समकालीन हिन्दी आलोचना और कबीर: आलेख (संजय कुमार पटेल)

समकालीन हिन्दी आलोचना और कबीर: आलेख (संजय कुमार पटेल)

संजय कुमार पटेल 155 2018-11-18

कबीर पर आज तक जितने भी आलोचक अपनी आलोचना से दृष्टिपात किए हैं वह आज भी सबको स्वीकार्य नहीं है । सभी लोग अपने-अपने अनुसार कबीर को व्याख्यायित करने का प्रयास किए हैं लेकिन उन्हीं में से कबीर के प्रति कुछ ऐसे भी शोध हुए हैं जो अन्य शोधों की अपेक्षा अधिक सटीक, वास्तविक व ऐतिहासिक हैं । वह कबीर की विरासत की बात करते हैं । उनके वास्तविक और ऐतिहासिक स्वरूप पर बड़ी मजबूती के साथ लिख रहे हैं । कबीर को समझने के लिए हमे आज उनको इसी रूप को केंद्र में रखना होगा । वह वैष्णव दार्शनिक पृष्ठभूमि के थे ही नहीं, उनकी तो अपनी परंपरा है, विरासत है और अस्मिता है । उनकी अपनी मौलिकता है । इसलिए कबीर जैसे व्यक्तित्व और कृतित्व को घालमेल करने से सावधान रहना होगा । आज हमे कबीर को समझकर ऐसे आलोचकों को करारा जबाब देना होगा । उनके झांसे से बचना होगा । उनके वस्तिविक और ऐतिहासिक रूप को समझना व मानना होगा । वह भक्त नहीं थे, वैष्णव दर्शन से सम्बद्ध नहीं थे, सत्ता के साथ उनका दूर तक कोई नाता नहीं था, उनके गुरु रमानन्द नहीं थे और न ही वह हिंदुत्ववादी अस्मिता के साथ थे । ‘संजय कुमार पटेल’ का शोध आलेख …….

नज़ीर अकबराबादी के काव्य में चित्रित मानव-समाज: शोध आलेख (सालिम मियां)

नज़ीर अकबराबादी के काव्य में चित्रित मानव-समाज: शोध आलेख (सालिम मियां)

सलीम मिया 138 2018-11-18

“जनसामान्य से जुडे़ होने के कारण नज़ीर ने आर्थिक विपन्नता से ग्रस्त एवं अभिशप्त लोगों की आह और कराह को किसी चैतन्य पुरूष के समान सुना और इसके कठोर आघात को आत्मिक धरातल पर अनुभव किया और उन इंसानी कराह को ‘रोटियाँ’, ‘पेट की फिलासफी’, ‘पेट’, ‘खुशामद’, ‘आदमीनामा’, ‘कौड़ी’, ‘पैसा’, ‘रूपये की फिलॉसफी’, ‘जरे, ‘मुफलिसी’ इत्यादि रचनाओं में अभिव्यक्त करने वाले “जनकवि नज़ीर” की रचनाओं में तत्कालीन भारतीय समाज और मानव जीवन के अनेक बिम्बों को खोजने का प्रयास करता शोधार्थी ‘सालिम मियां‘ का आलेख ……| – संपादक

कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास: ‘पहली क़िस्त’ (अशोक कुमार पाण्डेय)

कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास: ‘पहली क़िस्त’ (अशोक कुमार पाण्डेय)

अशोक 166 2018-11-17

यूं तो कोई भी इतिहास सत्ता लौलुपताओं से उत्पन्न, वर्गीय संघर्षों से रक्त-रंजित, मानवीय त्रासदियों के बड़े दस्तावेज के रूप में ही मिलता है | कुछ इतिहास सभ्यताओं की तरह ज़मीदोज़ हैं, हो गये या फिर कर दिए गए, यह सब खुद इतिहास बनकर वक़्त की स्मृतियों में दर्ज है | वहीँ कुछ, स्मृतियों में तारीखों में होते रहे बदलावों, साजिशों, घटनाओं के साथ मानवीय अवशेषों को खुद में समेटे आज भी अनिर्णीत रूप में जीवंत हैं | इन्हीं में से, सैकड़ों वर्षों की लम्बी यात्रा कर चुका ‘कश्मीर’ महज़ एक शब्द या एक राज्य का नाम भर नहीं बल्कि वक़्त के क्रूर थपेड़ों से जूझते हुए यहाँ तक पहुंचा एक ऐसा पथिक है जो अपने समय की झोली में संस्कृति, परम्पराएं, लालच, युद्ध, टीस-कराहटें, चीख-पुकार, गीत-संगीत, धारणाओं और किम्ब्दंतियों का बड़ा खजाना अपनी धरोहर के रूप लिए हुए है…… | अन्याय इतिहासों की तरह जीवंत कश्मीर के कृति-विकृत बदलाव झेलते सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक चेहरे को अनेक इतिहासकार स-समय लिपिवद्ध भी करते रहे | इसी कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय” “कश्मीरनामा: इतिहास की क़ैद में भविष्य” शीर्षक से किताब लिख रहे हैं | कई वर्षों की लम्बी मेहनत के बाद, मूर्त रूप लेती यह किताब भी जल्द ही हमारे सामने होगी किन्तु इससे पूर्व ‘अशोक कुमार पाण्डेय’ द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख यहाँ पढ़ते हैं | संक्षिप्त रूप में लिखे जाने के बावजूद भी बड़े बन पड़े इस आलेख को हम यहाँ साप्ताहिक किस्तों के रूप में आपके समक्ष लाते रहेंगे | – संपादक

बसेरे से दूर: विजन, शिल्प एवं भाषा: आलेख (नितिका गुप्ता)

बसेरे से दूर: विजन, शिल्प एवं भाषा: आलेख (नितिका गुप्ता)

नीतिका गुप्ता 100 2018-11-17

“डाॅ. हरिवंशराय ने अपनी आत्मकथा का तीसरा खंड ‘बसेरे से दूर‘ 1971 से 1977 के दौरान लिखा। इस खंड में उनके इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विभाग में अध्यापक होने, देश-परिवार से दूर जाकर ईट्स के साहित्य पर शोध कर केम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में पीएच.डी. की उपाधि लेने, इसके बाद स्वदेश वापसी एवं इलाहाबाद छोड़कर विदेश मंत्रालय में नियुक्त होने (अर्थात् 1952 से 1954) तक की घटनाओं को समेटा गया है। इसमें मुख्य रूप से बच्चन जी एक अध्यापक, शोधक एवं आलोचक के रूप में पाठकों के समक्ष आए हैं। बच्चन जी के लिए उनके विद्यार्थी कितने महत्त्वपूर्ण रहे और अध्यापन के प्रति वे स्वयं कितने गंभीर रहे हैं, इस बात को निम्न कथन द्वारा समझा जा सकता है-“मैं अपने पढ़ाने में इस बात का विशेष प्रयत्न करता कि मैं विद्यार्थियों में स्वयं पढ़ने की रुचि जमाऊँ, शायद इसलिए भी इससे मेरे पढ़ाने में जो कमी हो उसकी पूर्ति हो जाये। लेक्चरर लोग स्वाध्याय के लिए पुस्तकों की लम्बी-चैड़ी सूची का इमला तो जरूर बोल देते थे, पर विद्यार्थियों को पुस्तकें सुलभ न होती थीं……..विद्यार्थियों की इस असुविधा का हल निकालने के लिए मैंने एक सेक्शन लाइब्रेरी की स्थापना की। प्रथम वर्ष में विद्यार्थियों ने मिलकर जितना चंदा दिया उतना मैंने स्वयं उसमें मिलाकर कुछ जरूरी सहायक पुस्तकें खरीदकर क्लास की अलमारी में रख दीं।…….14 वर्ष बाद जब मैंने युनिवर्सिटी छोड़ी पूरी अलमारी, काफी बड़ी, किताबों से भर गयी थी……हर पुस्तक और हर विद्यार्थी को एक निश्चित नम्बर देकर मैंने एक ऐसी सरल विधि बनाई कि लगभग 60 विद्यार्थियों को केवल 5 मिनट में पुस्तकें इशू करने का काम मैं समाप्त कर देता था। सदस्यता सीमित रहने से निश्चय मेरे बहुत-से विद्यार्थियों ने उन पुस्तकों से लाभ उठाया, शायद उससे अधिक जितना मेरे क्लास में व्याख्यान देने से।”3 वस्तुतः वर्तमान में जब अध्यापन सिर्फ एक व्यवसाय बनकर रह गया है और अध्यापकी जीवन की शुरुआत में तैयार किए गए नोट्स ही साल-दर-साल पढ़ाए जाते हैं, ऐसे समय में यह प्रसंग अध्यापकों को अपनी शिक्षण पद्धति पर विचार करने के लिए मजबूर करता है।” शोधार्थी ‘नितिका गुप्ता’ का आलेख …….

नवें दसकोत्तर हिंदी उपन्यास और भूमंडलीकरण: आलेख (अनीश कुमार)

नवें दसकोत्तर हिंदी उपन्यास और भूमंडलीकरण: आलेख (अनीश कुमार)

अनीश कुमार 564 2018-11-17

सांस्कृतिक तर्क के सहारे पूंजीवाद के साम्राज्यवाद का उत्कर्ष ही भूमंडलीकरण है। भारत में भूमंडलीकरण की शुरुआत नब्बे (1990) के दशक से होती है। इस भूमंडलीकरण के दौर में सबसे ज्यादा कोई परास्त और निराश हुआ हो तो वे हैं आदिवासी, दलित और स्त्री। नब्बे के दसक के बाद इन सभी विमर्शों के केंद्र में रखकर साहित्य लिखे जा रहे हैं। दमित अस्मिताएं और उनकी लोकतान्त्रिक मांगों, उपभोक्तावादी अपसंस्कृति, मध्यवर्गीय जीवन की विद्रूपता जनजीवन की तबाही उत्पीड़न आदि को रेखांकित किया जा सकता है। यूं भी जब भारत मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक नेतृत्व व भूमंडलीकरण के समक्ष समर्पण की नीति पर चल रहा हो उस समय प्रतिरोधी संस्कृति और साहित्य से ही आशा की जा सकती है। हिंदी में भूमंडलीकरण के प्रभाव में अनेक उपन्यास लिखे जा रहे हैं तो दूसरी तरफ उसके सम्पूर्ण प्रतिरोध और विकल्प के रूप में बहुत से उपन्यास प्रतिरोध का सही नजरिया अपनाकर भूमंडलीकरण के विरुद्ध जन प्रतिरोध की सही अभिव्यक्ति का माध्यम बनकर साहित्य के जनतंत्र की रचना कर रहा है। भूमंडलीकरण की मानवीय विभीषिका को साहित्यिक जड़ों में खोजने का प्रयास करता शोधार्थी ‘अनीश कुमार’ का आलेख ……

संत कबीर और आधुनिक हिन्दी काव्य: शोध आलेख (प्रमिला देवी)

संत कबीर और आधुनिक हिन्दी काव्य: शोध आलेख (प्रमिला देवी)

प्रमिला देवी 147 2018-11-17

‘जननायक कबीर का प्रभाव साहित्य पर आज छह सौ वर्षो के बाद भी ज्यों का त्यों देखा जा सकता है । आज जब भी धरती के किसी कोने में मानवता लहूलुहान होती है, तो झट से हमें कबीर का पढ़ाया पाठ याद आ जाता है । टैगोर और गांधी जी की चिंतनधारा पर तो कबीर-रचनावली की अमिट छाप है ही । डाॅ. राधाकृष्णन ने कबीर दर्शन की चिंरतनता को रेखांकित करते हुए लिखा है कि ‘पूरे भारतीय साहित्य में पांच शख्सियतें सदा अमर रहेंगी, जिनमें से एक शख्सियत कबीर की है । इधर हिंदी-साहित्य में ‘प्रेमचंद’, ‘निराला’ मुक्तिबोध और नागार्जुन के रूप में कबीर की परम्परा बखूबी प्रवाहित है ।’ आधुनिक हिंदी काव्य धारा में कबीर को व्याख्यायित करता ‘प्रमिला देवी’ का आलेख ….

समय के साथ संवाद करतीं ‘भीष्म साहनी’ की कहानी: आलेख (अनीश कुमार)

समय के साथ संवाद करतीं ‘भीष्म साहनी’ की कहानी: आलेख (अनीश कुमार)

अनीश कुमार 186 2018-11-17

मानवीय संवेदनाओं और मानव मूल्यों के निरतंर क्षरण होते समय में सामाजिक दृष्टि से मानवीय धरातल से जुड़े साहित्यकारों का स्मरण हो आना सहज और स्वाभाविक ही है | वस्तुतः इनकी कहानियों और उपन्यासों से गुज़रते हुए वर्तमान अपने स्वरुप और घटनाओं के साथ जीवंत होना, लेखकीय समझ और सामाजिक साहित्यिक दृष्टि से उनकी लेखनी की ताज़ा संदर्भों में प्रासंगिकता स्पष्ट करता है | ‘भीष्म साहनी’ उन्हीं साहित्यकारों में से हैं जिनकी कहानी को लेकर साफ़ समझ थी कि “परिवेश बदल भी जाए तो भी कहानी पुरानी नहीं पड़ती। कहानी पुरानी तब भी नहीं पड़ती जब जीवन मूल्य बादल जाएँ, जीवन को देखने का नजरिया बादल जाए, क्योंकि तब भी वह किसी विशिष्ट कालखंड के जीवन यापन का चित्र अपने में सुरक्षित रखे होती है। समकालीन न रहते हुए भी किन्हीं पुराने रिश्तों कि कहानी कहती रहती है, कहानी पुरानी तब पड़ती है जब कहानी के भीतर पाया जाने वाला संवेदन अपना प्रभाव खो बैठे, असंगत पड़ जाए, जब कहानी कहने का ढंग भी रोचक न रहे, जब पाठक वर्ग कि साहित्यिक रूचियां तथा अपेक्षाएँ बादल जाएँ।” (आलेख से) हालांकि भीष्म जी का रचना संसार खूब चर्चित भी हुआ और उसकी सामाजिक व्याख्याएं भी कम नहीं हुईं बावजूद इसके उनके विपुल साहित्य में अनेक ऐसी कहानियां भी रहीं हैं जिन पर अपेक्षित रूप से कम ही लिखा जा सका है ‘फैसला’ और ‘लीला नंदलाल की’ आपकी ऐसी ही कहानियाँ हैं | इन्हीं दोनों कहानियों के संदर्भ में वर्तमान समय में उनकी सामाजिक और मानवीय प्रासंगिकता को व्याख्यायित करता हिंदी शोधार्थी ‘अनीश कुमार’ का आलेख | – संपादक

समकालीन हिंदी उपन्यास और आदिवासी जीवन: आलेख (कृष्ण कुमार)

समकालीन हिंदी उपन्यास और आदिवासी जीवन: आलेख (कृष्ण कुमार)

कृष्ण कुमार 1745 2018-11-17

21वीं सदी में जब भूमण्डलीकरण, औद्योगीकरण अपने चरम पर है तथा विकास के नाम पर आदिवासी समुदाय को उसके मूलभूत आवश्यकताओं जल, जंगल, जमीन’ से बेदखल किया जा रहा ऐसे में संकट केवल उनके अस्तित्व पर ही नहीं उनकी संस्कृति पर भी है। इसी बात को केन्द्र में रखकर आदिवासी समुदाय पर केन्द्रित दो उपन्यासों का नाम है ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ तथा ‘गायब होता देश’ इन दोनों उपन्यासों का प्रणयन कथाकार रणेन्द्र ने किया है। उपन्यासकार रणेन्द्र का उपन्यास ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ सिर्फ उपन्यास न होकर आदिवासी समुदाय खासकर ‘असुर’ का इतिहास भी प्रस्तुत करता है। जिसमें उन्होंने एक जगह पर अब तक असुरों के बारे में जनमानस में बनी धारणा पर प्रहार करते हुए लिखा है कि “सुना तो था कि यह इलाका असुरों का है, किन्तु असुरों के बारे में मेरी धारणा थी कि खूब लम्बे-चैड़े, काले-कलूटे, भयानक दाँत-वाँत निकले हुए, माथे पर सींग-वींग लगे हुए होंगे। लेकिन लालचन को देखकर सब उलट-पुलट हो रहा है।’’5 समकालीन हिंदी उपन्यासों में आदिवासी जनजीवन को रेखांकित करने का सार्थक प्रयास कर रहे हैं शोधार्थी ‘कृष्ण कुमार’ …..

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