मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

मनुष्य होने के सन्दर्भ तलाशते लयबंध: समीक्षा (उमाशंकर सिंह परमार)

उमाशंकर सिंह परमार 438 2019-06-02

बृजेश लय आधारित विधा के सफल और नामचीन कवि हैं। उनके लयबन्धों पर लिखना चुनौती भरा काम है। अमूमन गीतों और गज़लों की समीक्षा में व्याकरण व भावनात्मक आवेगों की प्रतिच्छाया सक्रिय रहती है आलोचक वाह-वाही की शैली में स्ट्रक्चर पर अपनी बात रखकर आलोचना की इतिश्री कर देते हैं। वह गीतों और बन्धों की वैचारिक विनिर्मिति और समाजशास्त्र पर जाना ही नहीं चाहते हैं। इससे हिन्दी कविता के क्षेत्र में गज़ल और गीतों को दोयम माना जाता रहा है। यह कमी विधा की नहीं है आलोचना की कमी है कि गीतों और बन्धों में समाजशास्त्रीय आलोचना को नहीं लागू किया गया वह अब भी अपने परम्परागत आलोचना प्रतिमानों द्वारा मूल्यांकित की जा रही है।

The edge of earth- अन्टार्कटिका अभियानों का एक दस्तावेज़: समीक्षा (प्रदीप कांत)

The edge of earth- अन्टार्कटिका अभियानों का एक दस्तावेज़: समीक्षा (प्रदीप कांत)

प्रदीप्त कान्त 432 2019-01-04

'डॉ शरदिंदु मुखर्जी स्वयं एक भू-वैज्ञानिक हैं और 1985 से 2009 तक चार बार इस अनोखे महाद्वीप की यात्रा और वहाँ के भूगर्भीय सर्वेक्षणों में सम्मिलित रहे हैं, कभी अभियान के सदस्य के तौर पर तो कभी टीम लीडर के तौर पर| करीब २५० पृष्ठों की इस पुस्तक में ३६ अध्याय हैं जिसमे डॉ शरदिंदु मुखर्जी ने इस अनोखे महाद्वीप पर अनेक रोचक प्रसंगों व घटनाओं का वर्णन किया है| किसी भी संस्मरण की रोचकता न केवल उसकी रोमांचकता के कारण तो होती है| सोने पर सुहागा यह है कि डॉ शरदिंदु मुखर्जी ने वहाँ की जिन घटनाओं का ज़िक्र किया है उनके वैज्ञानिक कारण भी बताएँ हैं जो एक सामान्य पाठक की जिज्ञासा को शांत करने में सहायक होते हैं| इस पुस्तक में लेखक ने अंटार्कटिका के सौन्दर्य का वर्णन किया है, कहीं वैज्ञानिक कारणों सहित वहाँ की रहस्यमई और नई नई घटनाओं का| मूल हिन्दी पुस्तक में लेखक ने कविताओं का उपयोग किया है जिससे लेखक के साहित्यिक रुझान का पता चलता है|' ॰॰॰॰॰॰ 'प्रदीप कांत' का आलेख 

   

'रसीद नम्बर ग्यारह' संग्रह की भूमिका : (डॉ० नमिता सिंह)

'रसीद नम्बर ग्यारह' संग्रह की भूमिका : (डॉ० नमिता सिंह)

नमिता सिंह 322 2018-12-21

"वर्तमान का यह राजनीतिक, सामाजिक परिदृश्य आज साहित्य लेखन के सामने चुनौती के रूप में उपस्थित है। जाति-धर्म आधारित भेदभाव के प्रश्न हमारे स्वाधीनता आंदोलन के दौरान पहचाने गये थे और आज़ादी की लड़ाई की सफलता के लिये तथा राष्ट्रीय एकता के लिये उन्हें संबोधित कर दूर करने के प्रयास किये गये थे। आज वैश्विक पूंजीवाद और सत्ता के गठजोड़ ने आम जनता की मानवीय गरिमा का क्षरण कर उसके जीने के अधिकार को छीनने का जो प्रयास किया जा रहा है उसकी पहचान करना ज़रूरी है। साहित्य के सामाजिक सरोकारों के रूप में यह एक बड़ी चुनौती है। कुछ युवा लेखक इस रूप में सफल हैं और अपनी कलम को इस बदलते यथार्थ के साथ मानवीय संवेदना की अभिव्यक्ति का साधन बना रहे हैं। हनीफ़ मदार की कहानियाँ इस रूप में लेखकीय दायित्व का निर्वहन करने में सफल हैं। उन्होंने अपनी कहानियों की आधार भूमि का विस्तार किया है। सांप्रदायिकता के आधार पर विभाजन के लिये उद्यत सामाजिक प्रक्रिया और मानसिकता की वे पहचान करते हैं और बेबाकी से उसको अंकित करते हैं। उनके सोच में दुविधा नहीं है। बावजूद अंतर्विरोधों के, वे समाज की मिली जुली संस्कृति और सहजीवन के गवाह भी बनते हैं और उनकी कहानियां ज्यादातर पॉजिटिव नोट के साथ समाप्त होती हैं।" संग्रह की भूमिका से ॰॰॰॰ नमिता सिंह

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स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

स्त्री अधिकारों का 'मौन अनुबंध' कविता समीक्षा (गणेश गनी)

गणेश गनी 341 2019-04-29

हिंदी साहित्य में ऐसे धूर्त साहित्यकार भतेरे हैं जो स्त्री विमर्श की आंच पर अपनी साहित्यिक रोटियां तो सेकते हैं, जो महिलाओं पर केंद्रित कविताएँ तो लिखते हैं, जो महिला विशेषांक भी निकालते हैं और सम्मेलनों में जाकर भाषण झाड़ते हैं कि उनसे बड़ा औरतों का संरक्षक कोई और है ही नहीं, परन्तु असलियत कुछ और ही होती है और वो यह कि उनके विचार इन सबसे एकदम उलट होते हैं। इनकी मानसिकता तब और भी उजागर हो जाती है जब ये दारूबाज पार्टियों में अपनी घिनौनी सोच को जगज़ाहिर करते हैं। दरअसल हमारे समाज में अब भी स्त्रियों को वो सम्मान और हक अभी नहीं मिले हैं, जिनकी वे वास्तव में हकदार हैं। आज भी अधिकतर चालाक पुरुष उसे अपनी सम्पति से अधिक कुछ नहीं समझते। कवयित्री भावना मिश्रा की अधिकतर कविताएँ ऐसी मानसिकता पर गज़ब की चोट करती हैं। भावना मिश्रा ने पुरुष मानसिकता की कलई शानदार तरीके से खोली है-

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

'दक्खिन टोला' 'पत्थगलढ़ी' का पाठ: (कमलेश)

विजय शर्मा 188 2018-12-04

‘सृजन संवाद’ की नवंबर मास की गोष्ठी में रांची से आये 'दक्खिन टोला' जैसी चर्चित कहानी संग्रह के कथाकार कमलेश ने अपनी कहानी 'पत्थलगड़ी' का पाठ किया। कमलेश को सुनने स्थानीय लेखक, साहित्यकार व साहित्यप्रेमी एकत्र हुए। 'पत्थलगड़ी' जल, जंगल और जमीन बचाने की कहानी है। यह आदिवासियों के अंदर के उनके प्रकृति प्रेम और उसके प्रति समर्पण को दर्शाती कहानी है। इस कहानी में इस बात का जिक्र है कि किस प्रकार एक आदिवासी परिवार की तीन पीढ़ी जंगल और पहाड़ को बचाने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देती है। आज भी यह आम धारणा बनी हुई है कि जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले को पुलिस और सरकार माओवादी मानती है। पिछले दिनों खूंटी में हुए पत्थलगड़ी प्रकरण को संदर्भ कर लिखी गयी यह अदभुत कहानी है।

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