अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

मज्कूर आलम 231 2018-11-17

स्त्री सशक्तीकरण पर जब भी बातें होती है तो वह किताबी जुमले का शक्ल अख्तियार कर लेती है। बहस की भाषा क्लासिकी लिए होती है और वह पूरी तरह से बौद्धिक कवायद भर बन कर रह जाती है (फिल्मों में भी)। चाहे वह बात स्त्री की देह की आजादी की हो या फिर उसके न कहने के अधिकार की। साइमन बॉऊआर से लेकर फिल्म ‘पिंक’ के ‘न’ तक आकर भी बात नहीं रुकती। बहसें चलती रहती है और वास्तविक जीवन में विद्रोही लडक़ी के चरित्रहनन की कोशिशें भी जारी रहती हैं, उन्हीं लोगों द्वारा। यकीन न हो तो एक बार हिंदी साहित्य की कुछ बैठकों में नियमित आइए-जाइए। हकीकत का पता चल जाएगा।

‘डिअर जिन्दगी’ व-नाम लव यू ज़िन्दगी..: फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

‘डिअर जिन्दगी’ व-नाम लव यू ज़िन्दगी..: फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

संध्या निवोदिता 178 2018-11-18

जिंदगी में प्यार बहुत से रिश्तों से मिलता है लेकिन हमें बचपन से भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है. रोओ तो कहा जाता है रोते नहीं, स्ट्रांग बनो. किसी पर गुस्सा आये तो गुस्सा नहीं करो, स्माइल करो. ऐसे अनुकूलन करते हुए कब हम अपनी सच्ची भावनाओं को छिपाना और मौके के अनुसार व्यवहार करना सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता. पता तब चलता है जब इस बार प्यार किसी बहाने से नहीं, किसी आवरण में नहीं बल्कि सीधे प्यार की शक्ल में ही आता है और तब हम उससे भी सच्चा व्यवहार नहीं कर पाते. जहां बुरा लगता है, बुरा नहीं कह पाते, प्यार की ज़बरदस्त फीलिंग है मगर छिपाए घूमते हैं, अलग होना चाहते हैं वह भी नहीं कह पाते. क्योंकि अंदर नकारे जाने का डर होता है. उस डर से बाहर निकलो. जिंदगी में कई ख़ास रिश्ते होते हैं. ऐसा दोस्त जिस से हम मन की कोई भी बात बहुत सहजता से पाते हैं, ऐसा दोस्त जिसके साथ हम संगीतमय हो जाते हैं, ऐसा दोस्त जिसके साथ पहाड़ पर चढने और एडवेंचर में मजा आता है, ऐसा दोस्त जिसके साथ किताबों कि दुनिया और ज्यादा समझ में आती है, और एक दोस्त ऐसा जिसके साथ जिंदगी रोमांटिक हो जाती …. खोजो उसे | अब तक तो हिन्दी फ़िल्में प्यार में कामयाबी को ही ज़िन्दगी की कामयाबी के बतौर स्थापित करती आई हैं. कुल जमा सारी कायनात की ऊर्जा दो प्रेमियों को मिलाने में ही खर्च होती रही है. माने मर जाएँ, मिट जाएँ मंजूर है, पर प्रेमी के बिना मंजूर नहीं !! यहाँ ‘डिअर जिन्दगी’ में हिंदी फिल्मों के इस आम चलन से क्या और कैसे इतर है जानने के लिए पढ़ते हैं ‘संध्या नवोदिता’ का यह समीक्षात्मक आलेख …….| – संपादक

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इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

इंसाफ़ के तक़ाज़े पर इंसाफ़ की बलि : आलेख (ज्योति कुमारी शर्मा)

ज्योति कुमारी 228 2019-12-11

हैदराबाद, उन्नाव, बक्सर, समस्तीपुर और मुजफ्फरपुर में बेटियों को जिंदा जलाने का मामला अभी थमा भी नहीं था कि पश्चिम चंपारण के शिकारपुर थाना क्षेत्र के एक गांव में ऐसा ही मामला सामने आया है । निश्चित ही यह भारतीय न्याय व्यवस्था, सामाजिकता और लोकतंत्र के लिए अत्यंत शर्मनाक है। किंतु इसके बरअक्स त्वरित न्याय प्रक्रिया में हैदराबाद का पुलिसिया कृत्य भी ऐसी घटनाओं के ख़िलाफ़ कोई आदर्श नहीं माना जा सकता। बल्कि बिना किसी अपराध के साबित होने से पूर्व ही महज़ आरोपित व्यक्ति या व्यक्तियों की भीड़ द्वारा हत्या कर देना या हैदराबाद में पुलिस का ख़ुद मुंसिफ़ बन जाना यक़ीनी तौर पर माननीय भारतीय न्यायालयों और न्याय प्रक्रिया को मुँह चिढ़ाने जैसा है, जो अपराधी और आपराधिक घटना की जाँच, विश्लेषण और अन्वेषण के रास्ते भी एक झटके से बंद कर देता है, फलस्वरूप न्याय व्यवस्था के प्रति सामाजिक भरोसे की जगह सहमा सा संदेह खड़ा होने लगता है । इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को सामाजिक और क़ानूनी रोशनी में देखने का प्रयास है, कथाकार और माननीय सर्वोच्च न्यायालय की अधिवक्ता ‘ज्योति कुमारी शर्मा’ का यह आलेख॰॰॰॰॰

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

फ़िरोज़ी रेखाओं की नीड : कहानी (हुस्न तबस्सुम 'निहाँ')

हुश्न तवस्सुम निहाँ 166 2019-12-06

शैफाली का ओहदा क्या बढ़ा उसके कद में खुद ब खुद इजाफा हो गया। प्रेस की ओर से उसे एक स्कूटर भी मिल गई। वेतन भी बढ़ां संपादक संजय वर्मा की नजरें उस पर कुछ ज्यादा मेहरबान रहने लगीं। उसके खाने पीने और प्रेस के कामों का भी काफी ध्याान रखते। जितनी बार काॅफी चाय खुद के लिए मंगवाते उसे भी भिजवाते। खाली समय में उसके केबिन में जा कर गप्पें लड़ाया करते। और ऐसे ही वह नजदीकियों की पराकाष्ठा पार करने का प्रयत्न करने लगे। इस दरम्यान उसका बादल से मिलना जारी रहा। किन्तु बादल, बादल जेसा ही ठण्डा और बेगाना बंजारा सा बना रहा। एक दिन शैफाली संपादक की कुटिल हरकतों से उक्ता कर बड़े आवेश में बादल के पास गई और.................

बंद कमरे की रोशनी  : कहानी (हनीफ़ मदार)

बंद कमरे की रोशनी : कहानी (हनीफ़ मदार)

हनीफ मदार 518 2019-11-21

फ़िरोज़ खान के संस्कृत पढ़ाने को लेकर उठे विवाद के वक़्त में लगभग डेढ़ दशक पहले लिखी इस कहानी को पढ़ते हुए एक ख़ास बात जो स्पष्ट रूप से सामने आती है कि बीते इन वर्षों में भले ही हम आधुनिकता और तकनीकी दृष्टि से बहुत तरक़्क़ी कर गए हैं किंतु यह बिडंबना ही है कि सामाजिक रूप से हमारी मानसिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं  आ पाया । जहाँ इधर फ़िरोज़ खान का संस्कृत पढ़ाना राजनैतिक हित-लाभ का अस्त्र बनता जा रहा है वहीं डेढ़ दशक पहले लिखी कहानी का पात्र मास्टर अल्लादीन का संस्कृत पढ़ाना भी वोट की राजनीति को इस्तेमाल होता है॰॰॰॰॰॰एक समुदाय विशेष के द्वारा किसी भी भाषा पर अपनी बपौती समझ, समाज में साम्प्रदायिक लड़ाई- झगड़े करवाकर लोगों के अन्दर अनचाहा भय पैदाकर समाज की शान्ति भंग करके अपनी राजनैतिक रोटियां सेकने वाले वर्ग की नंगी दास्ताँ है "हनीफ़ मदार" की यह कहानी - अनिता चौधरी

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