परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

परवाज़ : कहानी (अनीता चौधरी)

अनीता 164 2018-12-10

जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक

वारिस: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

वारिस: कहानी (प्रो० विजय शर्मा)

विजय शर्मा 65 2018-11-18

“एक बार के हुए दंगों ने जब उन्हें जड़ से उखाड़ दिया तो वे आकर इस मोहल्ले में बस गए। दंगों में उन्हीं जैसे गरीब लोगों का नुकसान हुआ था। उन्हीं जैसे गरीब लोगों के घर में आग लगी थी। उन्हीं जैसे गरीब लोग मारे गए थे। उनके जैसे लोग अपनी जमीन से उखड़े थे। उनकी बीवी उन्हीं दंगों में यतीम हुई थी। उसके अब्बा को किसी ने छुरा मार दिया था। किसी गैर धर्म वाले ने उन्हें नहीं मारा था। जब हिन्दू-मुसलमान के बीच दंगा हो रहा था तब किसी ने उन्हें छुरा मार दिया। रहमत ने देख लिया था, वे उसे जानते थे और उन्होंने उस बदमाश को दौड़ाया भी था। पर उसके हाथ में छुरा था। डर कर ज्यादा पीछा नहीं किया। वह अँधेरे में भाग निकला। वह कोई और नहीं सकीना का अपना रिश्तेदार था। दंगे की ओट में उसने अपनी पुरानी दुश्मनी निकाली थी।” ‘प्रो० विजय शर्मा’ की बेहद असरदार कहानी …….

डाका : कहानी (सुरेन्द्र रघुवंशी )

डाका : कहानी (सुरेन्द्र रघुवंशी )

सुरेन्द्र रघुवंशी 31 2018-11-18

थोड़ी देर बाद डाकू पास ही स्थित हमारे घर के आँगन में थे। वे घर के भीतर घुसकर देख रहे थे। न कोई जन और न ही धन उन्हें वहां मिला।वे आँगन में इकठ्ठा होकर मंत्रणा करने लगे। बड़े ताऊ जी अटारी पर चढ़कर छिपे हुए बैठे थे।उन्होंने अटारी की कोर की पाट ऊपर से आँगन के डाकुओं पर गिराने के इरादे से उसे पूरी ताक़त लगाकर ऊपर से नीचे की ओर खिसकाना शुरू किया। दो पाटों में सरकते हुए रगड़ होने से खर्र-खर्र की आवाज़ को डाकुओं ने सुन लिया और चौकन्ने होते हुए एक डाकू ने कहा – ” साथी ऊपर आदमी हैं फैर करौ।” उसके इस कहन में डाकुओं का भय प्रगट हो रहा था।एक डाकू ने बारह बोर की बन्दूक में कारतूस लगाया और हवाई फायर कर दिया। ताऊ जी अँधेरे का लाभ लेते हुए घर के पीछे के खेरे में कूदकर भाग खड़े हुए।……

एक कमज़ोर लड़की की कहानी: कहानी (सूरज प्रकाश)

एक कमज़ोर लड़की की कहानी: कहानी (सूरज प्रकाश)

सूरज प्रकाश 124 2018-11-18

उस दिन की बात वहीं खत्‍म हो गयी थी। बाद में बेशक कई बार फेसबुक पर उनकी हरी बत्‍ती उनके मौजूद होने का संकेत दे रही थी लेकिन मैंने कभी अपनी तरफ से पहल करके उन्‍हें डिस्‍टर्ब नहीं किया था। कभी करता भी नहीं। किसी को भी। सामने वाला बेशक फेसबुक पर है लेकिन पता नहीं कौन-सा ज़रूरी काम कर रहा हो। मैं भी तो फेसबुक पर हरी बत्‍ती होने के बावजूद हर समय लैपटॉप पर नहीं होता। तब मैंने पहली बार उनका प्रोफाइल पढ़ा था। कुछ समझ ही नहीं आया थ। वर्किंग इन गुरबनिया। फोटो एल्‍बम में भी कुछ तस्‍वीरों के पीछे इसी नाम के लोगो लगे हुए थे। हालांकि गूगल सर्च में जा कर इस कंपनी या जगह के बारे में पता किया जा सकता था, लेकिन टाल गया। मन में हलकी-सी खुशी भी थी कि बहुत दिनों बाद फेसबुक पर कोई ऐसी मित्र बनी है जो किताबों से वास्‍ता रखती है।

मर्द नहीं रोते: कहानी (सूरज प्रकाश)

मर्द नहीं रोते: कहानी (सूरज प्रकाश)

सूरज प्रकाश 101 2018-11-18

उन्‍होंने क्‍लर्क के हाथ से फार्म ले लिया है और बड़े बेमन से भर कर वापिस क्‍लर्क की डेस्‍क पर रख दिया है। तब तक क्‍लर्क वापिस आ गया है और फार्म देख रहा है। फार्म देख कर क्‍लर्क बेचैन हो गया है – ये क्‍या? यहां आपने लिखा है कि बीमारी वगैरह की हालत में या किसी एमर्जेंसी में आपके परिवार में किसी को भी न बताया जाये और कि आपका कोई भी नहीं है। आपने अपने परिवार का स्‍थायी पता…… और ये आपके परिवार के लोगों के नाम और पते …..और ये…….आपसे कोई भी मिलने नहीं आयेगा और ये…. आपके परिवार द्वारा ट्रस्‍ट को दिये जाने वाले महीने के पैसे…….आपने पता नहीं क्‍या-क्‍या लिख दिया है। मैं आपको दूसरा फार्म देता हूं। ज़रा ध्‍यान से भरिये….साब। अच्‍छा रुकिये, मैं ही भरवा देता हूं आपका फार्म। वे बहुत ही संतुलित और ठहरी हुई आवाज़ में बताते हैं – देखिये देवीदयाल जी, मैंने जो कुछ भी लिखा है, सोच-समझकर लिखा है आपके सारे सवालों का जवाब ये है।

अन्नाभाई का सलाम: कहानी (सुभाष पंत)

अन्नाभाई का सलाम: कहानी (सुभाष पंत)

शुभस पन्त 59 2018-11-18

भाषा और ऐतिहासिक नायक सुरक्षा की मजबूत दीवारें हैं। इसके अलावा हमें अपनी कमजोर पड़ गई खिड़की तो बदलनी ही है…’’ बहुत भोला विश्वास है सावित्री तुम्हारा। लड़कियाँ कहीं भी सुरक्षित नहीं हैं। घर-बाहर, स्कूल, देवालय, बस-टेªन कहीं भी….दुनिया सभ्य हो रही है और स्त्रियाँ उसी रफ़्तार से असुरक्षित होती जा रही हैं…. ‘ये सब बेकार की बातें हैं। हमारी शिनाख्त हो चुकी है और हम अवांछित घोषित किए जा चुके हैं…. बिट्टी तो मराठी पढ़ी है। बोर्ड में उसे मराठी में सौ में पैंसठ नम्बर मिले थे। इस समय वह हमसे बड़े खतरे में है। हम ज्यादा से ज्यादा एक बार ही मारे जाएँगे और वह जिन्दगीभर मारी जाती रहेगी…’’ ‘‘अन्ना को मैं ढूँढ़ लूँगा। ऐसा नहीं होगा कि तुम उसके पैरों में अपना सिर झुकाओ…..यह शहर उससे ज्यादा तुम्हारा है। तुम्हारी नौक की लौंग के नग में सुलतान पुर के आसमान का सूरज नहीं, दादर की लोकल है, ‘गेट वे’ के कबूतर हैं, समंदर का ज्वार-भाटा है और कांदीवली के इस घर के बर्नर की नीली लौ है। और तुमसे ज्यादा यह बिट्टी का है। इस शहर में उसने जीवन की पहली और सबसे पवित्र साँस ली है….’’

अमीन मियां सनक गये हैं: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

अमीन मियां सनक गये हैं: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

शुभाष चन्द्र कुशवाहा 82 2018-11-18

सामाजिक बदलाव के समय में साहित्य से गाँव और ग्रामीण जीवन की कहानियाँ जैसे गायब होती जा रहीं हैं, उसकी जगह बाजारी अतिक्रमण से प्रभावित नगरीय जनजीवन और उसके बीच पनपते नये मध्यवर्ग की आर्थिक विषमताओं एवं व्यक्तिगत दैहिक कुंठाओं से भरी कहानियों की लम्बी फेहरिस्त सामने है | मज़े की बात है कि इनमें से ज्यादातर कहानियों में से पूरे सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाला राजनैतिक और वैचारिक परिदृश्य भी कहीं ओझल है | ऐसे में ‘सुभाष चंद्र कुशवाह’ की कहानी पाठक को न केवल भारतीय ग्रामीण जीवन के करीब ले कर जाती है बल्कि राजनैतिक स्वार्थों और इच्छा शक्तियों के प्रभाव में छिन्न-भिन्न होती भारतीय सांस्कृतिक विरासत को भी रेखांकित करती …| – संपादक

भटकुंइयां इनार का खजाना: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

भटकुंइयां इनार का खजाना: कहानी (सुभाष चन्द्र कुशवाह)

शुभाष चन्द्र कुशवाहा 61 2018-11-18

हमारी वर्तमान सांकृतिकता की विरासतीय थाती लोक भाषा, बतकही, किस्से-कहानियाँ, मानवीय चेतना की विकास प्रक्रिया का पहला और महत्वपूर्ण पायदान रही है | लोक या दन्त कथाओं, किस्सों में उच्चरित वर्गीय चरित्र और संघर्ष आज भी न केवल साहित्यिक वातावरण के लिए संजीवनी है बल्कि वर्तमान राजनैतिक साजिशों, और सामंती या पूंजीपतियों दवारा आमजन के खिलाफ रचे जा रहे कुचक्रों को अपनी भाषा एवं भौगोलिक परिस्थितियों के माध्यम से समझ पाने का आसान और रचनात्मक विकल्प भी है | यही सामाजिक और साहित्यिक सरोकार ‘सुभाष चन्द्र कुशवाह’ की कहानी दृष्टि को विशेष बनाते हैं | वर्तमान और तात्कालिक चुनौतियों का पुनर्मूल्यांकन करती आपकी कहानी में लोकभाषा और किस्से और पात्र कुछ इस तरह शामिल होते हैं कि लगे यह कल की नहीं आज की ही बात है | हमरंग पर प्रकाशित आपकी इस कहानी को पढ़ते हुए निश्चित ही आप इसी अनुभव से गुजरेंगे |..– संपादक

हाल ही में प्रकाशित

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

'मित्रो मरजानी' से अनंत यात्रा पर 'कृष्णा सोबती', स्मरण शेष

हनीफ मदार 173 2019-01-25

भारतीय साहित्य के परिदृश्य पर हिन्दी की विश्वसनीय उपस्थिति के साथ कृष्णा सोबती अपनी संयमित अभिव्यक्ति और रचनात्मकता के लिए जानी जाती रहीं उनकी लंबी कहानी मित्रो मरजानीके लिए  कृष्णा सोबती पर हिंदी पाठकों का फ़िदा हो उठना इसलिए नहीं था कि वे साहित्य और देह के वर्जित प्रदेश की यात्रा की ओर निकल पड़ी थीं बल्कि उनकी महिलाएं ऐसी थीं जो कस्बों और शहरों में दिख तो रही थीं, लेकिन जिनका नाम लेने से लोग डरते थे.यह मजबूत और प्यार करने वाली महिलाएं थीं जिनसे आज़ादी के बाद के भारत में एक खास किस्म की नेहरूवियन नैतिकता से घिरे पढ़े-लिखे लोगों को डर लगता था. कृष्णा सोबती का कथा साहित्य उन्हें इस भय से मुक्त कर रहा था. वास्तव में कथाकार अपने विषय और उससे बर्ताव में केवल अपने आपको मुक्त करता है, बल्कि वह पाठकों की मुक्ति का भी कारण बनता है. उन्हें पढ़कर हिंदी का वह पाठक जिसने किसी हिंदी विभाग में पढ़ाई नहीं की थी लेकिन अपने चारों तरफ हो रहे बदलावों को समझना चाहता था.

 

इसके अलावा निकष’, ‘डार से बिछुड़ी’, मित्रों मरजानी’, ‘यारों के यार’, ‘तिन-पहाड़’, ‘बादलों के घेरे’, ‘सूरज मुखी अँधेरे के’, ‘ज़िन्दगीनामा’, ‘ लड़की’, ‘दिलो-दानिश’, ‘हम हशमतऔर समय सरगमसे गुज़री आपकी लम्बी साहित्यिक ज़िंदगी में अपनी हर नई रचना में आपने ख़ुद अपनी क्षमताओं का अतिक्रमण किया जो सामाजिक और नैतिक बहसों की अनुगूँज के रूप में बौद्धिक उत्तेजना, आलोचनात्मक विमर्श, के साथ पाठकों में बराबर बनी रही

 

साहित्य अकादमी पुरस्कार और उसकी महत्तर सदस्यता के अतिरिक्त, अनेक राष्ट्रीय पुरस्कारों और अलंकरणों से शोभित कृष्णा सोबती साहित्य की समग्रता में ख़ुद के असाधारण व्यक्तित्व को भी साधारणता की मर्यादा में एक छोटी-सी कलम का पर्याय ही मानती रहीं बावज़ूद आपने हिन्दी की कथा-भाषा को एक विलक्षण ताज़गी दी आज अपने बीच से उनका चले जाना भले ही एक जीवन चक्र का पूरा होना हो किंतु यह सम्पूर्ण हिंदी साहित्य जगत के लिए एक ऐसी अपूर्णीय रिक्तता की तरह है  जिसे भर पाना नामुमकिन है

 

उन्हीं की एक कहानी के साथ हमरंगपरिवार कृष्णा सोबती को नमन करता है

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 340 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

नोट-

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संपादक - हनीफ़ मदार । सह-संपादक - अनीता चौधरी
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