‘डिअर जिन्दगी’ व-नाम लव यू ज़िन्दगी..: फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

‘डिअर जिन्दगी’ व-नाम लव यू ज़िन्दगी..: फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

संध्या निवोदिता 21 2018-11-18

जिंदगी में प्यार बहुत से रिश्तों से मिलता है लेकिन हमें बचपन से भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है. रोओ तो कहा जाता है रोते नहीं, स्ट्रांग बनो. किसी पर गुस्सा आये तो गुस्सा नहीं करो, स्माइल करो. ऐसे अनुकूलन करते हुए कब हम अपनी सच्ची भावनाओं को छिपाना और मौके के अनुसार व्यवहार करना सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता. पता तब चलता है जब इस बार प्यार किसी बहाने से नहीं, किसी आवरण में नहीं बल्कि सीधे प्यार की शक्ल में ही आता है और तब हम उससे भी सच्चा व्यवहार नहीं कर पाते. जहां बुरा लगता है, बुरा नहीं कह पाते, प्यार की ज़बरदस्त फीलिंग है मगर छिपाए घूमते हैं, अलग होना चाहते हैं वह भी नहीं कह पाते. क्योंकि अंदर नकारे जाने का डर होता है. उस डर से बाहर निकलो. जिंदगी में कई ख़ास रिश्ते होते हैं. ऐसा दोस्त जिस से हम मन की कोई भी बात बहुत सहजता से पाते हैं, ऐसा दोस्त जिसके साथ हम संगीतमय हो जाते हैं, ऐसा दोस्त जिसके साथ पहाड़ पर चढने और एडवेंचर में मजा आता है, ऐसा दोस्त जिसके साथ किताबों कि दुनिया और ज्यादा समझ में आती है, और एक दोस्त ऐसा जिसके साथ जिंदगी रोमांटिक हो जाती …. खोजो उसे | अब तक तो हिन्दी फ़िल्में प्यार में कामयाबी को ही ज़िन्दगी की कामयाबी के बतौर स्थापित करती आई हैं. कुल जमा सारी कायनात की ऊर्जा दो प्रेमियों को मिलाने में ही खर्च होती रही है. माने मर जाएँ, मिट जाएँ मंजूर है, पर प्रेमी के बिना मंजूर नहीं !! यहाँ ‘डिअर जिन्दगी’ में हिंदी फिल्मों के इस आम चलन से क्या और कैसे इतर है जानने के लिए पढ़ते हैं ‘संध्या नवोदिता’ का यह समीक्षात्मक आलेख …….| – संपादक

अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

मज्कूर आलम 20 2018-11-17

स्त्री सशक्तीकरण पर जब भी बातें होती है तो वह किताबी जुमले का शक्ल अख्तियार कर लेती है। बहस की भाषा क्लासिकी लिए होती है और वह पूरी तरह से बौद्धिक कवायद भर बन कर रह जाती है (फिल्मों में भी)। चाहे वह बात स्त्री की देह की आजादी की हो या फिर उसके न कहने के अधिकार की। साइमन बॉऊआर से लेकर फिल्म ‘पिंक’ के ‘न’ तक आकर भी बात नहीं रुकती। बहसें चलती रहती है और वास्तविक जीवन में विद्रोही लडक़ी के चरित्रहनन की कोशिशें भी जारी रहती हैं, उन्हीं लोगों द्वारा। यकीन न हो तो एक बार हिंदी साहित्य की कुछ बैठकों में नियमित आइए-जाइए। हकीकत का पता चल जाएगा।

हाल ही में प्रकाशित

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 46 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 61 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

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