‘डिअर जिन्दगी’ व-नाम लव यू ज़िन्दगी..: फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

‘डिअर जिन्दगी’ व-नाम लव यू ज़िन्दगी..: फिल्म समीक्षा (संध्या नवोदिता)

संध्या निवोदिता 128 2018-11-18

जिंदगी में प्यार बहुत से रिश्तों से मिलता है लेकिन हमें बचपन से भावनाओं को दबाना सिखाया जाता है. रोओ तो कहा जाता है रोते नहीं, स्ट्रांग बनो. किसी पर गुस्सा आये तो गुस्सा नहीं करो, स्माइल करो. ऐसे अनुकूलन करते हुए कब हम अपनी सच्ची भावनाओं को छिपाना और मौके के अनुसार व्यवहार करना सीख जाते हैं, पता ही नहीं चलता. पता तब चलता है जब इस बार प्यार किसी बहाने से नहीं, किसी आवरण में नहीं बल्कि सीधे प्यार की शक्ल में ही आता है और तब हम उससे भी सच्चा व्यवहार नहीं कर पाते. जहां बुरा लगता है, बुरा नहीं कह पाते, प्यार की ज़बरदस्त फीलिंग है मगर छिपाए घूमते हैं, अलग होना चाहते हैं वह भी नहीं कह पाते. क्योंकि अंदर नकारे जाने का डर होता है. उस डर से बाहर निकलो. जिंदगी में कई ख़ास रिश्ते होते हैं. ऐसा दोस्त जिस से हम मन की कोई भी बात बहुत सहजता से पाते हैं, ऐसा दोस्त जिसके साथ हम संगीतमय हो जाते हैं, ऐसा दोस्त जिसके साथ पहाड़ पर चढने और एडवेंचर में मजा आता है, ऐसा दोस्त जिसके साथ किताबों कि दुनिया और ज्यादा समझ में आती है, और एक दोस्त ऐसा जिसके साथ जिंदगी रोमांटिक हो जाती …. खोजो उसे | अब तक तो हिन्दी फ़िल्में प्यार में कामयाबी को ही ज़िन्दगी की कामयाबी के बतौर स्थापित करती आई हैं. कुल जमा सारी कायनात की ऊर्जा दो प्रेमियों को मिलाने में ही खर्च होती रही है. माने मर जाएँ, मिट जाएँ मंजूर है, पर प्रेमी के बिना मंजूर नहीं !! यहाँ ‘डिअर जिन्दगी’ में हिंदी फिल्मों के इस आम चलन से क्या और कैसे इतर है जानने के लिए पढ़ते हैं ‘संध्या नवोदिता’ का यह समीक्षात्मक आलेख …….| – संपादक

अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

अनारकली ऑफ आरा : उम्मीद अभी जिंदा है: फिल्म समीक्षा (मज्कूर आलम)

मज्कूर आलम 139 2018-11-17

स्त्री सशक्तीकरण पर जब भी बातें होती है तो वह किताबी जुमले का शक्ल अख्तियार कर लेती है। बहस की भाषा क्लासिकी लिए होती है और वह पूरी तरह से बौद्धिक कवायद भर बन कर रह जाती है (फिल्मों में भी)। चाहे वह बात स्त्री की देह की आजादी की हो या फिर उसके न कहने के अधिकार की। साइमन बॉऊआर से लेकर फिल्म ‘पिंक’ के ‘न’ तक आकर भी बात नहीं रुकती। बहसें चलती रहती है और वास्तविक जीवन में विद्रोही लडक़ी के चरित्रहनन की कोशिशें भी जारी रहती हैं, उन्हीं लोगों द्वारा। यकीन न हो तो एक बार हिंदी साहित्य की कुछ बैठकों में नियमित आइए-जाइए। हकीकत का पता चल जाएगा।

हाल ही में प्रकाशित

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 299 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

हंसी व सामूहिकता को बचा कर रखता है रंगमंच: आलेख (अनीश अंकुर)

अनीश अंकुर 210 2019-05-25

डिजीडल दुनिया में भले मनुष्य आभासी दुनिया में एक दूसरे से जुड़े रहते हैं लेकिन यथार्थ में उनका सामूहिक जीवन पर बेहद घातक प्रभाव पड़ा है। हमारी सामूहिकता, एक दूसरे के साथ हंसना-बोलना सब पर बुरा प्रभाव पड़ा है। भोपाल के रंगनिर्देशक बंसी कौल ने रंगविदूषक की ऐसी ही अवधारणा पर काम किया है। वे कहते है ‘‘ रंगविदूषक में हम यह मानकर चलते थे कि हमारा काम एक असलहा है। आपको कुदरत ने ऐसा हथियार दिया जिसे बनाए रखना जरूरी है। यदि आप विचार को बचाकर रखोगे आप अपनी आध्यामिकता को बचाकर रखोगे क्योंकि जो हंसी-ठठा होता है, वह सामूहिक होता है। लेकिन आप उसी पूरी हंसी को खत्म कर दोगे तो आप सामूहिकता को भी खत्म कर रहे हैं जिसकी हमारे समाज को बहुत जरूरत है। ’’ नाटक यही काम करता है वो आपका मनोरंजन करता है, हंसाता है। ताकतवर लोगों पर भी हंसने की क्षमता प्रदान करता है। बकौल बर्तोल्त ब्रेख्त ‘‘ जिस नाटक में आप हंस नहीं सकते वो नाटक हास्यास्पद है।’’

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

तितलियाँ बेचैन हैं: कहानी (सुभाष पंत)

सुभाष पंत 318 2019-05-01

वह स्वर्ण युग था जिसमें शेर और बकरी एक घाट पानी पीते थे। वर्तमान कितना घिनौना है, यह बताने की मैं कोई आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहा। उसे तो तुम देख ही रही हो। मेरा बस चले तो मैं वर्तमान को अतीत में बदल दूँ। दरअसल मेरी मुख्य चिंता ही यह है।’ कछुए ने आध्यात्मिक दर्प के साथ कहा। तितलियों ने अनेक बार इसी किस्म के सनातन वक्तव्य सुने थे, जिनका नाभिनाल अतीत में गड़ा होता है। अतीत के प्रति पूरा सम्मानभाव रखने के बावजूद वे इस तरह के वक्तव्यों से ऊब चुकीं थीं। एक प्रगल्भ तितली ने तुरन्त अपना विरोध प्रकट किया, ’इसका मतलब तो यही हुआ सर कि यह ऐसी व्यवस्था थी जहाँ शेर को शिकार करने के लिए भटकना नहीं पड़ता था। वह उसे बिना परिश्रम के उसी घाट पर उपलब्ध हो जाता था, जहाँ वह पानी पीता था। यह तो सर शोषक की आदर्श स्थिति हुई, शोषित की नहीं।’

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 275 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

नोट-

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