मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 749 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

The edge of earth- अन्टार्कटिका अभियानों का एक दस्तावेज़: समीक्षा (प्रदीप कांत)

The edge of earth- अन्टार्कटिका अभियानों का एक दस्तावेज़: समीक्षा (प्रदीप कांत)

प्रदीप्त कान्त 621 2019-01-04

'डॉ शरदिंदु मुखर्जी स्वयं एक भू-वैज्ञानिक हैं और 1985 से 2009 तक चार बार इस अनोखे महाद्वीप की यात्रा और वहाँ के भूगर्भीय सर्वेक्षणों में सम्मिलित रहे हैं, कभी अभियान के सदस्य के तौर पर तो कभी टीम लीडर के तौर पर| करीब २५० पृष्ठों की इस पुस्तक में ३६ अध्याय हैं जिसमे डॉ शरदिंदु मुखर्जी ने इस अनोखे महाद्वीप पर अनेक रोचक प्रसंगों व घटनाओं का वर्णन किया है| किसी भी संस्मरण की रोचकता न केवल उसकी रोमांचकता के कारण तो होती है| सोने पर सुहागा यह है कि डॉ शरदिंदु मुखर्जी ने वहाँ की जिन घटनाओं का ज़िक्र किया है उनके वैज्ञानिक कारण भी बताएँ हैं जो एक सामान्य पाठक की जिज्ञासा को शांत करने में सहायक होते हैं| इस पुस्तक में लेखक ने अंटार्कटिका के सौन्दर्य का वर्णन किया है, कहीं वैज्ञानिक कारणों सहित वहाँ की रहस्यमई और नई नई घटनाओं का| मूल हिन्दी पुस्तक में लेखक ने कविताओं का उपयोग किया है जिससे लेखक के साहित्यिक रुझान का पता चलता है|' ॰॰॰॰॰॰ 'प्रदीप कांत' का आलेख 

   

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 530 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

विजय शर्मा 273 2018-12-04

‘सृजन संवाद’ की नवंबर मास की गोष्ठी में रांची से आये 'दक्खिन टोला' जैसी चर्चित कहानी संग्रह के कथाकार कमलेश ने अपनी कहानी 'पत्थलगड़ी' का पाठ किया। कमलेश को सुनने स्थानीय लेखक, साहित्यकार व साहित्यप्रेमी एकत्र हुए। 'पत्थलगड़ी' जल, जंगल और जमीन बचाने की कहानी है। यह आदिवासियों के अंदर के उनके प्रकृति प्रेम और उसके प्रति समर्पण को दर्शाती कहानी है। इस कहानी में इस बात का जिक्र है कि किस प्रकार एक आदिवासी परिवार की तीन पीढ़ी जंगल और पहाड़ को बचाने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देती है। आज भी यह आम धारणा बनी हुई है कि जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले को पुलिस और सरकार माओवादी मानती है। पिछले दिनों खूंटी में हुए पत्थलगड़ी प्रकरण को संदर्भ कर लिखी गयी यह अदभुत कहानी है।

'रसीद नम्बर ग्यारह' संग्रह की भूमिका : (डॉ० नमिता सिंह)

'रसीद नम्बर ग्यारह' संग्रह की भूमिका : (डॉ० नमिता सिंह)

नमिता सिंह 557 2018-12-21

"वर्तमान का यह राजनीतिक, सामाजिक परिदृश्य आज साहित्य लेखन के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित है। जाति-धर्म आधारित भेदभाव के प्रश्न हमारे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान पहचाने गये थे और आज़ादी की लड़ाई की सफलता के लिये तथा राष्ट्रीय एकता के लिये उन्हें संबोधित कर दूर करने के प्रयास किये गये थे। आज वैश्विक पूंजीवाद और सत्ता के गठजोड़ ने आम जनता की मानवीय गरिमा का क्षरण कर उसके जीने के अधिकार को छीनने का जो प्रयास किया जा रहा है उसकी पहचान करना ज़रूरी है। साहित्य के सामाजिक सरोकारों के रूप में यह एक बड़ी चुनौती है। कुछ युवा लेखक इस रूप में सफल हैं और अपनी कलम को इस बदलते यथार्थ के साथ मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति का साधन बना रहे हैं। हनीफ़ मदार की कहानियाँ इस रूप में लेखकीय दायित्व का निर्वहन करने में सफल हैं। उन्होंने अपनी कहानियों की आधार भूमि का विस्तार किया है। सांप्रदायिकता के आधार पर विभाजन के लिये उद्यत सामाजिक प्रक्रिया और मानसिकता की वे पहचान करते हैं और बेबाकी से उसको अंकित करते हैं। उनके सोच में दुविधा नहीं है। बावजूद अंतर्विरोधों के, वे समाज की मिली जुली संस्कृति और सहजीवन के गवाह भी बनते हैं और उनकी कहानियां ज्यादातर पॉजिटिव नोट के साथ समाप्त होती हैं।" संग्रह की भूमिका से ॰॰॰॰ नमिता सिंह

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हाल ही में प्रकाशित

कविता आज-कल : आलेख “अनुपम त्रिपाठी”

कविता आज-कल : आलेख “अनुपम त्रिपाठी”

अनुपम 472 2020-04-14

इधर कविता की एक ताज़ी दुनिया बन रही है। कुछ समकालीन कवि पूरी तैयारी के साथ आ रहे हैं। 'कविता शब्दों का खेल है'- इस धारणा में बहुत खेला कूदा गया और यह खेल अभी भी जारी है। यह ताज़्ज़ुब करता है कि भाषा कला और साहित्य की ओर से अपनी आँख बंद किए हुए समाज में जहाँ पाठकों की संख्या हाशिये पर जा रही है वहीं लेखकों की संख्या में थोकिया इजाफा हुआ है, खासतौर से कवियों की संख्या में। लिख सब रहे हैं - पढ़ कोई नहीं रहा। पाठकीय क्षेत्र में वस्तु-विनियम का सिद्धांत लगा हुआ है। आप मेरी पढ़ें और मैं आपकी। आत्म चर्चा की ऐसी बीमारी पकड़ी है कि पूछिये मत। इस बिलबिलाई हुई कवियों की भीड़ ने अच्छे कवियों को ढँक लिया है। वैश्विक स्तर पर हिंदी कविता की क्या स्थिति है, इससे हम अनभिज्ञ नहीं हैं। ऐसे में आलोचना की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वह इस भीड़ से अच्छे कवियों को बाहर निकालकर समाज के सामने प्रस्तुत करे।

क्वारेंटीन : कहानी “राजेंद्र सिंह बेदी”

क्वारेंटीन : कहानी “राजेंद्र सिंह बेदी”

राजेंद्र सिंह बेदी 620 2020-04-14

उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार राजिंदर सिंह बेदी (1915–1984) की एक कहानी का शीर्षक है ‘क्वारनटीन’ जो अंग्रेजी राज में फैली प्लेग महामारी को केंद्र में रखकर लिखी गयी है. इस कहानी को पढ़ते हुए आज भी डर लगता है. इसकी कोरोना खौफ़ से तुलना करते हुए जहाँ समानताएं दिखती हैं वहीं यह विश्वास भी पैदा होता है कि मनुष्य इस आपदा को भी पराजित कर देगा. 

 ‘एक डॉक्टर की हैसियत से मेरी राय निहायत मुसतनद है और मैं दावे से कहता हूं कि जितनी मौतें शहर में क्वारनटीन से हुईं, उतनी प्लेग से न हुईं. हालांकि क्वारनटीन कोई बीमारी नहीं, बल्कि वह उस बड़े क्षेत्र का नाम है जिसमें हवा में फैली हुई महामारी के दिनों में बीमार लोगों को तंदुरुस्त इंसानों से कानूनन अलहदा करके ला डालते हैं ताकि बीमारी बढ़ने न पाए. अगरचे क्वारनटीन में डॉक्टरों और नर्सों का काफी इंतजाम था, फिर भी मरीजों की बड़ी संख्या में वहां आ जाने से हर मरीज को अलग-अलग खास तवज्जो न दी जा सकती थी. उनके अपने संबंधियों के आसपास न होने से मैं ने बहुत से मरीजों को बे-हौसला होते देखा. कई तो अपने इर्द-गिर्द लोगों को पे दर पे मरते देखकर मरने से पहले ही मर गए. कई बार तो ऐसा हुआ कि कोई मामूली तौर पर बीमार आदमी वहां के वातावरण में ही फैले जरासीम से हलाक हो गया ।’
- इसी कहानी से
इस कहानी का अनुवाद “रज़ीउद्दीन अक़ील” ने किया है जो आभार के साथ यहाँ प्रस्तुत है.

मनुष्य का जीवन आधार क्या है: कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

मनुष्य का जीवन आधार क्या है: कहानी “लियो टॉलस्टॉय”

लियो टॉलस्टॉय 353 2020-03-28

‘वह निराश होकर घर को लौट पड़ा। राह में सोचने लगा—कितने अचरज की बात है कि मैं सारे दिन काम करता हूं, उस पर भी पेट नहीं भरता। चलते समय स्त्री ने कहा था कि वस्त्र अवश्य लाना। अब क्या करुं, कोई उधार भी तो नहीं देता। किसानों ने कह दिया, अभी हाथ खाली है, फिर ले लेना। तुम्हारा तो हाथ खाली है, पर मेरा काम कैसे चले? तुम्हारे पास घर, पशु, सबकुछ है, मेरे पास तो यह शरीर ही शरीर है। तुम्हारे पास अनाज के कोठे भरे पड़े हैं, मुझे एकएक दाना मोल लेना पड़ता है। ‪सात दिन में‬ तीन रुपये तो केवल रोटी में खर्च हो जाते हैं। क्या करुं, कहां जाऊं?’

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