भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 46 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मोहब्बत को समझना है तो प्यारे ख़ुद मोहब्बत कर: स्मरण शेष, 'कादर खान'

मोहब्बत को समझना है तो प्यारे ख़ुद मोहब्बत कर: स्मरण शेष, 'कादर खान'

मनीष पाण्डेय " आशिक़ " 198 2019-01-02

'हमारी तारीफ़ ज़रा लम्बी है । बचपन से सर पर अल्लाह का हाथ और अल्लाहरक्ख़ा है अपने साथ । बाज़ू पर ७८६ का है बिल्ला, बीस नम्बर की बीड़ी पीता हूँ, काम करता हूँ क़ुली का और नाम है इक़बाल' - फ़िल्म क़ुली का एक संवाद ।

हिन्दुस्तानी फ़िल्म जगत के मशहूर चरित्र अभिनेता और लेखक कादर खान का आज कनाडा के अस्पताल में निधन हो गया. वह 81 साल के थे. कादर खान को हिन्दी फ़िल्मों के महान संवाद लेखक और हास्य अभिनेता के तौर पर याद किया जाता है. नब्बे के दशक में, कादर खान और अभिनेता गोविंदा की जोड़ी ने अपनी शानदार कॉमेडी के ज़रिये भारतीय दर्शकों के दिल में अमिट छाप छोड़ दी थी. आज जब कादर खान साहब हमारे बीच नहीं हैं तो इस लेख के ज़रिये, हम उनकी ज़िंदगी के तमाम संघर्षों और उपलब्धियों को आपसे साथ साझा करेंगे. यही हम सबकी तरफ़ से कादर खान साहब को सच्ची श्रद्धांजली होगी.॰॰॰॰ मनीष पाण्डेय " आशिक़ " का आलेख 

भूगोल से गायब होकर उपन्यास में समा गया है,

भूगोल से गायब होकर उपन्यास में समा गया है, "'मदारीपुर जंक्शन" : बालेन्दु द्विवेदी (साक्षात्कार)

बालेन्दु द्विवेदी 216 2018-11-24

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के एक गाँव ब्रह्मपुर में पैदा हुए लेखक बालेंदु द्विवेदी ने एक सीधी सरल रचना मदारीपुर जंक्शन के जरिए साहित्यकारों के बीच अपनी पहचान बनाई है। उनके लिखे उपन्यास मदारीपुर जंक्शन में गांव की सौंधी मिट्टी की महक के साथ ही जीवन की कटु सच्चाई भी सामने आती है। प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक अशोक चक्रधर ने इस उपन्यास की प्रशंसा में यह लिखा है कि 'मदारीपुर गांव उत्तर प्रदेश के नक्शे में ढूंढें तो शायद ही कहीं आपको नजर आ जाए, लेकिन निश्चित रूप से यह गोरखपुर जिले के ब्रह्मपुर गांव के आस-पास के हजारों-लाखों गांवों से ली गई विश्वसनीय छवियों से बना एक बड़ा गांव है। जो अब भूगोल से गायब होकर उपपन्यास में समा गया है। हाल ही में अपने कलम कार्यक्रम के लंदन सीरीज़ में,फाउंडेशन ने 'मदारीपुर जंक्शन' उपन्यास से प्रसिद्ध हुए कथाकार बालेन्दु द्विवेदी को आमंत्रित किया। दिनांक 11 नवम्बर,2018 को लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में कलम कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा सहित हिंदी के अनेकों विद्वान उपस्थित रहे।कार्यक्रम का संचालन युवा साहित्यकार शिखा वाष्र्णेय ने किया। प्रस्तुत है 'मदारीपुर जंक्शन' उपन्यास के लेखक और युवा साहित्यकार बालेंदु द्विवेदी से विशेष बात-चीत एक साक्षात्कार के रूप में -

उफ़ परसाई हाय परसाई: संस्मरण (यूनुस खान)

उफ़ परसाई हाय परसाई: संस्मरण (यूनुस खान)

युनुश खान 73 2018-11-18

(“हरिशंकर परसाई: – चर्चा ज़ारी है …….” के आठवें दिन ……. यूनुस खान का आलेख ‘) हिम्‍मत नहीं थी कि आकाशवाणी की कैजुएली वाले उन दिनों में अपनी बेहद प्रिय ‘स्‍ट्रीट-कैट’ साइकिल को परसाई जी के घर की ओर मोड़ दिया जाए । लेकिन ये शौर्य हमने दिखा ही दिया एक दिन । और नेपियर टाउन में परसाई जी के घर पहुंच गए । परसाई जी बिस्‍तर पर थे । हमें पता था कि एक दुर्घटना के बाद उनकी यही हालत है । उनसे बातें हुईं । उन्‍हें पता नहीं किस धुन में हमने अपनी ‘कविताएं’ तक सुना डालीं । ये बात याद करके आज भी गर्दन के पीछे वाले हिस्‍से में झुरझुरी दौड़ जाती है । उन बचकानी कविताओं पर परसाई ने अपनी राय दी । रास्‍ता दिखाया । फिर तीन चार बार की मुलाकात रही परसाई जी के साथ । एक बार तो गणतंत्र दिवस पर आकाशवाणी जबलपुर के लिए विशेष कार्यक्रम तैयार करते हुए हम उन्‍हें रिकॉर्ड करने भी गए । वो रिकॉर्डिंग पता नहीं जबलपुर केंद्र में अब है या नहीं । फिर विविध भारती वाले दिन आ गये जीवन में । मुझे याद है कि बंबई से ऑडीशन देकर लौटा ही था कि उसी दिन जबलपुर आकाशवाणी के केंद्र निदेशक क़मर अहमद का फोन आया । परसाई जी नहीं रहे, उनकी ‘अंतिम-यात्रा’ को कवर करना है । फौरन आओ । जाने क्‍या धुन थी । आनन-फानन पहुंचे । और हमने परसाई को पंच-तत्‍त्व में विलीन होते देखा ।

हाल ही में प्रकाशित

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

भारतीय अमूर्तता के अग्रज चितेरे : रामकुमार

पंकज तिवारी 46 2019-01-15

पहाड़ों की रानी, शिमला में जन्में चित्रकार और कहानीकार रामकुमार ऐसे ही अमूर्त भूदृश्य चित्रकार नहीं बन गये अपितु शिमला के हसीन वादियों में बिताये बचपन की कारस्तानी है, रग-रग में बसी मनोहर छटा की ही देन है इनका रामकुमार हो जाना। अपने में ही अथाह सागर ढूढ़ने वाले शालीन,संकोची रामकुमार बचपन से ही सीमित दायरे में रहना पसंद करते थे पर कृतियाँ दायरों के बंधनों से मुक्त थीं शायद यही वजह है उनके अधिकतर कृतियों का 'अन्टाइटल्ड' रह जाना जहाँ वो ग्राही को पूर्णतः स्वतंत्र छोड़ देते हैं भावों के विशाल या यूँ कहें असीमित जंगल में भटक जाने हेतु। किसी से मिलना जुलना भी कम ही किया करते थे। उन्हे सिर्फ और सिर्फ प्रकृति के सानिध्य में रहना अच्छा लगता था - उनका अन्तर्मुखी होना शायद इसी वजह से सम्भव हो सका और सम्भव हो सका धूमिल रंगों तथा डिफरेंट टेक्स्चरों से युक्त सम्मोहित-सा करता गीत। 

- पंकज तिवारी का आलेख 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक: आलेख (अरविंद जैन)

अरविंद जैन 61 2019-01-15

आदेश ! अध्यादेश !! ‘अध्यादेश’ के बाद, ‘अध्यादेश’

'यह संसद और संविधान की अवमानना है। ‘राजनितिक फ़ुटबाल’ खेलते-खेलते, ‘मुस्लिम महिलाओं की मुक्ति’ के रास्ते नहीं तलाशे जा सकते। संसद में बिना विचार विमर्श के कानून! देश में कानून का राज है या ‘अध्यादेश राज’? बीमा, भूमि अधिग्रहण, कोयला खदान हो या तीन तलाक़। सब तो पहले से ही संसद में विचाराधीन पड़े हुए हैं/थे। क्या यही है सामाजिक-आर्थिक सुधारों के प्रति ‘प्रतिबद्धता’ और ‘मजबूत इरादे’? क्या यही है संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था की नैतिकता? क्या यही है लोकतंत्र की परम्परा, नीति और मर्यादा? यह तो ‘अध्यादेश राज’ और शाही निरंकुशता ही नहीं, अंग्रेजी हकुमत की विरासत का विस्तार है। ऐसे नहीं हो सकता/होगा ‘न्यू इंडिया’ का नव-निर्माण। अध्यादेशों के भयावह परिणामों से देश की जनता ही नहीं, खुद राष्ट्रपति हैरान...परेशान होते रहे हैं।' 

मुस्लिम महिला संरक्षण विधेयक पर गहरी क़ानूनी समझ सामने लाता वरिष्ठ अधिवक्ता 'अरविंद जैन' का आलेख 

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