख़नवर-ए-शायरी।

मुक्तिबोध, संघर्ष और रचनाशीलता : अनीश अंकुर

मुक्तिबोध, संघर्ष और रचनाशीलता : अनीश अंकुर

अनीश 13 2018-11-17

प्रख्यात कवि आलोकधन्वा ने हरिशंकर परसाई के साथ के अपने संस्मरणों को सुनाते हुए कहा ” एक बार मैंने हरिशंकर परसाई से पूछा कि आप सबसे अधिक प्रभावित किससे हुए तो उन्होंने कहा ‘मुक्तिबोध’। मुक्तिबोध एक लाइट हाउस जी तरह से थे। ” आलोकधन्वा ने आगे कहा ” मुक्तिबोध नेहरू के बड़े समर्थक थे। यदि नेहरू नहीं होते तो भारत बहुत पीछे होता। जितनी बड़ी संस्थाएं बनी वो उनके बिना संभव न होता। मुक्तिबोध ने ऐसे विषयों को उठाया वो उन्हें विजातीय बनाता है।जो श्रम के विज्ञान नही जानता वो मुक्तिबोध को समझ नहीं सकता। मार्क्सवाद आप जितना समझेंगे मुक्तिबोध उतना ही समझ में आएंगे।”……

हमारे समय में कविता: रिपोर्ट (अन्तरिक्ष शर्मा)

हमारे समय में कविता: रिपोर्ट (अन्तरिक्ष शर्मा)

अंतरिक्ष शर्मा 28 2018-11-16

हर वर्ष की भांति एक जनवरी २०१६ को कोवैलैंट ग्रुप ने अपना स्थापना दिवस अनूठे तथा रचनात्मक ढंग से उन युवा और किशोर प्रतिभाओं के साथ मनाया |जिनकी सामाजिक, साहित्यिक और कलात्मक प्रतिभाएं किसी मंच के अभाव में मुखर नहीं हो रहीं हैं | साथ ही ऐसे युवा और किशोर भी जो देश-दुनिया, समाज, साहित्य, कला और सामाजिक सरोकारों और जिम्मेदारियों से दूर महज़ किताबी शिक्षा को ही मनोरंजन और जिन्दगी मान कर जी रहे हैं | ‘रमाशंकर विद्रोही‘ और ‘सफदर हाशमी‘ को समर्पित कार्यक्रम ‘हमारे समय में कविता‘ की एक रिपोर्ट ‘अन्तरिक्ष शर्मा‘ की कलम से …|

हाल ही में प्रकाशित

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 46 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 61 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

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