मेगा बजट फ्लॉप शो: 2018 सफ़र सिनेमा का, (तेजस पूनिया)

मेगा बजट फ्लॉप शो: 2018 सफ़र सिनेमा का, (तेजस पूनिया)

तेजस पूनिया 667 2018-12-31

बात बीत रहे साल 2018 की करें तो इस साल 117 छोटी-बड़ी फ़िल्में रिलीज हुई । सिलसिलेवार तरीके से देखें तो सबसे अधिक कमाई करने वाली यानी टॉप 10 (दस) फिल्मों में पद्मावत हालांकि दूसरे नंबर पर रही किन्तु इस फिल्म ने हिन्दुस्तान के हर कोने में विवादों की ऐसी आग लगाई की संजय लीला भंसाली साहब ने उसमें अपनी रोटियाँ खूब सेकीं । फिल्मों का बजट और कमाई का गणित अगर देखें तो सिनेमा के वर्तमान समय के बेहतर शोध कर्त्ता ‘अमित कर्ण’ के द्वारा किए गए शोध से हम इसे और बेहतर तरीके से समझ सकते हैं –

वर्ष 2018 की विदाई पर भारतीय हिंदी सिनेमा पर एक नज़र डाल रहे हैं 'तेजस पूनिया'

भूमिका: सिनेमा की भाषा में: आलेख

भूमिका: सिनेमा की भाषा में: आलेख

विजय शर्मा 352 2018-11-18

“पिछली सदी के चालीस और पचास के दशक में मराठी मंच और फ़िल्म की प्रसिद्ध अभिनेत्री हंसा वाडेकर ने पत्रकार अनिल साधु के साथ मिल कर अपनी जीवनी लिखी। मराठी में इस आत्मकथा का शीर्षक ‘सांगत्ये आएका’ (सुनो और मैं कहती हूँ) है। हंसा ने बहुत बेबाक तरीके से इस आत्मकथा में अपने जीवन को कागज पर खोल कर रख दिया था। हंसा की इसी आत्मकथा को आधार बना कर बेनेगल ने ‘भूमिका’ फ़िल्म बनाई। चूँकि वे मराठी परिवेश से पूरी तरह परिचित नहीं थे अत: उन्होंने पटकथा लेखन के लिए अपने अलावा गिरीश कर्नाड तथा सत्यदेव दूबे का साथ लिया। फ़िल्म ‘भूमिका’ की कहानी एक तरह से शाश्वत है। स्त्री का परिवार-समाज द्वारा शोषण। हम कथानक की ज्यादा बात न करके फ़िल्म की भाषा की बात अधिक करेंगे। फ़िल्म में उषा एक जन्मजात कलाकार है। वह देवदासी परिवार से आती है। बचपन में उसने अपनी नानी से संगीत की शिक्षा ली है, अभिनय उसकी रग-रग में समाया हुआ है। वह मंच और फ़िल्म में अभिनय करके खूब शौहरत और पैसा पाती है। गाने के लिए ही वह पेशेगत रूप से काम शुरु करती है, अभिनेत्री बाद में बनती है। जीवन से लबालब भरी यही उषा जब शूटिंग के बाद स्टूडियो बाहर निकलती है, घर लौटती है तो उसकी द्विविधा और बेबसी का नजारा दर्शक को मिलता है। फ़िल्म में कुछ भी अनावश्यक नहीं होना चाहिए। उषा जब स्टूडियो से बाहर निकल रही है तो उसी की एक फ़िल्म ‘अग्नि परीक्षा’ का पोस्टर उठा कर कुछ लोग ले जा रहे हैं। घर जा कर उसे अग्नि परीक्षा से गुजरना है। वह दोहरी जिंदगी जीती है, कई भिन्न भूमिकाएँ उसे करनी होती हैं। फ़िल्म की भाषा निर्देशक के विचार होते हैं, जिन्हें वह कैमरे की आँख, साउंड तथा संगीत के माध्यम से प्रस्तुत करता है। जहाँ बिना संवाद बोले विचारों, भावनाओं, दृष्टिकोण को प्रकट किया जाता है।” ‘भूमिका‘ के संदर्भ में सिनेमा के तकनीकी व् वैचारिक पक्ष पर विस्तृत चर्चा करता ‘प्रो0 विजय शर्मा‘ का आलेख …….

‘गांधी ने कहा था’: नाट्य समीक्षा (एस तौहीद शहबाज़)

‘गांधी ने कहा था’: नाट्य समीक्षा (एस तौहीद शहबाज़)

एस. तौहीद शहबाज़ 232 2018-11-18

साम्प्रदायिकता का ख़बर बन जाना ख़तरनाक नहीं है, ख़तरनाक है ख़बरों का साम्प्रदायिक बन जाना। देश में विभिन्न समुदायों में तमाम तनावों और असहज हालातों के बीच राजेश कुमार का नाटक ‘गांधी ने कहा था’ हमेशा प्रासंगिक रहेगा । जनवादी नाटककार राजेश कुमार नुक्कड़ नाटक आंदोलन के शुरुआती दौर से सक्रिय है। कथा सांप्रदायिकता की आईने में ‘संतान’ खो चुके तार्केश्वर एवं माता-पिता खो चुके आफ़ताब को एक सुत्र में पिरोने का सुंदरतम उदाहरण है । राजेश कुमार का नाटक ‘ गांधी ने कहा था’ हमसे गांधीवादी विचारों पर गंभीरता से मंथन करने की अपील करता है । सांप्रदायिकता की रोकथाम एवम परस्पर सदभाव स्थापित करने में बापू के विचार बहुत कारगर हैं।

दादा साहेब फ़ाल्के: भारतीय सिनेमा के अमिट हस्ताक्षर (एस तौहीद शहबाज़)

दादा साहेब फ़ाल्के: भारतीय सिनेमा के अमिट हस्ताक्षर (एस तौहीद शहबाज़)

एस. तौहीद शहबाज़ 184 2018-11-18

फ़ाल्के के जीवन मे फ़िल्म निर्माण से जुडा रचनात्मक मोड सन 1910 ‘लाईफ़ आफ़ क्राईस्ट’ फ़िल्म को देखने के बाद आया, उन्होने यह फ़िल्म दिसंबर के आस-पास ‘वाटसन’ होटल मे देखी | वह फ़िल्म अनुभव से बहुत आंदोलित हुए और इसके बाद उस समय की और भी फ़िल्मों को देखा | फ़िल्म बनाने की मूल प्रेरणा फ़ाल्के को ‘क्राईस्ट का जीवन’ देखने मिली, फ़िल्म को देखकर उनके मन मे विचार आया कि –क्या भारत मे भी इस तर्ज़ पर फ़िल्म बनाई जा सकती हैं? फ़िल्म कला को अपना कर उन्होने प्रश्न का ठोस उत्तर दिया |फ़िल्म उस समय मूलत: विदेशी उपक्रम था और फ़िल्म बनाने के अनिवार्य तकनीक उस समय भारत मे उपलब्ध नही थी ,फ़ाल्के सिनेमा के ज़रुरी उपकरण लाने लंदन गए | लंदन मे उनकी मुलाकात जाने-माने निर्माता और ‘बाईस्कोप’ पत्रिका के सम्पादक सेसिल हेपवोर्थ से हुई फिर दादा साहेब फ़ाल्के ने फ़िल्म में अपना तन,मन,धन लगाने की पहल की | उस कठिन समय में वे इस ओर उन्मुख हुए, जब फ़िल्म उद्योग के लिए परिस्थितियां प्रतिकूल थी | बुद्धिजीवी,शिक्षित और आम लोग सभी फ़िल्मों के भविष्य को लेकर बेहद ऊहापोह में थे एवं इससे दूरी बनाए हुए थे, इससे जुडी शंका के बादल लोगों के मन पर हावी थे | फ़ाल्के की आशातीत सफ़लता ने इस पर विराम लगाया, लोग फ़िल्म जगत से जुडे और इसमे रोज़गार का अवसर पाया | हाल ही में 30 अप्रैल को दादा साहेब फ़ाल्के का जन्म दिवस रहा इस मौके पर भारतीय सिने जगत में फाल्के की भूमिका को व्याख्यायित करता ‘सैयद एस तौहीद‘ का आलेख

परसाई की प्रासंगिकता और जाने भी दो यारो: आलेख (‘प्रो0 विजय शर्मा’)

परसाई की प्रासंगिकता और जाने भी दो यारो: आलेख (‘प्रो0 विजय शर्मा’)

विजय शर्मा 915 2018-11-18

“हमारा देश अजीब प्रगति के पथ पर है। मूल्य से मूल्यहीनता और आदर्श से स्वार्थपरता की ओर, नैतिकता से अनैतिकता की ओर बड़ी तेजी से दौड़ लगा रहा है। परसाई की दृष्टि इस पर शुरु से अंत तक रही। ‘जाने भी दो यारों’ का श्याम हास्य (ब्लैक ह्यूमर) भारतीय राजनीति, ब्यूरोक्रेसी, मीडिया, व्यापार लोगों को हँसने पर मजबूर करता है साथ ही करुणा जगाता है। परसाई के पास सूक्ष्म आलोचना दृष्टि है। वे पुलिस-प्रशासन तंत्र की गिरी हुई छवि को निशाना बनाते हैं। ‘मातादीन चाँद पर’ का मातादीन चाँद की पुलिस को सभ्यता-संस्कृति का पाठ पढ़ाने जाता है। चाँद की पुलिस को भ्रष्टाचार के सारे पाठ पढ़ा कर एसपी की घरवाली के लिए एड़ी चमकाने का पत्थर चाँद से लाता है।”

क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते?: फिल्म समीक्षा (सैयद एस.तौहीद)

क्या लड़का-लड़की सिर्फ दोस्त नहीं हो सकते?: फिल्म समीक्षा (सैयद एस.तौहीद)

एस. तौहीद शहबाज़ 170 2018-11-18

कॉम्पलेक्स किरदारों की कॉम्पलेक्स कहानी में भावनाओं की यात्रा दिखाने की कोशिश हुई है। संगीत व गानों को फिल्म की कथा का हिस्सा देखना सुखद था। लेकिन प्यार व दोस्ती जैसे सरल सुंदर भाव को उलझन बना देना। कभी न ख़त्म होने वाली जिरह बना देना क्या ज़रूरी था ? भावनात्मक रिश्तों को लेकर हमारे भीतर उलझन क्यों पनप जाती है ? जवाब केवल संकेतों में मिला। अयान के किरदार में रणबीर कपूर रॉकस्टार का संशोधित एक्टेंसन मालूम पड़ रहें जोकि उनके लिए बेहतर ही रहा। इस किस्म के किरदारों को जीने की उनमें खासियत विकसित हो रही । लेकिन जल्द ही विकल्प भी तलाशने होंगे।

जिंदा रहना हर आदमी का अधिकार है: आलेख (एस तौहीद शाहवाज़)

जिंदा रहना हर आदमी का अधिकार है: आलेख (एस तौहीद शाहवाज़)

एस. तौहीद शहबाज़ 173 2018-11-18

“देश की एक बड़ी आबादी गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी काट रही, फुटपाथ के लोगों की तक़दीर पहले से कोई बहुत ज्यादा नहीं बदली। हाशिए के लोगों के हांथ अब भी खाली हैं । महंगाई, भ्रष्टाचार व कालाबाजार का ताप सबसे ज्यादा निचली परत को को सदा से बर्दाश्त करना पड़ा है, फुटपाथो पर रहने वालो का सारा दिन बस जिंदा रहने में ही गुज़र जाता है। गरीबी, लाचारी और बेबसी उन्हे हिंसक बना रही है। आसमान छूती महंगाई के लिए भ्रष्टाचार कालाबाजार को बहुत हद तक जिम्मेदार माना जाना चाहिए।मुनाफा और सिर्फ मुनाफे के लिए खडी यह व्यवस्था अहम चीजों की सप्लाई को बाधित कर उनकी कीमतें आसमान पर ले जाती है।” पचास के दशक की फिल्म “फुटपाथ” के बहाने वर्तमान समय का मूल्यांकन करता “एस तौहीद शाहवाज़” का आलेख …

क्या एडल्ट कॉमेडी वाकई कूल है..? (एस0 तौहीद शहवाज़)

क्या एडल्ट कॉमेडी वाकई कूल है..? (एस0 तौहीद शहवाज़)

एस. तौहीद शहबाज़ 263 2018-11-18

सिर्फ मनोरंजन के उद्देश्य को लेकर बन रही फिल्मों से परहेज नहीं, किन्तु यह जरुरी नहीं कि वो वाकई मनोरंजन करेंगी | मनोरंजन की परिभाषा को दरअसल निर्माता एवं बाज़ार अपने हिसाब से गढ़ रहे | एक जमाना था जब बी आर इशारा की बोल्ड फ़िल्मों की धूम थी । उनकी फ़िल्म ‘चेतना’ ने एक साथ कई नई बहसों को जन्म दिया था। इनमें फ़िल्मों में सेक्स-चित्रण, यौन-शुचिता और नैतिकता के साथ-साथ सेंसर बोर्ड पर भी सवाल उठाए। लेकिन आज कामेडी में सेक्सुआलिटी का पुट देकर एक नए किस्म के हास्य-व्यंग्य (फूहडता) को रचा गया है । वर्तमान में कॉमेडी के बदलते स्वरूप पर तुलनात्मक अध्ययन करता ‘सैयद एस तौहीद‘ का आलेख ….| – संपादक

राजनीतिक मुखौटों का दस्तावेज: फिल्म गुलाल

राजनीतिक मुखौटों का दस्तावेज: फिल्म गुलाल

एस. तौहीद शहबाज़ 184 2018-11-18

गुलाल में नयी सदी के युवा आंदोलनों को समझने की एक पहल हुई है। फिल्म को देखते वक़्त विश्वविद्यालयों का चुनावी माहौल की फिजाएं याद आती हैं। रैगिंग के भय से नए विद्यार्थियों का नामर्दगी की हद तक सीनिअर्स की हुक्मपरस्ती को दिखाना असहज कर गया…किंतु अबकी कालेज स्तरीय व्यवस्था इससे ग्रसित है ।सीनियर्स की बात ना मानने पर जूनियर्स की पिटाई को ‘रैगिंग’ की जगह गुंडागर्दी कहना चाहिए। जातिगत-क्षेत्रगत-भाषागत आदि समीकरणों से छात्र संगठनों की नींव पडती है। आने वाले कल की नींव पडती है। बडे स्तर की राजनीति में भी इन्हीं चीजों को सबसे ज्यादा भुनाया जाता है। कालेजों में भय व ड्रग एडिक्शन के दम पर युवाओं को गुमराह किया जाता है। भविष्य रचने वालों का कल खतरे में डालने का काम होता है। …….फिल्म गुलाल पर ‘एस तौहीद‘ का समीक्षात्मक आलेख |

हाल ही में प्रकाशित

कविता आज-कल : आलेख “अनुपम त्रिपाठी”

कविता आज-कल : आलेख “अनुपम त्रिपाठी”

अनुपम 472 2020-04-14

इधर कविता की एक ताज़ी दुनिया बन रही है। कुछ समकालीन कवि पूरी तैयारी के साथ आ रहे हैं। 'कविता शब्दों का खेल है'- इस धारणा में बहुत खेला कूदा गया और यह खेल अभी भी जारी है। यह ताज़्ज़ुब करता है कि भाषा कला और साहित्य की ओर से अपनी आँख बंद किए हुए समाज में जहाँ पाठकों की संख्या हाशिये पर जा रही है वहीं लेखकों की संख्या में थोकिया इजाफा हुआ है, खासतौर से कवियों की संख्या में। लिख सब रहे हैं - पढ़ कोई नहीं रहा। पाठकीय क्षेत्र में वस्तु-विनियम का सिद्धांत लगा हुआ है। आप मेरी पढ़ें और मैं आपकी। आत्म चर्चा की ऐसी बीमारी पकड़ी है कि पूछिये मत। इस बिलबिलाई हुई कवियों की भीड़ ने अच्छे कवियों को ढँक लिया है। वैश्विक स्तर पर हिंदी कविता की क्या स्थिति है, इससे हम अनभिज्ञ नहीं हैं। ऐसे में आलोचना की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह इस भीड़ से अच्छे कवियों को बाहर निकालकर समाज के सामने प्रस्तुत करे।

क्वारेंटीन : कहानी “राजेंद्र सिंह बेदी”

क्वारेंटीन : कहानी “राजेंद्र सिंह बेदी”

राजेंद्र सिंह बेदी 620 2020-04-14

उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार राजिंदर सिंह बेदी (1915–1984) की एक कहानी का शीर्षक है ‘क्वारनटीन’ जो अंग्रेजी राज में फैली प्लेग महामारी को केंद्र में रखकर लिखी गयी है. इस कहानी को पढ़ते हुए आज भी डर लगता है. इसकी कोरोना खौफ़ से तुलना करते हुए जहाँ समानताएं दिखती हैं वहीं यह विश्वास भी पैदा होता है कि मनुष्य इस आपदा को भी पराजित कर देगा. 

 ‘एक डॉक्टर की हैसियत से मेरी राय निहायत मुसतनद है और मैं दावे से कहता हूं कि जितनी मौतें शहर में क्वारनटीन से हुईं, उतनी प्लेग से न हुईं. हालांकि क्वारनटीन कोई बीमारी नहीं, बल्कि वह उस बड़े क्षेत्र का नाम है जिसमें हवा में फैली हुई महामारी के दिनों में बीमार लोगों को तंदुरुस्त इंसानों से कानूनन अलहदा करके ला डालते हैं ताकि बीमारी बढ़ने न पाए. अगरचे क्वारनटीन में डॉक्टरों और नर्सों का काफी इंतजाम था, फिर भी मरीजों की बड़ी संख्या में वहां आ जाने से हर मरीज को अलग-अलग खास तवज्जो न दी जा सकती थी. उनके अपने संबंधियों के आसपास न होने से मैं ने बहुत से मरीजों को बे-हौसला होते देखा. कई तो अपने इर्द-गिर्द लोगों को पे दर पे मरते देखकर मरने से पहले ही मर गए. कई बार तो ऐसा हुआ कि कोई मामूली तौर पर बीमार आदमी वहां के वातावरण में ही फैले जरासीम से हलाक हो गया ।’
- इसी कहानी से
इस कहानी का अनुवाद “रज़ीउद्दीन अक़ील” ने किया है जो आभार के साथ यहाँ प्रस्तुत है.

मनुष्य का जीवन आधार क्या है: कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

मनुष्य का जीवन आधार क्या है: कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

लियो टॉलस्टॉय 353 2020-03-28

‘वह निराश होकर घर को लौट पड़ा। राह में सोचने लगा—कितने अचरज की बात है कि मैं सारे दिन काम करता हूं, उस पर भी पेट नहीं भरता। चलते समय स्त्री ने कहा था कि वस्त्र अवश्य लाना। अब क्या करुं, कोई उधार भी तो नहीं देता। किसानों ने कह दिया, अभी हाथ खाली है, फिर ले लेना। तुम्हारा तो हाथ खाली है, पर मेरा काम कैसे चले? तुम्हारे पास घर, पशु, सबकुछ है, मेरे पास तो यह शरीर ही शरीर है। तुम्हारे पास अनाज के कोठे भरे पड़े हैं, मुझे एकएक दाना मोल लेना पड़ता है। ‪सात दिन में‬ तीन रुपये तो केवल रोटी में खर्च हो जाते हैं। क्या करुं, कहां जाऊं?’

नोट-

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